तकाज़ी शिवशंकर पिल्लै की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      झूठ तो सभी समस्याओं की जड़ है। फिर भी लोग झूठ पर झूठ बोलते रहते हैं। और समस्या को बड़ी करते रहते हैं। इसलिए समस्या से छुटकारा पाने के लिए कोई कदम उठने में असफल रहते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। बाकी तो आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        अक्सर देखा जाता है व्यक्ति अपने हितों की पूर्ति के लिए , बहुत बड़ा गलत कदम उठाने के बाद, सजा पाने के डर से , रोजगार पाने के लिए गलत बातें बनाना इन सब बातों की सच्चाई जानते हुए भी झूठ बोलना , अपने आपको तो धोखा देता ही है। कभी-कभी ऐसी परिस्थिति होती है कि व्यक्ति आंतरिक रूप से अपने को कभी माफ नहीं कर पाता। स्वयं के आत्म सम्मान को भी वह खो देता है। झूठ बोलकर कमाया धन या किसी की हत्या में सुपारी लेकर किया गया कृत्य ( झूठी गवाही देना) सब महापाप तो है ही। इसके साथ इनके दुष्प्रभाव से व्यक्ति आंतरिक और मानसिक तनाव को बढ़ा लेता है। किसी सही बात के लिए अपनी गलत बात को बढ़ा - चढ़ा कर रखना, परिवार के लोगों को गुमराह करना असलियत खुलने पर वह झूठा व्यक्ति स्वयं ही क्या परिवार और समाज की नजरों में सदा के लिए गिर जाता है। रिश्तों में अच्छी छवि नहीं बना पाता । झूठा व्यक्ति एक सच को छिपाने  के लिए 100 झूठ बोलता है ।यह सब आध्यात्मिक, सामाजिक और शारीरिक दृष्टि से ठीक नहीं है। व्यक्ति को आत्मविश्वास के साथ अपनी गलतियों को सहज स्वीकारना चाहिए। दूसरों से और स्वयं से छलावा ठीक नहीं । मानसिक रूप से सुखी- शांत और नैतिक जीवन जिएं ।

- डॉ . रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

          जानबूझकर झूठ बोलना—केवल नैतिक अपराध नहीं, बल्कि आत्म-धोखा (self-deception) और विधिक दुराचार (legal misconduct) है। यह एक स्थापित सिद्धांत है कि जानबूझकर असत्य कथन, अर्थात जानबूझकर झूठ (deliberate falsehood), मात्र नैतिक कमजोरी नहीं बल्कि गंभीर कदाचार (misconduct) की श्रेणी में आता है। जब कोई व्यक्ति सत्य को जानते हुए भी असत्य प्रस्तुत करता है, तो वह न केवल दूसरों को गुमराह करता है बल्कि अपने ही विवेक, आत्मसम्मान और संवैधानिक नैतिकता के साथ विश्वासघात करता है। यही स्थिति वास्तविक रूप में आत्म-धोखा (self-deception) है—जहाँ व्यक्ति स्वयं अपने ही झूठ पर विश्वास करने लगता है। विधिक दृष्टि से, असत्य कथन देना, तथ्यों को छिपाना या भ्रामक प्रस्तुति करना, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप (interference with judicial process) के समान है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (principles of natural justice) के प्रतिकूल है, जिनका मूल आधार सत्य (truth) और निष्पक्षता (fairness) है। कोई भी व्यक्ति, अधिकारी या संस्था यदि जानबूझकर असत्य का सहारा लेती है, तो वह अपने मौलिक विधिक कर्तव्यों (Fundamental legal duties) का उल्लंघन करती है और न्याय व्यवस्था की शुचिता (integrity) को प्रभावित करती है। लेकिन संविधान की प्रस्तावना का वैधानिक दुर्भाग्य यह है कि यह अमृत महोत्सव मनाने के उपरान्त भी न्यायापालिका में झूठ सशक्त और सत्य अशक्त है। सत्य यह भी है कि बाल्यकाल और प्राथमिक शिक्षा में पढ़ाया गया "सदैव सत्य बोलो" और सत्यमेव जयते अस्तित्व खो चुका है। स्पष्ट कहें तो इसके विरोध में अक्सर यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि परिस्थितिजन्य विवशता (situational compulsion) या व्यावहारिक आवश्यकता (practical necessity) के कारण झूठ बोला जाता है। उदाहरणस्वरूप—किसी को बचाने हेतु या किसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था से स्वयं को सुरक्षित रखने हेतु न्यायाधीश भी शामिल हैं। किन्तु यह तर्क विधिक कसौटी पर टिक नहीं सकता, क्योंकि कानून नीयत (intention) और परिणाम (consequence) दोनों का मूल्यांकन करता है। यदि असत्य जानबूझकर बोला गया है, तो वह उत्तरदायित्व (liability) से मुक्ति नहीं देता। वास्तविकता यह है कि झूठ (falsehood), चाहे किसी भी स्वरूप में हो, अंततः न्याय (justice), पारदर्शिता (transparency) और जवाबदेही (accountability) के विरुद्ध एक सुनियोजित आघात है।और जो व्यक्ति या संस्था बार-बार असत्य का सहारा लेती है, वह अंततः अपने ही बनाए हुए भ्रमजाल (web of deception) में फँस जाती है, जहाँ सत्य और असत्य का अंतर समाप्त हो जाता है। अतः यह स्पष्ट रूप से उद्घोषित किया जाना चाहिए कि जानबूझकर झूठ बोलना, आत्म-धोखा (self-deception) ही नहीं, बल्कि विधिक दायित्वों (legal obligations) और संवैधानिक मर्यादाओं (constitutional propriety) का घोर उल्लंघन है। इसलिए संविधान संरक्षकों कौ चाहिए कि वह ऐसे कृत्यों के प्रति शून्य सहिष्णुता (zero tolerance) अनिवार्य करें है, विशेषकर तब जब यह कृत्य किसी सार्वजनिक पद (public office), न्यायिक प्रक्रिया (judicial proceedings) या प्रशासनिक कार्यवाही (administrative action) से संबंधित हो और किसी भी प्रकार मानवाधिकारों का शोषण नहीं होना चाहिए।

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) – जम्मू और कश्मीर

     मनुष्य जब जानबूझकर झूठ बोलता है, तो वह केवल दूसरों को ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी धोखा देता है। झूठ एक ऐसा आवरण है जो कुछ समय के लिए सच्चाई को छिपा सकता है, परंतु अंततः वह व्यक्ति के चरित्र और आत्मसम्मान को कमजोर कर देता है। सत्य हमें भीतर से मजबूत बनाता है, जबकि झूठ हमें भीतर ही भीतर खोखला करता जाता है। जब हम झूठ बोलते हैं, तो हमें उसे बनाए रखने के लिए बार-बार नए झूठ का सहारा लेना पड़ता है। इस प्रक्रिया में हम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होते जाते हैं और आत्मविश्वास भी कम होता जाता है।वास्तव में, सच्चाई का मार्ग कठिन अवश्य हो सकता है, लेकिन वह हमें आत्मिक शांति और स्थायी सम्मान प्रदान करता है। इसलिए आवश्यक है कि हम सच का साथ दें, क्योंकि अपने आप के प्रति ईमानदार रहना ही जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है।

- डॉ अर्चना दुबे ' रीत '

मुम्बई - महाराष्ट्र 

      बात बिल्कुल सही,किसी बात के जानकार होते हुए भी अगर झूठ बोलें तो वह स्वयं को धोखा देने के समान होता है। इंसान दूसरे इंसान को नहीं बल्कि स्वयं को धोखा देता है। यह एक गलत नजरिया है जो नहीं रखना चाहिए। जो उचित है उसे ही बोलें। झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं। स्वयं की आत्मा भी उससे कुंठित होती है। दिल में हमेशा मलाल बना रहता है। इसलिए बेहतर है सत्य बोलें,उचित बोलें और झूठ का भागीदार होने से बचें।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

      जान बुझ कर झूठ बोलना अपने आप को धोखा देना है. बात एकदम सत्य है. क्योंकि एक झूठ बोलने के बाद उसके समर्थन में दस झूठ और बोलना पड़ता है. कहीं-कहीं लोग दूसरों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए झूठ बोलते रहते हैं. लेकिन हम झूठ कितना भी बोले एकदिन सच्चाई सबको पता चल ही जाती है. कभी-कभी लोग परिस्थिति बस झूठ बोलते रहते हैं. कभी झूठ बोलने की मजबूरी हो जाती है. एक मोबाइल के कारण प्रायः सभी लोग झूठ बोल रहें हैं. कुछ वातावरण ऐसा हो जाता है कि आदमी झूठ बोलने  को बाध्य हो जाता है. लेकिन बात जो भी झूठ बोलना ठीक नहीं. आजकल तो लोग शादी विवाह में भी लोग धड़ल्ले से झूठ बोलते हैं. जानबूझकर का झूठ बोलना अपने आप को धोखा देना है. 

- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दिनेश "

कोलकाता - पश्चिम बंगाल 

           जानबूझ कर झूठ बोलना अपने आप को धोखा देना तो है ही साथ ही यह किसी पाप से भी कम नहीं है। जब व्यक्ति गलत होता है तो वह स्वयं को सही सिद्ध करने के लिए झूठ पर झूठ बोलता चला जाता है। धीरे-धीरे झूठ बोलना आदत बन जाता है। चरित्र का पतन होने लगता है क्योंकि झूठ बोलने वाला व्यक्ति झूठ बोलते-बोलते इतने आत्मविश्वास से संपन्न हो जाता है की वह अपने को सर्वाधिक सही समझने लग कर झूठ की राह पर ही चलने लगता है। पर कहते हैं झूठ की आयु अधिक लंबी नहीं होती। ऐसे व्यक्ति का चरित्र जब उजागर हो जाता है तो सब उससे कन्नी काटने लगते हैं।उसकी बात पर विश्वास करना तो दूर की बात है, बात करने योग्य भी नहीं समझते। सच की राह कठिन अवश्य होती है, उस पर चलने वाले को परेशानियों का सामना भी करना  पड़ता है। संघर्ष उसके जीवन का अंग बन जाता है। पर जो सत्य की राह स्वीकार करके उस पर चलता है वही स्वाभिमान से अपना जीवन जीता है। सब उसका सम्मान करते हैं। समाज और देश के लिए आदर्श व्यक्तित्व बनते हैं।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

         कहा जाता है कि एक झूठ के साथ कई झूठ चलते हैं और सच अकेला होता है फिर भी जीत सच की ही होती है। वह इसलिए क्योंकि झूठ को सच करने के लिए झूठ पर झूठ बोलना पड़ता है और यही फिर पटखनी देता है। झूठ के लिए हर बात याद रखनी होती है, जो कठिन होता है और पहले कुछ... अब कुछ और भांडा फूट जाता है। जबकि सच के लिए कुछ याद रखने की जरूरत नहीं। सच...सच ही रहता है। पहले भी वही...अब भी वही। इसलिए झूठ बोलना यानी अपने-आप को धोखा देना है , क्योंकि झूठ का जब पर्दाफाश होता है तो  सच सामने आ जाता है और झूठ की वजह से फिर आपकी जो प्रतिष्ठा प्रभावित होती है,उसके अंजाम असहनीय होते हैं।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      मनुष्य के जीवन में सत्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि सत्य ही विश्वास, संबंध और आत्मसम्मान की नींव होता है। जब कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठ बोलता है, तो वह केवल दूसरों को ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक स्वयं को धोखा देता है। झूठ बोलने से क्षणिक लाभ अवश्य मिल सकता है, परंतु यह लाभ स्थायी नहीं होता। धीरे-धीरे झूठ व्यक्ति के भीतर अस्थिरता, भय और अपराधबोध को जन्म देता है। वह अपने ही बनाए भ्रम के जाल में उलझ जाता है और वास्तविकता से दूर होता जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज़ को दबा देता है, जो कि सबसे बड़ा आत्म-प्रवंचन (self-deception) है। इसके विपरीत, सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, पर वह मन को शांति और आत्मविश्वास प्रदान करता है। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है, वह स्वयं के प्रति ईमानदार रहता है और उसका व्यक्तित्व मजबूत बनता है।अतः यह स्पष्ट है कि जानबूझकर झूठ बोलना केवल दूसरों को भ्रमित करना नहीं, बल्कि अपने ही व्यक्तित्व और आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना है। इसलिए जीवन में सत्य को अपनाना ही वास्तविक प्रगति और आंतरिक संतोष का मार्ग है।

- अलका पांडेय

 मुंबई - महाराष्ट्र 

      सही कहा स्वयं को ही धोखा देना है झूठ बोलना। दूसरे को क्या पता कि सच बोला या झूठ बोला।यह तो आप स्वयं जानते हैं कि सच क्या है और बोल रहे हैं झूठ,तो फिर धोखा किसे दिया? खुद को ही तो दिया। यह एक तरह का मनोविकार है। यदि आप दिन को रात कह रहे हैं तो क्या रात हो गयी। नहीं,दिन ही तो रहा फिर यह स्वयं को धोखा देना हुआ। इसे मानसिक बीमारी कहा जाता है।आजकल मोबाइल पर जानबूझकर झूठ बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मानसिक रोगी बढ़ रहे हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक । ऐसे  झूठ को पैथोलॉजिकल झूठ  या कंपल्सिव झूठ कहा जाता है। यह अक्सर व्यक्तित्व विकार, जैसे नार्सिसिस्टिक या एंटीसोशल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है। ऐसे लोग बिना किसी स्पष्ट लाभ के, केवल आदत या आत्म-सम्मान बढ़ाने के लिए झूठ बोलते हैं। और जीवन भर धोखे में ही जीते हैं।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

       झूठ बोलना केवल दूसरों को भ्रमित करना नहीं होता, बल्कि कई बार यह स्वयं को भी धोखे में रखने का माध्यम बन जाता है। जब कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठ बोलता है, तो वह केवल सामने वाले को ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी अंतरात्मा और सत्य के प्रति अपने विश्वास को भी कमजोर कर देता है।सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि झूठ का आरंभ अक्सर छोटी-छोटी बातों से होता है, परंतु उसका प्रभाव गहरा और व्यापक हो सकता है। जब व्यक्ति बार-बार झूठ बोलता है, तो उसे सत्य और असत्य के बीच की स्पष्टता धुंधली होने लगती है। वह स्वयं अपने ही बनाए गए झूठ को सच मानने की भूल करने लगता है, जिसे “स्वयं को धोखा देना” कहा जा सकता है।यह स्थिति व्यक्ति के व्यक्तित्व को भीतर से खोखला कर देती है। आत्मविश्वास घटता है और मानसिक अशांति बढ़ती है। समाज में भी ऐसे व्यक्ति पर विश्वास कम होने लगता है, क्योंकि सत्य की नींव पर ही स्थायी संबंध खड़े होते हैं।वास्तव में, सत्य बोलना कठिन हो सकता है, लेकिन यह मन को हल्का और जीवन को सरल बनाता है। वहीं झूठ तात्कालिक लाभ दे सकता है, परंतु दीर्घकाल में वह पीड़ा और पछतावे का कारण बनता है। जैसे- कोई व्यक्ति अपनी बुरी आदतों को छुपाने के लिए खुद से कहता है कि “यह कोई बड़ी बात नहीं है।” वह बार-बार ऐसा कहकर स्वयं को धोखा देता है, और अंत में वही आदतें उसके जीवन को नुकसान पहुँचाती हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम सत्य को अपनाएँ, भले ही परिस्थितियाँ कैसी भी हों। क्योंकि सत्य ही वह प्रकाश है जो व्यक्ति को स्वयं से मिलाता है और जीवन को सही दिशा देता है।

-डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर- राजस्थान

       झूठ बोलना वास्तव में खुद को धोखा  देने की एक प्रक्रिया है क्योंकि जब कोई व्यक्ति दुसरों से झूठ बोलता है तो वह अनजाने में अपनी वास्तविकता और अंतरआत्मा के बीच एक दूरी बना लेता है  जो मानसिक और सामाजिक रूप से हानिकारक सिद्ध होती है, कहने का भाव झूठ बोलना अपने आप को धोखा देने  जैसा है तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि जानबूझकर झूठ बोलना अपने आप को धोखा देना है,  मेरा मानना है कि बार बार झूठ बोलने से व्यक्ति न केवल दुसरों का विश्वास  खोता है बल्कि उसे धीरे धीरे अपनी ही बातों और निर्णयों पर संदेह होने लगता है यही नहीं जानबूझकर झूठ बोलना न केवल दुसरों को गुमराह करना है बल्कि स्वयं के  व्यक्तित्व और मानसिक शांति के साथ भी एक बड़ा समझौता है इससे मनोवैज्ञानिक और नैतिक प्रभाव पड़ता है, आखिरकार यही कहुँगा कि जानबूझकर झूठ  बोलना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक ़ और समाजिक प्रक्रिया है  जिसमें व्यक्ति दुसरों को धोखा देने के इरादे से सत्य को छिपाता है या गलत तथ्य पेश करने में लगा रहता है जिससे कई अवगुण पैदा होते हैं और लोगों का विश्वास उक्त व्यक्ति से उठ जाता है और उसकी सोसाइटी में कोई जगह नहीं रहती  और ऐसा व्यक्ति ज्यादा देर सोसाइटी में टिक नहीं पाता और उसका आदर मान  हमेशा के लिए खत्म हो जाता है इसलिए  वो न सिर्फ लोगों की जुबान से उतर जाता है बल्कि आपने आप को धोखा देता है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

          दुनिया का सबसे बड़ा सत्य है कि जो इंसान जानबूझकर झूठ बोलते हैं वे अपने-आप को धोखा देते हैं। हम अपने-आप से झूठ बोल सकते है लेकिन अपनी अंतर्रात्मा से नहीं। ईश्वर बसते हैं अंतर में - - ह्दय में ।उनसे कुछ नहीं छिपता। अतः दुनिया की सबसे बड़ी सच्ची सच्चाई है कि हम अपने आप को धोखा देकर - - झूठ बोल कर सच्चाई का ढोंग करते हैं - - आपने आप को धोखा देते हैं। तोरा "मन दर्पण कहरलाये" - - - "भले बुरे सारे कर्मों को" - - । " देखे और दिखाए" सच्चाई के साथ सत्याग्रह - - बापू महात्मा गाँधी, राजेन्द्र बाबू सहित अनेक देशभक्त राजनेताओं ने सत्य और न्याय के लिये जीवन भर लडाई लडी़। जेल गये, यातनाएं झेलीं लेकिन झूठ बोलना कुबूल नहीं किया - - अपने आप को धोखा नहीं दिया। आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है कि आप झूठ के चक्रव्यूह में फँसे अभिमन्यू की तरह विवश हैं। कुछ नहीं कर सकते - - व्यवस्था के सामने। अपने आप को धोखा देते रहते हैं - - चुनाव के दौरान नयी-नयी आशाओं के साथ स्वयं को और दूसरों भरमाते हैं लेकिन वही "ढाक के तीन पात"! आज वक्त की जरूरत है कि हम "स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक" अपने आप को पहचाने। अपनी राजतंत्रीय ताकत को पहचानें - - अपने लोकतंत्रीय अधिकारों को पहचानें और सत्य का साथ दें। इतिहास गवाह है कि देर से ही क्यों न हो - - सत्य की विजय अमिट है - - अवश्यंभावी है। आईये संकल्प लें कि सदा सत्य के साथ चलेंगे। झूठ का साथ और सहारा कभी नहीं लेगे  - - और देखिये कि इस संकल्प के साथ सारी कायनात आपका साथ देगी ।

- हेमलता मिश्र मानवी

 नागपुर - महाराष्ट्र 

       झूठ बोलना पाप माना जाता है। जानबूझकर झूठ बोलना अपने आप को धोखा देना होता है।ज़मीर गवाह नहीं देता।झूठ बोलने वाला स्वयं की नजर से गिर जाता है। आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। गलतियों को छिपाने के लिए भी लोग झूठ का सहारा लेते हैं।झूठ आखिर झूठ है।सत्य का चोला पहन नहीं सकता।झूठ बोलने वाला आखिर अपमानित होता ही है।मान- सम्मान सब धूमिल हो जाती है। कभी- कभी झूठ की वैसाखी को थामकर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने का प्रयास करता है। अंततः वह उसका दुष्परिणाम भोगता ही है। झूठे- मक्कारों पर कोई विश्वास ही नहीं करता है।झूठ बोलकर कोई व्यक्ति महान नहीं बनता। अपने आपको धोखा देता है।झूठ जब लोगों के सामने आता है,तो धोबी का कुत्ता घर का न घाट का वाली स्थिति निर्मित होती है।जानबूझकर झूठ बोलना व्यक्ति के दुर्गुणों का परिचायक है। इससे मानव लज्जित होता है।झूठ बोलकर कभी कोई महारथ हासिल नहीं कर सकता। इंसान के आंखों से झूठ का पर्दा हटता ही है।तब उसकी असलियत का पता चलता है। जानबूझकर झूठ बोलना सरासर ग़लत है। अपने आप को धोखा देकर अपने भविष्य से खिलवाड़ करता है। जिससे उसका पतन निश्चित है।

- डॉ. माधुरी त्रिपाठी 

रायगढ़ - छत्तीसगढ़

" मेरी दृष्टि में " समस्या तो झूठ बोलने से पैदा होती है। फिर भी झूठ बोलने से पीछे नहीं हटते हैं। इसलिए समस्या बढ़ती रहती हैं। अतः झूठ से अपने आप को धोखा दे रहे होते हैं। खासकर जानबूझ झूठ बोला जाएं तो समस्या बढ़ती चली जाती है। 

 ‌              - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)


Comments

  1. आज की चर्बी में सभी के विचार बहुत ही अच्छे रहे, झूठ बोलने से अपने आप को धोखा तो देते ही है, बल्कि अपने आचरण पर पर्दा डालने का प्रयास करते हैं,
    ये सर्वविदित हैकि

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  2. झूठ दस कदम आगे और सच एक कदम पीछे चलता है और जब हवा हवाई होती है यानि झूठ का पर्दा हिलता है तो आचरण का पर्दाफाश हो जाता है

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