नंदशंकर मेहता की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

        समय के आगे कुछ नहीं चलता है। समय से बड़ा कोई नहीं है। समय कभी लोट कर नहीं आता है। फिर आदमी भी कुछ कम नहीं होता है। आदमी के अपने गुण होते है। जो समय - समय पर बोलते रहते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है । अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:-
        यह कथन जीवन के गहरे सत्य को सहज शब्दों में व्यक्त करता है। समय निस्संदेह सबसे शक्तिशाली तत्व है; वह न किसी के लिए रुकता है, न किसी के अनुसार बदलता है। वह राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है। इतिहास इसकी असंख्य मिसालों से भरा पड़ा है। किन्तु मनुष्य भी केवल समय का खिलौना नहीं है। उसमें विचार, संकल्प और कर्म की अद्भुत शक्ति है। वह अपनी इच्छाशक्ति और परिश्रम से समय की दिशा तक मोड़ सकता है। विपरीत परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति धैर्य और संघर्ष बनाए रखता है, वही समय को अपने पक्ष में कर लेता है। समय अवसर देता है, पर उस अवसर को पहचानना और उसे साधना मनुष्य के हाथ में होता है। यदि समय बीतता है तो मनुष्य अनुभव अर्जित करता है; यदि समय चुनौती देता है तो मनुष्य साहस का परिचय देता है। इस प्रकार दोनों के बीच एक अदृश्य संवाद चलता रहता है—जहाँ समय परीक्षा लेता है और मनुष्य अपनी क्षमता सिद्ध करता है। अंततः यही कहा जा सकता है कि समय और मनुष्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। समय की गति अनवरत है, पर मनुष्य की जिजीविषा भी अडिग है। जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है और अपने कर्मों से उसे सार्थक बनाता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और संतोष प्राप्त करता है।

- अलका पांडेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

       यह अटूट सत्य है कि समय बड़ा बलवान है, यह निरंतर चलता रहता है लेकिन फिर भी मनुष्य अपनी मेहनत, धैर्य और बुद्धिमत्ता से कठिन समय को भी अनुकूल बना सकता है तभी तो तुलसीदास जी ने कहा है तुलसी नर का  क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान कहने का भाव समय ही राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है  इसलिए समय के अनुसार खुद को बदलना ही सफलता है तो आईये आज इसी पर चर्चा करते हैं कि समय बड़ा बलवान है लेकिन आदमी भी कुछ कम नहीं, मेरे ख्याल में  समय सचमुच में बहुत बलवान होता है इसके आगे कई महारथी व शक्तिशाली महान मनुष्य यहाँ तक की भगवान तक को भी समय ने  सुख, दुख के  मेले दिखा दिए लेकिन मनुष्य भी  अपनी दृढ़ता दिखाए बिना नहीं रहा, मनुष्य ने समय के साथ चलकर सही  योजना बना कर और हार न मान कर अपने भाग्य  को खुद लिख कर इतिहास रचा है क्योंकि कुछ व्यक्ति विपरीत समय में भी हंस कर और धैर्य रख कर मेहनत करके समय के चक्कर को बदलने में कामयाब हुए हैं लेकिन इसमें कोई शक की बात नहीं कि जो समय को बर्बाद करता है समय उसे नष्ट करने में कोई कसर नही छोड़ता और जो समय का सदुपयोग करता है वह विजेता बन जाता है,  अन्त में यही कहुँगा  कि जैसे समय किसी के लिए नहीं रूकता बैसे ही इंसान को भी अपने जीवन में लगातार कर्म करते रहने चाहिए क्योंकि जो समय की कद्र नही करते समय उनकी कद्र नही करता हालांकि समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम केवल भाग्य के भरोसे ही रहें क्योंकि मनुष्य का प्रयास ही समय तय करता है जब उसे सफलता मिलती है लेकिन कभी कभी हम समय की कमी का बहाना बनाते हैं लेकिन इंसान के पास बहुत से गुण और शक्तियां होती है जो हमें समय से अधिक मुल्यवान बना  सकती हैं इसलिए व्यक्ति अपनी सोच व मेहनत से समय का सही इस्तेमाल करके अपने भाग्य को भी बदल सकता है इसलिए मनुष्य भी समय से कम  नहीं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

          सुना तो अब तक यही है अपने बड़े-बुजुर्गों को कहते हुए समय से बड़ा बलशाली, शक्तिशाली कोई दूसरा नहीं। जिसका समय सही चल रहा होता है उसके कार्य की सफलता के संयोग सहीं बनते चले जाते हैं और समय सही न हो तो हवाओं के रूख भी बदल जाते हैं। लेकिन वह आदमी ही क्या जो समय के आगे घुटने टेक कर उसके बहाव में बहता चला जाये। दशरथ माँझी के नाम से तो सब परिचित ही है जो नहीं होंगे उन्हें उन पर बनी फिल्म ने उनसे परिचित होने का अवसर दिया होगा। उस जीवट के व्यक्ति ने जब पहाड़ काट कर रास्ता बनाने की ठानी तो अपनी जिजीविषा और जीवट से समय के शिलालेख पर अपना नाम अंकित करके जैसे हवाओं के रूख को ही मोड़ दिया, नदी के बहाव को जैसे और तेज होने को विवश कर दिया। यही है आदमी की शक्ति..वह अपने भाग्य के सितारों, ग्रहों की चाल बदल कर नया इतिहास लिख सकता है। किसने सोचा था कभी अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने को विवश हो जायेंगे। पर जब हर जन अपने-अपने ढंग से अंग्रेजों के विरुद्ध एक होकर काम करने लगे तो अपने को सर्वाधिक शक्तिशाली समझने वाले अंग्रेजों को भी भारतीयों के अदम्य शौर्य के आगे विवश होकर जाना पड़ा था। तो समय बहुत बड़ा और बलवान होता है पर जब आदमी अपनी पर आकर करने की ठान लेता है तो उसके अदम्य विश्वास, संकल्प, जीवट, जिजीविषा और करने की उत्कट इच्छा के सम्मुख समय को भी अपना निर्णय बदलना पड़ना है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

      दुनिया में अगर कोई बलवान है तो वह समय ही है. समय अगर बलवान है तो सबकुछ आपके अनुकूल है और अगर आपका समय कमजोर है, अच्छा नहीं है तो सब प्रतिकूल है. समय खराब होने से एक अदना सा आदमी आपको कुछ बोलकर चला जाएगा आप कुछ नहीं कर पाएंगे. वहीँ अगर समय बलवान है तो बड़े-बड़े महारथी आपके तलवे चाटते नज़र आयेंगे.  समय बुरा था तो महाराणा प्रताप को घास की रोटी खानी पड़ी. समय कमजोर था तो राजा हरिश्चंद्र को डोम के घर नौकरी करनी पड़ी. श्मशान में चौकीदारी करनी पड़ी. इससे साबित होता है कि समय बहुत बड़ा बलवान होता है. लेकिन ये तो इतिहास की बातेँ थी. परंतु आदमी भी कुछ कम नहीं होता. इस बात को साबित कर दिया .बिहार के गहलौर में दशरथ मांझी ने जो अकेले दम पर मात्र एक छेनी और एक हथौड़ी से 110 मीटर का रास्ता बना दिया अपनी पत्नी के याद में. ऐसे बहुत से आदमी हैं जो अपने हौसले बुलंद कर के कमजोर समय को बलवान में बदल देते हैं. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या कम ही होती हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

       आदमी या मनुष्य मैं अपार शक्ति होती है !! वह निरंतर , यथाशक्ति प्रयास करता है कुछ पाने के लिए !! अपनी मेहनत से वह प्रसिद्धि व उपलब्धियों के शिखर पर भी पहुंच जाता है , असंभव को संभव भी बना सकता है , अड़चनों के पहाड़ को लांघ सकता है , व हर अप्राप्य को प्राप्त कर सकता है !! उन तमाम गुणों के होते हुए भी आदमी वक्त के आगे हार जाता है ! सभी प्रयास तब सफल होते है जब समय अनुकूल होता है ! समय के आगे किसी की नहीं चलती क्योंकि जब समय विपरीत हो , तो सफलता नहीं मिलती ! समय अनुकूल हो टो जिस काम मैं हाथ डालो , सफलता निश्चित होती है ! प्रयास करना आदमी का कर्तव्य है , व फल मिलना नियति पर , या भगवान की मर्जी पर होता है !! हमें निरंतर कोशिश करनी चाहिए , तभी हम वांछित परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं !! समय अनुकूल होगा तो सफलता मिलेगी , अथवा पुनः नए जोश के साथ प्रयास आरम्भ करने होंगे !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

       समय के आगे बड़े-बड़े साम्राज्य झुक गए, परिस्थितियाँ बदलीं, और इतिहास ने करवटें लीं। समय किसी का इंतज़ार नहीं करता; वह निरंतर बहता रहता है, अपने साथ बदलाव, अवसर और परीक्षा लेकर। परन्तु मनुष्य भी कुछ कम नहीं होता। उसके पास विचार करने की शक्ति है, संकल्प है, और कर्म करने की क्षमता है। वही मनुष्य समय की दिशा को समझकर अपने पक्ष में मोड़ सकता है। कठिन समय में धैर्य रखकर, सही निर्णय लेकर और निरंतर प्रयास करते हुए वह असंभव को भी संभव बना देता है। समय और मनुष्य का संबंध संघर्ष का नहीं, संतुलन का है। समय परीक्षा लेता है, और मनुष्य अपने कर्मों से उसका उत्तर देता है। यदि समय बलवान है, तो मनुष्य का साहस और पुरुषार्थ भी कम नहीं। अंततः वही विजयी होता है, जो समय के साथ चलना सीख लेता है और अपने कर्मों से उसे सार्थक बना देता है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

         जीवन जीना उतना कठिन नहीं है जितना हो गया है और होता जा रहा है। वह इसलिए कि हम यानी आदमी दिनोंदिन  अपने उसूलों से, अपने नैतिक दायित्वों से, अपने आचरण से, अपनी शुचिता से विमुख हो रहा है या संकीर्ण हो रहा है। जिससे वह स्वयं, परिवार  और समाज प्रभावित हो रहा है और आपस का द्वंद बढ़ गया है।जिससे अनावश्यक और अतिरिक्त संघर्ष बढ़ गया है। इस संघर्ष में अवसर प्रधान हो गया है और दो भाग में विभाजित होकर कमाल दिखलाने लगता है। अवसर का एक भाग बलवान और एक कमजोर होता है। बलवान वह जिससे काम है और कमजोर वह जिसे काम है। यह चक्र है जो स्थान बदलता रहता है। कभी बलवान कमजोर होता है, कभी कमजोर बलवान। क्योंकि सामाजिक जीवन में व्यवस्थायें बंटी हुई हैं, जिससे सब को आवश्यकता पड़ने पर एक -दूसरे के पास जाना ही पड़ता है और तब पीड़ित के लिए बदला लेने का यह अवसर मिल जाता है और वह कसर निकाल भी लेता है। इसी को समय बड़ा बलवान कहा जाता है और इसी को आदमी भी कुछ कम नहीं है, कहा जाता है। सार यही कि यह ऐसा चक्र है जो  आदमी ने स्वयं अपने अनैतिक आचरण , लालच और निर्दयता से तैयार किया है और जिसका दंश वह स्वयं भी अपनी बारी आने पर झेलता है। यह अतिरिक्त भी है और अनावश्यक भी। यह न हो तो जीवन सहज, सरल के साथ-साथ सरस भी है। पर आदमी के पास इसे समझने का न समय है, न नीयत, न विवेक, न त्याग। इसीलिए जो चल रहा है, वह अनवरत है।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      आपने बिल्कुल सही सुना है, समय बड़ा बलवान होता है।प्रभु ने हमें कितनी योनियों में जन्म लेने के बाद मनुष्य का जन्म दिया है, तो हमें समय के अनुसार पूरा लाभ लेना चाहिए। हमें सदकार्य में जीवन बीता, अपने कर्म करते जाना चाहिए। जीवन में अच्छे, बुरे सभी तरह के दिन आते हैं और समय हमें परिस्थितियों के अनुसार जीना सीखाता है।  मनुष्य काफी महत्वाकांक्षी होता है।वह अपनी आकांक्षाओं को समय से पूर्णकर ऊंची उड़ान भरने खातिर काफी परिश्रम करता है। समय भी उसे एक मौका देता है । समयावधि पर काम पूर्ण हुआ तो ठीक, वर्ना समय कहां रुकता है। समय मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होता। श्री कृष्ण जी ने भी तो यही कहा है कर्म करते जाओ फल की इक्षा ना करें चूंकि समय के परिक्व होते ही फल अवश्य मिलेगा। समय का हमें सम्मान करना चाहिए। प्रभु ने कहा है, समय परिवर्तनशील है... वाकई समय बड़ा बलवान है, समय वह शक्ति है जो पल में राजा को रंक भी बना देती है। समय किसी की प्रतिक्षा और इंतजार नहीं करता और ना ही रुकता है...जीवन में सुख-दुख, दिन-रात होते हैं यानी समय परिवर्तनशील है। समय। मारी नश्वरता का बोध कराता है।समय बड़ा बलवान तो है किंतु मनुष्य की बुद्धि भी कुछ कम नहीं है .... आदमी भी समय के साथ अपनी बढ़ती उम्र में अध्यात्म में आ ईश्वर की भक्ति में लग जाता है, दान पूण्य करता है, अच्छे कर्म करता है चूंकि वह जानता है कि मनुष्य का जीवन बहुत ही मुश्किल से मिला है अतः समय के रहते ही मैं मृत्यु से पहले अच्छे कर्म जमा कर लूं। जिस आदमी ने जीवन में समय से पहले और समय के बाद के फल का स्वाद जिसने समय की महत्ता को समझते हुए चखा समय ने उसी को समझा ....।

 - चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

        सब समय-समय का खेल होता है, जिसने समय के अनमोल को समझ लिया उसका जीवन प्रसंग साकार हो जाता है। सुना है समय बहुत बड़ा बलवान होता है, परन्तु आदमी भी कुछ कम नहीं  होता है। वास्तविक रूप में पथ-प्रदर्शित होता जाता है। आदमी अपने हिसाब से जीवन प्रसंग चलते रहता है, जिसमें किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करता है। यही कारण से उसे जीवन में उतार और चढ़ाव का सामना पड़ता है। घर संसार हो या बाहर सब कुछ अपने हिसाब से करना पड़ता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

    बालाघाट - मध्यप्रदेश

       समय को सृष्टि का सबसे शक्तिशाली तत्व माना गया है। यह न किसी के लिए रुकता है, न किसी के प्रभाव में आता है। राजा हो या रंक—समय सबको समान रूप से परखता है। इतिहास साक्षी है कि समय ने बड़े-बड़े साम्राज्यों को मिट्टी में मिला दिया और साधारण व्यक्तियों को महानता के शिखर पर पहुँचा दिया। किन्तु दूसरी ओर, मनुष्य की इच्छाशक्ति, परिश्रम और आत्मबल भी किसी से कम नहीं है। यदि समय परीक्षा लेता है, तो मनुष्य भी अपने साहस और धैर्य से उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर सकता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य ने अपने प्रयासों से परिस्थितियों को बदला है—अंधकार में दीप जलाया है। समय हमें अवसर देता है—कभी चुनौती के रूप में, तो कभी संभावना के रूप में। पर यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह उस अवसर को पहचानकर उसका सदुपयोग करे या उसे व्यर्थ जाने दे। यहाँ मनुष्य की सक्रियता और निर्णय क्षमता उसे समय के सामने मजबूती से खड़ा करती है। यह भी सत्य है कि जब समय विपरीत होता है, तो मनुष्य की शक्ति सीमित प्रतीत होती है। परन्तु यही वह क्षण होता है, जब उसका धैर्य, संयम और विश्वास उसे संभालते हैं। जो व्यक्ति हार नहीं मानता, वही समय के प्रवाह को मोड़ने की क्षमता रखता है। समय और मनुष्य दोनों ही अपने-अपने स्थान पर शक्तिशाली हैं। समय परिस्थिति बनाता है,और मनुष्य उन परिस्थितियों को अर्थ देता है। समय बलवान है, परन्तु मनुष्य का आत्मबल यदि जागृत हो, तो वह समय को भी दिशा दे सकता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

            समय किसी के लिए रुकता नही राजा को भी रंक बना देता है इसलिए इंसान को अपना मय दंभ छोड़ इंसानियत पर भरोसा कर आगे बढ़ना चाहिए रामायण से लेकर महाभारत के सभी पात्रों को अपनी बुद्धि का प्रमाण साबित करना था राजा भगीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा को जमीं पर लाया था समय सबको परीक्षा ले हर घाव को भर देता है इंसानी युग घमंड  तोड़ देता है। सबका हिसाब करता है: देर-सवेर सबको उनका किया लौटाता है। पर आदमी भी कम नहीं क्योंकि: -
कर्म से समय बदल देता है: मेहनत करके हालात पलट देता है।  धैर्य से समय काट लेता है: बुरे दौर में भी हार नहीं मानता।  हिम्मत से समय को मात देता है: इतिहास गवाह है, इंसान ने नामुमकिन को मुमकिन किया है।  तुलसीदास जी भी कह गए: तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।  पर कबीर भी कह गए: करम गति टारे नाहिं टरी।  मतलब समय बलवान है, पर कर्म करने वाला इंसान समय का रुख मोड़ देता है। आप किस संदर्भ में ये सोच रहे हैं?  समय के अनुकूल जीना आना चाहिए ज्ञान इंसानी जिंदगी के लिए वो औषधि है जिसका उपयोग शरीर में होता जीवन के मंथन में जहर अलग निकाल स्वस्थ जीवन जीने की आदत डाल जीवन को आगे बढ़ाता है इस तरह इंसान भी इंसान के काम आता है जिसकी समय समय पर प्रशंसा सराहना की जरूरत पड़ती हैं अपने स्वभाव के अनुसार जीवन दूसरो के लिए समर्पित करता है कामयाबी लक्ष्य मान आगे बढ़ता है 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

          नंदशंकर मेहता की स्मृति में यह कहना केवल एक सामान्य विचार नहीं, बल्कि एक चुनौतीपूर्ण उद्घोष है कि “सुना है समय बहुत बड़ा बलवान होता है, परन्तु आदमी भी कुछ कम नहीं होता है”, क्योंकि नंदशंकर मेहता ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सजग मनुष्य समय की धारा को मोड़ सकता है। वे केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि गुजराती साहित्य के अग्रदूत और गुजराती के प्रथम उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए, और उनकी कृति करण घेलो (1866) ने इतिहास, चेतना और समाज-सुधार को एक ही सूत्र में बाँधकर साहित्य को युग-निर्माण का हथियार बना दिया था, उन्होंने शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जागृति के माध्यम से यह दिखाया कि विचार जब कर्म में बदलता है तो समय को भी झुकना पड़ता है। परन्तु इसी के साथ एक और भी अधिक तीक्ष्ण, असहज और लगभग कठोर सत्य सामने आता है कि साहित्यकारों ने युग को तो जगाया, पर अपने ही जीवन की दुर्दशा के विरुद्ध कोई निर्णायक और संगठित न्यायिक संघर्ष खड़ा क्यों नहीं किया? क्योंकि विडम्बना यह है कि जो वर्ग समाज को अधिकारों का बोध कराता रहा, वही स्वयं अपने अधिकारों की लड़ाई में बिखरा और मौन बना रहा है। उसकी बुद्धि और विवेक ने न्यायपालिका के द्वार तक संगठित रूप में पहुँचकर अपने जीवन को और भावी लेखक पीढ़ी को सम्मानजनक बनाने का प्रयास क्यों नहीं किया? जब लेखक, ग़ज़लकार, कवि और कहानीकार स्वयं ही अभाव, उपेक्षा और आर्थिक असुरक्षा में जीवन व्यतीत करते हैं, तो उन्हें युग-परिवर्तक मानने का दावा भी आधा-अधूरा प्रतीत होता है, यह कठोर प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि साहित्य ने चेतना तो दी, पर व्यवस्था से टकराने का साहस और संरचनात्मक अधिकारों के लिए संघर्ष की परंपरा किसी भी लेखक ने विकसित नहीं की है। अतः आज आवश्यकता केवल कलम चलाने की नहीं, बल्कि अधिकारों के लिए खड़े होने की है, क्योंकि जब तक साहित्यकार स्वयं सशक्त नहीं होगा, तब तक उसका शब्द भी पूर्ण प्रभाव से समय को चुनौती नहीं दे पाएगा। यही वह बिंदु है जहाँ हमारी ज्वलंत और तीक्ष्ण राय एक आह्वान बन जाती है कि मनुष्य केवल विचारक नहीं, बल्कि अपने भाग्य और अपने समय का विधाता भी बने, इस योग्य बन सकें कि वह अपनी पुस्तकों को प्रकाशित करने में सक्षम बन सकें। अन्ततः कहने का तात्पर्य यह है कि उक्त चुनौती पर गहन विचार एवं मंथन करना वर्तमान साहित्यकारों का प्रथम मौलिक कर्तव्य है अन्यथा भविष्य में लिखा जाएगा कि उक्त पुरस्कार विजेता अपने समय के विशेष चाटुकार, चापलूस और कायर थे और यह पुरस्कार उनकी चाटुकारिता, चापलूसी और कायरता के स्वतः प्रमाण हैं।

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं जम्मू -जम्मू और कश्मीर

       यह सच है समय मनुष्य से भी अधिक बलवान होता है मनुष्य तो सोचने विचारने में ही कभी-कभी अपना बहुमूल्य समय हाथ से गवाॅ देता है। जिसके परिणाम उसके लिए बेहद दुखद हो जाते हैं क्योंकि समय मुट्ठी में भरे रेत की तरह तेजी से फिसल जाता है। अबाध गति से समय का चक्र चलता रहता है  सूर्य चंद्र तारे रात दिन सब निरंतर चलते रहते हैं, रुकते नहीं ।अत इनका महत्व समय से जुड़ा हुआ है। समय अमूल्य संसाधन है जिसे हम खरीद नहीं सकते , बीता समय वापस भी नहीं ला सकते। अतः कबीर दास जी ने इसलिए कहा है-- कि "काल्ह करें सो आज कर। आज करे सो अब, पल में प्रलय होयगी बहुरि करेगो कब।।" हमारे जीवन को उन्नत और अवनति की ओर ले जाने वाला समय ही है। पर मनुष्य भी कम नहीं है । समझदार लोग समय की कीमत पहचान कर कद्र करके समय और अवस्थानुसार सारे कार्यों में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।  समय की बलवानता को तुलसी ने भी माना है-------- "तुलसी नर को क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान, भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण।" इनके अनुसार समय बड़ा बलवान है क्योंकि  कभी-कभी सबसे पराक्रमी व्यक्ति हार भी जाता है। फिर भी हमें बुद्धिमत्ता के साथ समय की कीमत पहचानना चाहिए।

- डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

      मिथक कहानियों (सावित्री-सत्यवान, ध्रुव, प्रह्लाद) के पात्रों को छोड़ दिया भी दिया जाए तो सामयिक अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है कि सुना है समय बहुत बड़ा बलवान होता है— १९९७ में अपनी पहली अन्तरिक्ष यात्रा के दौरान कल्पना चावला ने ३७२घंटे अन्तरिक्ष में बिताए। वहीं दूसरी अन्तरिक्ष यात्रा १६ जनवरी २००३ को शुरू हुई थी। जब अन्तरिक्ष यान १ फ़रवरी २००३ को वापिस धरती पर लौट रहा था तभी क्षतिग्रस्त हो गया था। इस हादसे में ६ अन्य अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ कल्पना चावला की भी मौत हो गई थी।परन्तु आदमी भी कुछ कम नहीं होता है -नासा के अन्तरिक्ष यात्री, सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 9 महीने के लम्बे इन्तजार के बाद अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (ISS) से धरती पर लौटे। बोइंग के स्टारलाइनर यान में आई खराबी के कारण उनका 8 दिन का मिशन 9 महीने में बदल गया। दोनों एस्ट्रोनॉट्स अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर एक टेस्ट मिशन के लिए गए थे। उसके बाद दुनिया कहने लगी है, “रहने दिया करो, नौ महीने बेटियों को गर्भ में, वो खुद ठहर आएंगी नौ महीने अन्तरिक्ष में—।

- विभा रानी श्रीवास्तव

पटना - बिहार 

      समय भी तो भाग रहा है बहुत ही तेज़ी से।बलवान तो सच में समय है लेकिन हिम्मत वाले, मेहनत वाले, जी जान लगा कर देश-जाति, धर्म पर मर मिटने वाले,समय को भी अपनी मुट्ठी में रख लेते हैं।समय को अपने काबू में कर लेना आसान नहीं लेकिन इतना कठिन भी नहीं।समय जीवन का पर्याय ही तो है। जितना जीवन है हमारा,वही हमारा समय है। स्वस्थ, प्रसन्न और ख़ुश रह लें तो मानिए आपने समय को अपने वश में कर लिया।अपने तरीके से जीवन जीने वाले समय को अपने वश में कर के ही तो चलते है। समय को दूसरे के नज़रिए से देखने का भी एक ढंग होता है। मानव मन को ईश्वर ने बहुत सशक्त बनाया है। ईश्वर का अंश ही तो है मनुष्य। वह सब कुछ कर सकता है यदि ठान ले तो।  सही कहा आपने समय बलवान है किन्तु आदमी भी कुछ कम नहीं।  ख़ुद को कम आँकना बंद करें। अपनी अपरिमित शक्ति को पहचानें।आप पूर्ण समर्थ हैं।अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करें। निराश हो कर न बैठें। आप सब कुछ कर सकते हैं। असम्भव शब्द अपने शब्दकोश से बाहर निकाल दें। कोशिश करें। फिर देखिए आप क्या कुछ नहीं कर सकते। बस इतना ध्यान रहे आप इंसान हैं। श्रेष्ठ इंसान बनें भगवान बनने की कोशिश न करें।

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

फरीदाबाद - हरियाणा 

        "मनुज बली नहिं होत है समय होत बलवान" - - बचपन से पढ़ते सुनते आ रहे हैं लेकिन मर्म नहीं जान पाये हैं हम सामान्य इंसान आदिकाल से लेकर कबीरदास और तुलसीदास जैसे समाजशास्त्रीय भक्तिकाल के तत्ववेत्ता तक लिख गये हैं -

"काल करे सो आज कर आज करे सो अब" 

"पल में परलय होयगी बहुरि करैगो कब"

  लेकिन इंसान ने समय की परवाह नहीं की। युग बदलते रहे लेकिन मानव नहीं बदला। मानव की प्रवृत्ति नहीं बदली। समय की चाल नहीं पहचानी उसने। "मैं भी कहीं से कम नहीं हूँ "इस भरम में उबडूब होता इंसान स्वयं को ही छल रहा है। पीढ़ियां गुजर रहीं हैं। मानव पीढ़ियां बद से बदतर होती जा रहीं हैं। युग बदले  - - युगधारायें बदलीं - - युगों की सोच बदली परंतु इंसान नहीं चेता। अणु-परमाणु बम बनाये। एक दूसरे को मिटाने की कसमें खा रहे हैं। सृष्टि काल के गाल में समाने की कगार पर है  - - लेकिन हम मानव नहीं सुधरे। आज भी प्रकृत्ति को चुनौती दे रहे हैं। सयम आ गया है कि इंसान समझ ले - - अपनी तिनके सी औकात और अभिनंदन करे इस महनीय जीवन का ।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " समय अनमोल होता है। समय पर किया गया कार्य को सर्वोत्तम कहा जाता है।  इसलिए समय का आदर करना चाहिए। जो समय का आदर नहीं करते हैं। वह जीवन भर भटकते रहते हैं। परन्तु समाधान कभी नहीं मिलता है। यह समय की सीमा कहलातीं है। 

      - बीजेन्द्र जैमिनी 

      (संचालन व संपादन)


Comments



  1. समय तो बलवान होता ही है इसमें कोई दो राय नहीं। इंसान को उसके अनुसार चलना होता है। तभी सामंजस्य बैठ पाता है। लेकिन आदमी भी कुछ कम नहीं होता। उसके पास बुद्धि है, विवेक है जिसका भली भांति प्रयोग करके अपने कार्य में वह सफलता प्राप्त कर लेता है‌। योजना बनाता है नए-नए तरीके खोजता है और अपना मुकाम हासिल करता है। कभी-कभी अपने प्रयासों से समय के साथ चलकर वह समय पर भी बाजी मार लेता है।
    - गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
    नरसिंहपुर मध्य प्रदेश
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  2. जीवन में जो समय का महत्व समझ लिया वो महान है वरना समय किसी का इंतज़ार नहीं करता है ।मुँह से निकली बातें हाथ से निकला समय लौटकर नहीं आता है ।समय से चला बलवान है साथ मुस्कान हैसमय फिसला नाकाम है दुखिया जहान है ।
    - सुधा पाण्डेय
    लंदन
    (WhatsApp से साभार)

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