पाठकों के बीच में डॉ. दुर्गा सिन्हा ' उदार ' की लघुकथाएं

         

          डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार’

जन्म : 01 जुलाई 1948

  शिक्षा : M.A.,M.Ed (Gold Medalist ), Ph.D(psychology)

 भूतपूर्व व्याख्याता- 

       BHU 

 शिक्षाविद्, साहित्य सेवी ,

      -समाज सेवी, 

मनोवैज्ञानिक सलाहकार 

     -देहदान द्वारा मानव

        सेवा का संकल्प 

    -महिला काव्य मंच 

अंतरराष्ट्रीय संस्था की 

 विदेश के San Diego USA में प्रथम शाखा का

   प्रारम्भ किया ।

-16 पुस्तकें प्रकाशित 

  4 E-Audio Book मेरी आवाज में 

    Amazon पर उपलब्ध      

* अनेक साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित

*समाचार पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ नियमित प्रकाशित होती हैं। 

* ई-प्रकाशन अनेकों मंचों से रचनाएँ प्रकाशित व पुरस्कृत 

*अनुवाद - 

  अनेकों पुस्तकों का 

      गुजराती व अंग्रेज़ी से 

         हिन्दी में अनुवाद 

समीक्षक - 93 प्रख्यात 

 साहित्यकारों के पुस्तकों की समीक्षा का सुअवसर मिला। कुछ का समावेश 

2025 में “ जीवन मित्र “ समीक्षा संग्रह प्रकाशित 

सम्पादक - 

 “ प्रवासी अमृतांजलि”

 “ प्रवासी भावांजलि “ 

( मोदी जी का यशोगान )

विदेश के 42 देशों के 86 महिला काव्य मंच के इकाई अध्यक्ष की रचनाओं का साझा संकलन का सम्पादन एवं प्रकाशन 

नाटक 

-राज्य स्तर पर पुरस्कृत एवं 

     दूरदर्शन पर गुजराती अनुवाद के साथ प्रसारित,

आकाशवाणी से प्रसारित 

*दूरदर्शन पर साक्षात्कार 

  एवं मनोवैज्ञानिक वार्ता

    प्रसारित 

अनेक संस्थाओं की सदस्य एवं पदाधिकारी 

  प्रमुखत:- साहित्यालोक,

 साहित्यसेतु-अहमदाबाद

  नई दिशाएँ,पहचान,

उर्दू दोस्त, संस्कार भारती,

  महिला काव्य मंच, 

  विश्व मैत्री मंच 

  विश्व हिन्दी ज्योति ,

  ग्लोबल हिन्दी ज्योति 

 विश्व हिन्दी परिषद् 

 विदेश संरक्षक 

    महिला काव्य मंच

वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच 

*संरक्षक एवं निदेशक 

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच

*परामर्शन  मंडल सदस्य- 

    अंतर्राष्ट्रीय विश्व भाषा  अकादमी 

-कार्यकारिणी सदस्य —

  संत साहित्य अकादमी 

  दधीचि देहदान समिति

अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित 

विश्व हिन्दी परिषद् द्वारा मनोनीत अध्यक्ष ,अमेरिका 

पता —

भारत -

2326/9,’उदार विला’

डी.सी.मॉडल स्कूल के पास 

फ़रीदाबाद-121006

हरियाणा , भारत 

( अभी अमेरिका में हूँ बच्चों के पास )

        1. किराएदार 


“ इस बार का पैसा अभी मेरे बैंक में नहीं आया। “

“ आ जाएगा ।”

“ कब आएगा ?”

“ जब मेरे पास आएगा, मैं डाल दूँगा।”

“ तुम्हारी तनख़्वाह नहीं मिली अभी तक,तो बहू की तो आ गई होगी।उससे ले कर भेज दो ।”

“ कैसी माँ हो ! इतना तो कोई गै़र मकान मालिक भी किराएदार से नहीं माँगता।”

“ मैं तो ऐसी ही हूँ।बड़े नाज़ों से पाला है मैंने तुझे। “

“ तभी सारे नखरे मेरे साथ कर रही हो। छोटे को तो कुछ बोल नहीं पाती हो। जिस दिन इस घर से निकल गया न, पलट कर नहीं आऊँगा।”

“ मत आना और ये निकल जाने की धमकी किसे दे रहा है। हिम्मत है तो निकल कर दिखा दे। नहीं जा सकता और नहीं जी पाएगा।”बहू कमरे में बैठी माँ-बेटे के संवाद सुन रही थी। अचानक दो अटैची लिए बाहर आई। आकाश का हाथ थामा। नाराज़ हो रही सासू माँ के पैर छू कर, आशीर्वाद लिया और दहलीज़ पार कर गई।आज आकाश, आकाश छू रहा है। महलनुमा मकान है।सब सुख -सुविधा, साधन है। 

“ आज खाना नहीं बनेगा क्या ?”

छोटी बहू की कर्कश आवाज़ से सासू माँ की तंद्रा टूटी। पश्चाताप के आंसू नहीं ,ख़ुशी के आंसू थे आँखों में।उसके कठोर वाक्यों ने बड़े बेटे की ज़िन्दगी सँवार दी थी।पति से ले कर परिवार के सभी ताना देते थे कि अपने कलेजे से चिपका कर रखा है तभी आगे नहीं बढ़ पा रहा।माँ के पल्लू में सुरक्षित महसूस करता है। कभी कुछ कर नहीं पाएगा। बदलते समय को याद करती, मन ही मन ख़ुश होती, रसोईघर की ओर बढ़ गई। ***


            2. भाग्य 


“ अरे ! सुमीता ! “ केशव ने पुकारा तो सुमीता ने पीछे मुड़ कर देखा सामने केशव खड़ा विस्फारित नेत्रों से उसे देख रहा है। अनेकों प्रश्न उसकी आँखों में  चित्रलिखित से तिरते नज़र आए जो पढ़े जा सकें।जो ज़ुबान पर आने की होड़ में खड़े दिख रहे थे। 

“ केशव…?” तुम यहाँ …? कब से यहाँ हो …? यहाँ क्या कर रहे हो ..? पहले बताया क्यों नहीं ..? ऐसे तार तोड़ कर भागे मानो मुझसे कोई रिश्ता ही नहीं था ? “  सुमीता ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।केशव के प्रश्न आँखों से बहुत दूर जा रहे थे, ज़ुबान से भी। ये ही तो वे प्रश्न थे जो वो भी पूछना चाह रहा था। 

“ शांति-शांति !! साँस तो ले लो बाबा । इतने सारे प्रश्न एक साथ सोच कैसे लेती हो तुम ? तुम्हारी पुरानी आदत अभी भी बिल्कुल वैसी ही है। ज़रा भी नहीं बदली हो तुम? “ केशव की आँखों में आश्वस्त होने का भाव उतर आया था। एक उम्मींद की किरण आज भी सलामत थी।

“ क्यूँ बदलूँ मैं ख़ुद को । मैं जो हूँ वो हूँ, बदले मेरी जूती ? जिसे नहीं पसंद वो दूर रहे मुझसे।” वही तेवर, वही लहजा, कुछ भी तो नहीं बदला था। केशव का मन बल्लियों उछलने लगा। मतलब आज भी सुमीता मेरी है। बीस साल ! बीस साल, सम्पर्क टूटने के बाद भी संबंध नहीं टूटा था। दोनों आज भी उसी तार से जुड़े हुए थे। वही कशिश, वही ख़लिश, वही आकर्षण, वही खिंचाव। केशव पूर्णतः आश्वस्त था। 

“ अब तो कोई रुकावट नहीं ? “ 

केशव मौन तोड़ते हुए पूछा ।

“ नहीं !” कह कर सुमीता ने भी केशव का हाथ थाम लिया। दोनों एक साथ एक डगर पर आगे बढ़ गए। ***


     3. मेरा राजा बेटा 


“ सुना है तृप्ति और तरंग का तलाक़ हो रहा है ।” 

चौपाल की चर्चा में आज का यही विषय उठा दिया नलिनी ने,कारण तरंग की माँ आज चौपाल में नहीं आ सकेंगी ,यह तय था।

“सही मौक़ा देख सही बात की है जीजी आपने। “ मधु ने भी निंदा रस में डुबकी लगाई। 

“ समझ में नहीं आता है कि इतनी सुलझी हुई योग्य लड़की,घर,परिवार, 

रिश्तेदारी व नौकरी सब इतनी अच्छी तरह सँभाल रही है फिर भी पति से पंगा किस बात का है? “नलिनी ने आश्चर्य करते हुए कहा। 

रजनी जो बहुत नज़दीकी रिश्तेदार भी थी और सभी से तृप्ति की तारीफ़ ही सुनती थी। ख़ुद भी तृप्ति को इसी वजह से प्यार भी बहुत करती थी, बोल पड़ी। 

“ पंगा पति से नहीं है । असली परेशानी तो पति की अम्मा है। “चुटकी लेते हुए तृप्ति के पड़ोस में रहने वाली भारती बोल पड़ी जिसे तृप्ति के घर का पूरा हाल आँखों देखा सुनायी देता था। 

रजनी ने खुलासा किया तो सभी ने सुन कर दांतों तले उँगली दबा ली।

फिर भी और चटख़ारा लेने के लिए रंजना ने पूछ लिया ।

“ क्या मतलब ..?”

“मतलब यह कि अब वो ज़माना गया जब हमेशा बेटी की माँ को दोष देकर अपना पल्ला झाड़ लेते थे कि दोष बहू में और उसकी माँ की सीख में ही है। यही मानते थे। अब बेटी की माएँ नहीं सिखातीं। 

अब बेटे की अम्माँ बेटों को अपने क़ाबू में रखने के लिए उल्टी-सीधी बातें कर के बेटों को बहू के ख़िलाफ़ भड़काती रहती हैं। ख़ास कर तब और अधिक,जब बेटों के साथ रहती हैं।जानती हैं ऐसा न किया तो बेटा तो मुझे पूछेगा नहीं। कुछ कमज़ोर दिल के बेटे बच्चे ही बने रहते हैं।अब इन बेटों को माँ के आँचल से बाहर लाना पड़ेगा।”

भारती ने कहा 

“ तृप्ति और तरंग के विवाद में आप यह सब इतना किस आधार पर कह रही हैं।”

 मधु ने पूछ लिया। 

“ मैं तो इनके घर की आँखों देखी, कानों सुनी गवाह हूँ। फिर बहुत कुछ तो तरंग की माँ ने ही मुझे बताया है।” भारती ने पूरे आत्मविश्वास से स्पष्टता की। 

“ क्या बताया ?” मधु की उत्सुकता और बढ़ी । 

यही कि 

‘ जब देखती हूँ कि बेटा हाथ से निकला जा रहा है , बहु का चुम्बकीय आकर्षण बढ़ रहा है तब एक दाँव चल देती हूँ ।’ भारती ने तरंग की माँ के वाक्य बिल्कुल उसी की तरह कह डाले ।

‘ क्या …? दाँव …?’ 

 “ हाँ । मैंने भी तरंग की माँ से यही पूछा था तो उन्होंने बताया कि मैं 

 बेटे के माथे को चूमती हूँ,सिर पर प्यार से हाथ फेरती हूँ। सारा प्यार उड़ेल कर एक मंत्र परोस देती हूँ।”

“ मंत्र ..? कौन सा मंत्र ..?”मधु ने भारती के और नज़दीक आ कर पूछा ।

भारती ने भी तरंग की माँ के लहज़े में जैसा उन्होंने भारती को बताया था कहा—“ मेरा…राजा…बेटा..।”

 बस बेटा मेरे आँचल में समा जाता है।कहते हुए कुटिल मुस्कान आ जाती है अम्माँ रानी के होंठों पर।”

  अचानक तरंग की माँ को आता देख,सभी धीरे-धीरे उठ कर अपने-अपने घरों की ओर चल दीं। ***


       4.  परित्यक्ता 

                   

“ सुनो ऽऽऽऽऽ..”मोहिनी ने मोहित के क़रीब आते हुए बड़े प्यार से कुछ  कहना चाहा ..

“अभी सो जाओ ,कल सुनूँगा ।आज बहुत थका हुआ हूँ ।”

“ तुम तो रोज़ ही थके रहते हो।(ग़ुस्सा दिखाते हुए मोहिनी ने कहा )आज तो आधी रात कर दी,ऐसा भी क्या काम बढ़ा लिया है ?बताते क्यूँ नहीं,कहाँ देर करते हो ?”

 “ हाँ !देर हो गई।”

    अनमने मन से मोहित ने कहा और कपड़े बदल कर बिना खाना खाए सोने चला गया ।

मोहित ने मोहिनी की पीड़ा कनखियों से देखा,महसूस भी किया,

मुस्कुराया,फिर करवट बदल कर सो गया ।

    मोहिनी,मोहित के बदलते व्यवहार को देखती रह गई,कुछ बोल न सकी,अतीत में खो गई कि कैसे वह भी तो झटक दिया करती थी ,हमेशा यह कह कर कि 

“ आज नहीं “

“अभी नहीं “

“ बहुत थकी हूँ “

“ तुम्हें तो बस एक ही बात सूझती है!.”

      आज वह स्वयं अपने ही कारण ख़ुद को परित्यक्ता महसूस करने लगी थी।हाँ !वह  ही तो दोषी है ।वह मन ही मन बिलख- बिलख कर रो पड़ी । ****


         5. अजनबी 


“ कौन हो ?

“कहाँ चले आ रहे हो ?”

“ क्या चाहिए तुम्हें ?”

“ ये क्या दादागिरी है ?”

“ कुछ पूछ रही हूँ मैं ?”

“ कुछ बताते क्यों नहीं?”

“ सुन सकोगी ..?”

“ तुम्हारी बेटी मुझसे शादी करने जा रही है । “

 “ अच्छा तो तुम भगा कर ले गए हो मेरी बेटी को ?”

 “ नहीं ! मैं भगा कर नहीं ले गया हूँ । वह मेरे साथ भागने के लिए तैयार है। यही बताने आया  हूँ। “

  “ क्या कहना चाहते हो ?”

  “ यही कि वो आपके बंधन से मुक्त होना चाहती है। “

  “ मेरे बंधन से …?”

  “ ऐसा ही कहती है “

  “ तुम स्वतंत्र करोगे ?”

  “ हाँ ?”

  “ नाम क्या है तुम्हारा ?”

  “ आफ़ताब ?”

  “ तुम .. और स्वतंत्रता ..?”

 “ हॉं ! तुमसे स्वतंत्रता 

    तो दिला ही दूँगा शायद

    पूरी स्वतंत्रता।”

“ नासमझ लड़की ..” ***

  लघुकथाओं में  भी "उदारता" 

डॉक्टर  दुर्गा सिन्हा जी 'उदार' - अपने "उदार " नाम के अनुकूल प्रस्तुत  लघुकथाओं में  भी "उदारता" दिखाई दे रही है। सकारात्मक और नकारात्मक समीक्षा 

1.  किरायेदार :-  

सबसे महत्वपूर्ण  किरदार है "बहू"।बेटा केवल कहता है ऐक्शन  तो बहू करती है।शीर्षक  किरायेदार  न होकर " हटा हुआ पल्लू" होता तो रोमांस  आता । पाठकगण में उत्सुकता निर्माण  करता।  काल खण्ड  बडा है। विकास का पृष्ठभाग  और अधिक स्पष्ट करना चाहिए। 

2.भाग्य:- 

दो पुराने प्रेमियों के पुनर्मिलन की कथा।लेकिन बिछड़े क्यों का अभाव होने पर असमंजस  की स्थिति बना रही है।

3.मेरा राजा बेटा:- 

कथानक उत्तम। कुटिल माँ बेटे को अपने तरह- पल्लू से बांधकर  रखना चाहती है । ऐसे में बहू चाल समझकर वार करना चाहिए। एक और कैकई शीर्षक कैसा है

4.परित्यक्ता:- 

समझदारी और सामंजस्य के अभाव में  यह स्थिति आती है। प्रश्न यह है कि पत्नी  पहले क्यों मना करती रही बनावटीपन  अधिक  है।

‍5.अजनबी: -

लव जेहाद आधारित  कथानक। मां के संस्कारों  के उत्पन्न  स्थिति। शीर्षक  मुक्ति दीजिए 

- लक्ष्मण  शिवहरे

नागपुर - महाराष्ट्र 


     सांकेतिक  भाषा में लिखी गई लघुकथा

यह  सभी लघुकथाएं प्रख्यात  लेखिका डाॅ. दुर्गा सिन्हा 'उदार' की हैं। इनकी समीक्षा सूरज  को दिया दिखाने जैसा है। :-

'किराएदार '

इस लघुकथा में पुत्र को अपना ही घर किराए  जैसा प्रतीत होता है। माँ,पुत्र  को कर्मशील  बनाने के लिए पैसा बैंक  में डालने का दबाव  बनाती है।आत्मसम्मान  को ठेस लगने पर वह घर छोड  देता है। बाहरी दुनिया का संघर्ष  उसे कर्मशील  बना देती है। माँ बेटे की सफलता देख  कर खुश  है,उसे अपना गम नहीं है।गम्भीर  बिमारी खत्म  करने के लिए कड़वी  दवा देनी पड़ती  है।

'भाग्य '

 इस लघुकथा में एक पंक्ति काफी महत्वपूर्ण  है कि ' भाग्य  में हो तो बिछड़े अनायास  मिल जाते हैं।' पात्रों के दिल का साथ  बीस साल  बाद  भी पहले जैसा ही बना रहा तुरंत जिंदगी साथ  गुजारने को हाथ  पकड़ लेते हैं।

 ' मेरा राजा बेटा'

समाज  में सास-बहू का ताल मेल न होना एक  साधारण  सी बात  हो गई  है। इसका प्रपंच  आस - पास  की औरतें कितना चटकार लेकर करती हैं । इसी विसंगति को दिखाया गया है।सतर्क  हो जाएं।

  'परित्यक्ता'

 मोहनी स्वयं को क्यों दोषी मान रही है। मोहनी किरदार  की भूल को इंगित  करना लघुकथा को निखार  देता।

'अजनबी'

इस लघुकथा की गूढ़ता नहीं समझ  पा रही हूँ। दो विषय  हो सकता है। एक  अजनबी जो कथित दूसरे धर्म  का है उसकी ईमानदारी या चारित्रिक सत्यता। दूसरा आफताब  का अर्थ  चमक  है। सांकेतिक  भाषा में लिखी गई लघुकथा है। इंगित  करता है चमक-दमक  के पीछे भागना मूर्खता है स्वतंत्रता नहीं।

- कमला अग्रवाल 

गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश 

   पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1.किराएदार 

नये जमाने का प्रतिबिंब है। साथ ही नयी चुनौतियों और नये जीवन संघर्ष की ओर उन्मुख पीढ़ी का मौन संकेत भी।

 2.भाग्य 

 संबंध" भी रखा जा सकता था।जन्मों के बंधन कभी नहीं टूटते।कथा की भावभूमि अच्छी है, लेकिन लगता है बहुत जल्दी - जल्दी में सारा कुछ कह दिया गया हो।इसे और सुगठित बनाया जा सकता था।

3.मेरा राजा बेटा 

जीवन के एक पक्ष को इंगित कर रही है।एकांगी कथावस्तु।

4.परित्यक्ता 

पति-पत्नी के बीच के नैसर्गिक प्रेम संबंध की खूबसूरत अभिव्यक्ति है। अच्छी रचना।

5. अजनबी

 लघुकथा पूरी तरह कथानक को स्पष्ट नहीं कर पा रही। स्वतंत्रता किस्से चाहिए और क्यों चाहिए, इसका तर्कसंगत प्रकटन जरूरी प्रतीत होता है।

- विजयानन्द विजय 

     बक्सर - बिहार 

 मनोविज्ञान की सशक्त अभिव्यक्तियाँ

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ समकालीन पारिवारिक और सामाजिक यथार्थ की तीखी, संवेदनशील तथा मनोवैज्ञानिक पड़ताल करती हैं।इनकी ‘उदार’ लेखनी का प्रमुख गुण है, मानवीय संबंधों की भीतरी परतों को पकड़ने की क्षमता। उनकी लघुकथाओं में माँ-बेटे का संबंध, दाम्पत्य का बदलता मनोविज्ञान, स्त्री की स्वतंत्रता, पारिवारिक सत्ता-संघर्ष और भावनात्मक नियंत्रण जैसे विषय अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरते हैं।

 1. “किराएदार” : ममता का कठोर रूप

यह लघुकथा माँ के उस मनोविज्ञान को सामने लाती है जिसमें कठोरता के भीतर छिपा हुआ दूरदर्शी प्रेम विद्यमान है। प्रारंभ में माँ का व्यवहार स्वार्थी और कठोर प्रतीत होता है किंतु अंत तक आते-आते वही कठोरता बेटे के जीवन को दिशा देने वाली शक्ति सिद्ध होती है। कथा का सबसे प्रभावी पक्ष इसका अंत है।“पश्चाताप के आँसू नहीं, खुशी के आँसू थे आँखों में।”यह पंक्ति पूरी कथा का अर्थ बदल देती है। लेखिका ने यह दिखाया है कि कभी-कभी अत्यधिक संरक्षण भी व्यक्ति की प्रगति में बाधा बन जाता है। शीर्षक “किराएदार” प्रतीकात्मक है।अपनों के बीच भी संबंध कभी-कभी लेन-देन और निर्भरता के दायरे में सिमट जाते हैं।

2. “भाग्य” : अधूरे प्रेम का पुनर्मिलन

यह कथा समय के लंबे अंतराल के बाद भी जीवित भावनात्मक संबंधों की कहानी है। संवादों में पुरानी आत्मीयता, तकरार और अपनापन एक साथ दिखाई देता है।“मैं जो हूँ वो हूँ, बदले मेरी जूती ?” यह संवाद सुमीता के व्यक्तित्व को अत्यंत जीवंत बना देता है। कथा का सौंदर्य इसकी सहजता में है। बीस वर्षों का अंतराल होते हुए भी संबंधों की ऊष्मा समाप्त नहीं होती,यह भाव कथा को भावुकता से ऊपर उठाकर संवेदनात्मक गहराई प्रदान करता है।यदि कथा का अंत थोड़ा और विस्तार पाता तो पुनर्मिलन की भावनात्मक तीव्रता और अधिक प्रभावशाली बन सकती थी।

3. “मेरा राजा बेटा” : मातृत्व का नियंत्रक पक्ष

यह अत्यंत समकालीन और साहसिक विषय पर लिखी गई प्रभावशाली लघुकथा है। सामान्यतः पारिवारिक विवादों में बहू को दोषी ठहराने वाली मानसिकता पर लेखिका ने तीखा व्यंग्य किया है।“मेरा…राजा…बेटा..।”यह छोटा-सा मंत्र पूरी कथा का केंद्र बन जाता है। लेखिका ने दिखाया है कि भावनात्मक नियंत्रण किस प्रकार वैवाहिक संबंधों को प्रभावित करता है। कथा का संवाद-विन्यास अत्यंत स्वाभाविक और रोचक है, जिससे चौपाल का वातावरण जीवंत हो उठता है।यह लघुकथा केवल सास-बहू विवाद नहीं अपितु भावनात्मक स्वामित्व और मानसिक नियंत्रण की समस्या को भी रेखांकित करती है।

4. “परित्यक्ता” : उपेक्षा का प्रतिफल

यह अत्यंत मार्मिक और मनोवैज्ञानिक लघुकथा है। दाम्पत्य जीवन में भावनात्मक दूरी कैसे जन्म लेती है इसे लेखिका ने बहुत सूक्ष्मता से चित्रित किया है। “आज नहीं”, “अभी नहीं”, “बहुत थकी हूँ,”ये छोटे-छोटे वाक्य पूरी वैवाहिक दूरी का आधार बन जाते हैं। कथा का सबसे बड़ा गुण इसका आत्मबोध है। मोहिनी स्वयं को पीड़िता मानते-मानते अंततः अपनी भूमिका को पहचानती है। यह आत्मस्वीकृति कथा को गंभीरता प्रदान करती है।बहुत कम शब्दों में संबंधों की टूटन और भावनात्मक रिक्तता का प्रभावशाली चित्रण इस रचना को उल्लेखनीय बनाता है।

5. “अजनबी” : स्वतंत्रता का भ्रम

यह लघुकथा वर्तमान सामाजिक परिवेश, प्रेम, विद्रोह और तथाकथित स्वतंत्रता के प्रश्नों को बहुत तीखे ढंग से सामने लाती है। कथा का सबसे प्रभावी पक्ष इसका अंत है। “तुमसे स्वतंत्रता तो दिला ही दूँगा शायद पूरी स्वतंत्रता।” यहाँ “पूरी स्वतंत्रता” व्यंग्यात्मक और भयावह दोनों अर्थों में उपस्थित होती है। लेखिका ने बिना किसी प्रत्यक्ष टिप्पणी के पाठक को सोचने पर विवश किया है कि हर विद्रोह वास्तव में मुक्ति नहीं होता। “नासमझ लड़की” पर समाप्ति कथा को खुला आयाम देती है और पाठक के भीतर एक बेचैनी छोड़ जाती है।

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, पारिवारिक संबंधों और मानवीय मनोविज्ञान की सशक्त अभिव्यक्तियाँ हैं। उनकी भाषा सहज, संवाद स्वाभाविक और कथ्य समकालीन है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

  प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत

डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ की इन पाँचों लघुकथाओं में पारिवारिक संबंधों, मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, स्वार्थ, भावनात्मक नियंत्रण और सामाजिक विडम्बनाओं को अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया गया है।

1. “किराएदार”

यह लघुकथा माँ के कठोर व्यवहार के भीतर छिपे त्याग और दूरदर्शिता को उजागर करती है। लेखक ने दिखाया है कि कई बार अति-सुरक्षा भी व्यक्ति को निर्भर बना देती है। यहाँ भावनात्मक कांक्रोच की तरह चिपकी हुई निर्भरता को तोड़कर माँ बेटे को आत्मनिर्भर बनाती है। अंत का पश्चाताप नहीं बल्कि संतोष कथा को प्रभावी बनाता है।

2. “भाग्य”

यह कहानी अधूरे प्रेम और समय के बाद भी जीवित भावनाओं का चित्रण करती है। संवाद स्वाभाविक हैं और पात्रों का आकर्षण सहज प्रतीत होता है। लेखक ने यह संकेत दिया है कि सच्चे संबंध परिस्थितियों के परजीवी नहीं होते, वे समय की दूरी के बाद भी जीवित रह सकते हैं।

3. “मेरा राजा बेटा”

यह सबसे तीखी सामाजिक व्यंग्यात्मक लघुकथाओं में से एक है। इसमें माँ के अति-अधिकारवादी व्यवहार को उजागर किया गया है, जो बेटे के वैवाहिक जीवन पर परजीवी की तरह नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। “मेरा राजा बेटा” वाला भाव मनोवैज्ञानिक कांक्रोच की तरह बार-बार उभर कर संबंधों को खोखला करता है। कथा वर्तमान पारिवारिक विघटन पर तीखा प्रहार करती है।

4. “परित्यक्ता”

यह दाम्पत्य संबंधों में उपेक्षा और भावनात्मक दूरी का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। लेखक ने बिना उपदेश दिए यह स्पष्ट किया है कि संवेदनहीनता धीरे-धीरे संबंधों को भीतर से खा जाने वाले परजीवी में बदल जाती है। अंत आत्मबोध से भरा हुआ है।

5. “अजनबी”

यह लघुकथा आधुनिक संबंधों, स्वतंत्रता की भ्रमित अवधारणा और सामाजिक-सांस्कृतिक टकराव पर केंद्रित है। अंतिम पंक्ति पूरी कथा का सार बन जाती है। यहाँ “पूर्ण स्वतंत्रता” का संकेत एक ऐसे कांक्रोच मानसिकता वाले विद्रोह की ओर है, जो वास्तविकता को समझे बिना केवल बंधन तोड़ना चाहता है।

समग्रतः

डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार’ की लघुकथाएँ कम शब्दों में गहरी सामाजिक चोट करने की क्षमता रखती हैं। इनमें संवाद प्रधान शैली, मनोवैज्ञानिक पकड़ और सामाजिक यथार्थ का सशक्त समावेश दिखाई देता है। सम्भवतः जो आग आज युवाओं को कांक्रोच और परजीवी कहने पर युवा एकत्रित हो गया। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

  पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1. “किराएदार” — 

यह लघुकथा माँ-बेटे के रिश्ते की जटिल मनोभूमि को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। शुरुआत में माँ का व्यवहार कठोर और स्वार्थी प्रतीत होता है, लेकिन अंत में कथा एक अप्रत्याशित मोड़ लेकर पाठक को सोचने पर विवश कर देती है। लेखिका ने दिखाया है कि कभी-कभी कठोरता भी प्रेम का दूसरा रूप हो सकती है। बहू का मौन समर्थन और बेटे का आत्मनिर्भर बन जाना कथा को भावनात्मक ऊँचाई देता है। “किराएदार” शीर्षक अत्यंत सार्थक है, क्योंकि यह अपने ही घर में संबंधों के आर्थिक और मानसिक स्वरूप पर तीखा व्यंग्य करता है।

2. “भाग्य” — 

यह लघुकथा अधूरे प्रेम की उस संवेदना को छूती है जो समय बीत जाने पर भी मन के किसी कोने में जीवित रहती है। संवाद शैली अत्यंत स्वाभाविक और प्रवाहमयी है।बीस वर्षों बाद भी दोनों पात्रों के बीच वही अपनापन, वही आकर्षण और वही भावनात्मक धड़कन कथा को गहरी रोमांटिक ऊष्मा प्रदान करती है। “मैं जो हूँ वो हूँ” जैसे संवाद नायिका के आत्मविश्वासी व्यक्तित्व को सशक्त रूप से उभारते हैं।कथा का अंत पाठक को संतोष देता है कि भाग्य ने अंततः बिछड़े प्रेमियों को मिला दिया। संक्षिप्त होते हुए भी कथा भावनात्मक प्रभाव छोड़ती है।

3. “मेरा राजा बेटा” — 

यह लघुकथा पारिवारिक संबंधों में माँ-बेटे के अस्वस्थ भावनात्मक लगाव और उससे उत्पन्न वैवाहिक तनाव पर तीखा सामाजिक प्रहार करती है। लेखिका ने बड़ी सहजता से उस मानसिकता को उजागर किया है जहाँ कुछ माताएँ बेटे को “अपना अधिकार” मानकर बहू को प्रतिद्वंद्वी समझने लगती हैं।“मेरा…राजा…बेटा…” वाला मंत्र कथा का सबसे प्रभावी और व्यंग्यपूर्ण बिंदु है। चौपाल शैली में कथा का प्रस्तुतीकरण इसे अधिक जीवंत बनाता है।यह लघुकथा केवल एक परिवार की नहीं बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों की वास्तविक तस्वीर बनकर सामने आती है।

4. “परित्यक्ता” — 

यह अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक लघुकथा है। पति-पत्नी के संबंधों में भावनात्मक और शारीरिक दूरी किस प्रकार धीरे-धीरे रिश्ते को खोखला कर देती है, इसे बहुत मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है।कथा का सबसे बड़ा गुण इसका आत्मबोध है। जब मोहिनी स्वयं अपने अतीत को याद कर अपनी वर्तमान पीड़ा का कारण समझती है, तब कथा केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहती बल्कि आत्मविश्लेषण का रूप ले लेती है।संवाद छोटे हैं, पर गहरी चोट करते हैं। अंत अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक है।

5. “अजनबी” — 

यह लघुकथा सामाजिक और सांस्कृतिक टकराव के साथ-साथ “स्वतंत्रता” की वास्तविकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। कथा बहुत कम शब्दों में गहरी आशंका और विडंबना व्यक्त करती है।माँ और युवक के बीच का संवाद तनावपूर्ण होने के साथ अर्थपूर्ण भी है। “तुम … और स्वतंत्रता …?” तथा “शायद पूरी स्वतंत्रता” जैसे वाक्य कथा को बहुस्तरीय बना देते हैं।

अंतिम पंक्ति — “नासमझ लड़की” — माँ की विवशता, अनुभव और भय को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। यह कथा पाठक को किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाती, बल्कि सोचने के लिए छोड़ देती है, जो इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

- अलका पांडेय 

मुंबई - महाराष्ट्र 

  सभी लघुकथा यथार्थ की धरातल पर

डॉ. दुर्गा सिन्हा ' उदार ' जी की पाँच लघुकथा पढ़ने का अवसर मिला. सभी लघुकथा यथार्थ की धरातल पर लिखी गई हैं.पहली लघुकथा ये सिद्ध करती है कि कुछ अच्छा करने के लिए कुछ कड़ा कदम उठाना पड़ता है. दूसरी लघुकथा में संबंधों के टकराव और भाग्य को प्रधानता दी गई है. तीसरी लघुकथा महिलाओं के बतगुंजन पर आधारित है. चौथी और पाँचवी लघुकथा मुझे बहुत अच्छी लगी. चौथी लघुकथा पति-पत्नी के संबंधों पर आधारित है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ऐसी घटना प्रायः हर पति पत्नी के साथ घटित होती है. यह लघुकथा एक दम सत्य है एक पश्न पाठकों के मन पर छोड़ती है कि ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा होना ठीक हैं. पांचवीं लघुकथा तो आज की ज्वलंत समस्या की तरफ इशारा करती है जो लड़कियां विधर्मीयों से प्रेम कर माँ बाप से आजादी चाहती हैं. तथाकथित ये प्रेमी अपना मतलब सिद्ध होने पर उन्हें सचमुच इस दुनिया से ही आजाद कर देते हैं. फिर भी हिन्दू माँ-बाप न ध्यान देते हैं न उनकी लाडलियां. आजाद होने को तैयार रहती हैं. बहुत सुन्दर लघुकथाएं 

 - दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

   पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1. किराएदार 

प्रस्तुत लघु कथा "किराएदार" में आदरणीया डा दुर्गा देवी सिन्हा उदार जी ने किराएदार के रूप में रखे हुए अपने बेटे की वार्तालाप को दर्शाया है। और किरया न देने के कारण उसे घर से निकालने पर उसका बहुत कामयाब होना। मन ही मन खुश होना। कई बार अपने से दूरी कर भी बच्चा असली सफलता को प्राप्त कर लेता है।

2.भाग्य 

लघु कथा भाग्य में आदरणीया डॉ दुर्गा सिन्हा जी ने केशव ओर सुमीता जो की बीस साल पहले आपस में प्रेम करते थे। बीस साल बाद केसव के वापस आने पर सुमीता का व्यवहार बिल्कुल भी नहीं बदला था। वह अभी भी केशव की राहा तक रही थी। और केसव की ही थी। इसे कहते हैं भाग्य !जिससे प्रेम किया उसी का अंत में मिल जाना। 

3. मेरा राजा बेटा

 मैं अलका जैन आनंदी आदरणीय डा दुर्गा सिन्हा जी के द्वारा रचित लघु कथा "मेरा राजा बेटा" की समीक्षा करने की कोशिश करती हूं ।जितना मैं समझ पाई। एक जगह  चौपाल की चर्चा चल रही है ।जिसमें एक ही सोसाइटी की कुछ कहने को  पढ़ी लिखी महिलाएं इकट्ठी हुई है। जो की एक फैमिली जो इस समय वहां उपस्थित नहीं हैं। उनके बहू बेटे में कुछ तकरार हो गई है ।बेटे की मां का बहु के खिलाफ उकसाने के कारण। उसी के बारे में बड़े मिर्च मसाले लगा- लगा के चर्चा चल रही है। कुछ की आंखों देखी, कुछ बहू -बेटे की मां के कहने को मित्र हैं। जो चारों तरफ आग फैला रहे हैं। 

 4. परित्यक्ता

परित्यक्ता लघु कथा में आदरणीया डॉ दुर्गा सिन्हा  जी ने मोहित और मोहिनी के निजी जीवन के बारे में, जीवन की सच्चाई बहुत सुंदर शब्दों में बताई हैं।पहले मोहिनी द्वारा मोहित की अनदेखी करना। फिर मोहित द्वारा मोहिनी की अनदेखी करना, दर्शाया गया है ।बहुत ही सुंदर शब्दों द्वारा। 

5. अजनबी

मैं अलका जैन आनंदी आदरणीया डॉ दुर्गा देवी सिन्हा जी की पांच लघु कथाओं में अंतिम लघु कथा मतलब पांचवी अजनबी की समीक्षा करने की कोशिश करती हूं ।जिसमें आफताब एक हिंदू लड़की की मां से ही किस तरह बात करता है ।और उसकी परवरिश को धिक्कारता है कि तुम्हारे से स्वतंत्रता दिलवाने आया हूं।जैसे उसे कोई चुनौती दे रहा हो। 

- अलका जैन आनंदी 

     दिल्ली - भारत 

     आप विभिन्न विधाओं की विशेषज्ञ

डा.दुर्गा सिन्हा 'उदार ' वास्तव मैं उदारमना हैं ।मुझे विश्व मैत्री मंच ,एवं वरिष्ठ साहित्यकार डा.सविता चड्ढा के कार्यक्रम में उनसे मिलने का सौभाग्य मिला है । आन लाइन कार्यक्रम़ों  वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच में लघुकथा ,हाइकु ,वैश्विक हिन्दी संस्थान ,हृयूस्टन विश्वविद्यालय यू.एस. ए.के आन लाइन कार्यक्रमों में उनका संचालन एवं सहभागिता दोनो ं ही पक्षों का मैं साक्षी रहा हूँ । उनका साहित्यिक क्षेत्र का अनुभव विस्तृत  है ।आप विभिन्न विधाओं की विशेषज्ञ हैं । उनकी सभी लघुकथाओं में यह परिलक्षित भी  हो रहा है ।मेरे विचार निम्नवत हैं :-

1.किरायेदार :-  

इतिहास मैं अनेकों उदाहरण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि साधारण व्यक्ति के व्यक्तित्व में भी निखार आ जाता है बशर्ते उसके मन को उद्वेलित करने वाले वाक्य या घटना उसे प्रेरित करें और  कोई अपना उसका संबल बन जाये ।यहाँ माँ के चुनौती भरे शब्द व आकाश की पत्नी का संबल अप्रतिम उदाहरण हैं 

भाग्य ;-

जीवन एक चक्र है जहाँ कब अपने विछड़ जायें और कब अपने मिल जायें। दुनिया गोल है ।यदि प्रेम सच्चा हो और भाग्य प्रबल हो तो कुदरत भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाकर बिछुड़ों को मिला देती है । केशव व सुमिता का पुनर्मिलन  यही दर्शाता है ।

मेरा राजा बेटा :- 

जब तक परिवार में बेटे की माँ का दखल रहेगा तब तक पति को पत्नी के गुणों का और पत्नी को पति के गुणों का ज्ञान नहीं होगा जिसके कारण कलह एवं तलाक जैसी घटनायें घटित होती रहेगी ।तृप्ति और तरंग के मध्य विवाद की जड़ तरंग की माँ स्वयं ही हैं ।

परित्यक्ता : -

जब पत्नी द्वारा निरन्तर पति की भावनाओं की अनदेखी या अवहेलना की जाती है तो एक समय ऐसा आता है जब सम्बंधों में नीरसता आ जाती है और जीवन यंत्रचालित सा चलने लगता है ।संवेदनायें ,प्रेम की भावनायें मृत हो जाती हैं । मोहनी के व्यवहार के कारण ही मोहित का व्यवहार नीरस हो गया है ।

अजनबी :-

नासमझ लड़कियाँ आफताब जैसे लोगों के चक्रव्यूह में फँस जाती हैं और लव जेहाद में अपने प्राण गँवाकर सदा के लिए मुक्ति पा जाती हैं । दुर्गा जी ने  इशारों -इशारों में ही वर्तमान की गंभीर समस्या को उदघाटित किया है 

 -  निहाल चन्द्र शिवहरे      

        झाँसी - उत्तर प्रदेश 


      कथा तत्व और भाव

डॉ.दुर्गा सिंह "उदार" की पांच लघु कथाएं पढी।आज मैं अपनी समझ के अनुसार लघुकथा के कथा तत्व और भाव के नियमों के अनुरूप उक्त पांचो कथाओं की समीक्षा प्रस्तुत कर रहा हूं।

किराएदार -

इस लघु कथा का तथ्य सहज भाषा सरल होने के साथ ही अंतर्द्वंद से ग्रसित लघु कथा समाज के अनकहे किस्सों को संक्षेप में भली प्रकार बताती है। आकाश को अपने पल्लू से निकालकर उसे स्वतंत्र करने का तरीका बहुत उचित नहीं लगा यह तो रिश्तों को आहत करने वाला कृत्य है और मां का यह कथन कि" मैं तो ऐसी ही हूं बड़े नजरों से पाला है मैंने तुझे"! कुछ अजीब सा एक सामान्य रूप से हर मां का कथन लगता है। कथांत में मां को अतीत से वर्तमान ला कर मेरी समझ में लघु कथा के नियम समान कालखंड का कथन लेखिका द्वारा भवावेग में विस्तृत कर दिया गया है और यह लघु कथा से लघु कहानी के कलेवर में आ गई है ।

भाग्य - 

बीस साल के अंतराल पर केशव और सुमित का इस भाव से सहज मिलन का एक सकारात्मक संदेश देती है सकारात्मक लघु कथा जो संकेत में बात करती है बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति और बहुत सुंदर कथन हेतु लेखिका बधाई की पात्र हैं । मेरा राजा बेटा -आज के आधुनिक समाज के सभी परिवारों का सटीक चित्रण लेखिका द्वारा किया गया है तरंग की मां का मंत्र संभवत आज की अधिकांश माता द्वारा किया जा रहा है और परिवार विघटन का मुख्य कारक अब नंद जेठानी नहीं वरन सास बनती जा रही है। सटीक अभिव्यक्ति और वास्तविक मनोदशा का उत्तम रीति से वर्णन करने हेतु लेखिका को बधाई ।

परित्यक्ता - 

लेखिका ने अन्य लघु कथा के सापेक्ष यह सीमित पत्र और तथ्य की सुंदर कथा बुनी है। दांपत्य जीवन में एक पक्ष की अपेक्षा कब दूसरे के परित्यक्त कर दे पता ही नहीं चलता और बाद में सिर्फ पछतावा रह जाता है नकारात्मक तथ्य के बावजूद सकारात्मक संदेश देती हुई सुंदर लघुकथा ।

अजनबी -

आज के कृत्रिम प्यार में पागल मन को दर्शाती समाज के कटु अनुभवों का वर्णन करते साहसी लघु कथा जो वार्तालाप के रूप में है और उसमें ना समझ लड़की का उपयोग अनावश्यक लगा और यदि कहना ही था तो उसे आफताब से कहलाने पर तथ्य और प्रभावी हो सकता था।

- पी.एस.खरे "आकाश" 

पीलीभीत - उत्तर प्रदेश 


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Comments

  1. सभी लघुकथाएं सामाजिक सोच और समझ के दायरे में हैं ताकि लेखकीय दायित्व का पालन हो। निःसंदेह कुछ परिपाटियों को परिभाषित करने में दिक्कत महसूस हुई होगी लेकिन वह लेखनी साधुवाद की पात्र है जो पाठकों को सोचने पर विवश करे। माँ की बदलती परिभाषा और सोच हमें भी सोचने पर मजबूर करती है। डाॅ दुर्गा सिन्हा "उदार" की लेखनी साधुवाद की पात्र है।अतुल्य लेखकीय दायित्व निभाया है। 💐🙏👏
    - हेमलता मिश्र मानवी
    नागपुर महाराष्ट्र 440010
    (WhatsApp से साभार)

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  2. आ दुर्गा जी बहुत सही आंकलन किया है ऐसी घटनाये प्रातः घरों में होती है ! माँ कर्म को प्रतिष्ठा मान मन के किराए के घर में रही है 💐🙏
    भाग्य नहीं यही खटपट जीवन का आधार है जो जीवंत बने रहने पर सुकून एहसास होता हैं 💐🙏
    मेरा राजा बेटा पहले भी ऐसा था आज भी ऐसा ही है फिर बुरा मानने की आवश्यकता अंतर इतना है मैंने ही उसके लिए अपने जैसी लड़की ढूँडी फिर रोना किस बात का अब मेरा नहीं पत्नी का आँचल पकड़ जीना चाहता है ! तलाक नहीं होगा राजा बेटे की बात सुन हल निकालना होगा 💐🙏
    - अनिता शरद झा
    रायपुर - छत्तीसगढ़
    (WhatsApp से साभार)

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  3. 'किराए दार' लघुकथा
    एक मांँ की आत्मीय ममता, संवेदना और भावनाओं के होने का एहसास कराती है... माँ अपने बच्चे को सही राह पर लाने के लिए कठोर भी हो सकती है चाहे उसके लिए उसे अपनी ममता का गला क्यों ना घोंटना पड़े। दूर रहकर भी माँ के आशीर्वाद के साथ उठे रहते हैं। बहुत सुंदर प्रस्तुति।
    - चंद्रिका व्यास
    मुंबई - महाराष्ट्र
    ( WhatsApp से साभार)

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