मणिभाई देसाई की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

       साहित्य प्राचीन काल से लिखा जा रहा है। विशेष रूप से धार्मिक साहित्य। शायद धार्मिक साहित्य ही सब से अधिक प्राचीन है । जो समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार मीडिया की भूमिका भी समाज की प्रतिनिधित्व करता है। महाभारत में संजय ही मीडिया भूमिका में नज़र आते हैं। साहित्य और मीडिया एक नदी के दो किनारे है। एक होते हुए भी अलग - अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        मीडिया समाज का ऑंखें हैं  और साहित्य समाज का दर्पण। मोबाइल क्रांति के बाद दर्पण तो कहीं बहुत पीछे छूट गया, मीडिया और उसमें भी कथित सोशल मीडिया बहुत सक्रिय हुआ। हर वह व्यक्ति मीडिया जगत में सक्रिय हो गया है जिसके पास एंड्रायड फोन है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि पर सबके अपने अपने चैनल और एकाउंट बने हुए हैं।हर छोटी-बड़ी घटना, दुर्घटना, उपलब्धि, नवाचार और विचार प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर आ जाती है। हर चैनल,एकाउंट की अपनी अपनी विषयवस्तु है उसी तरह की सामग्री उस पर देखी सुनी जा रही है। मीडिया समाज की ऐसी ऑंखें बन गया है जो नजरों से ही एक्स-रे का काम कर लेती है। किसी भी व्यक्ति की कोई भी क्रिया अब छिपी या गोपनीय नहीं रह गई है।जेब में रखा मोबाइल और इसमें चल रहे एप पर प्रतिफल हमारी जासूसी कर रहे हैं। बात साधारण सी है लेकिन बहुत गंभीर भी है कि इस सोशल मीडिया और उसकी तेज नजर के दौर में साहित्य पीछे छूट रहा है, संवेदनशीलता गुम हो रही है,बस यह गया है प्रदर्शन और दिखावा।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

    धामपुर - उत्तर प्रदेश

        साहित्य और मीडिया—दोनों ही समाज के सशक्त स्तंभ हैं। यदि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है, तो मीडिया को उसकी आँखें कहना भी उतना ही सार्थक है। दर्पण जहाँ समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है, वहीं आँखें उस यथार्थ को देखने, परखने और समझने का माध्यम बनती हैं। साहित्य मानव की संवेदनाओं, विचारों और अनुभूतियों का सृजनात्मक प्रतिबिंब है। यह समाज की अच्छाइयों और बुराइयों को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करता है। इतिहास साक्षी है कि हर युग का साहित्य अपने समय की परिस्थितियों, संघर्षों और मूल्यों को अभिव्यक्त करता आया है। साहित्य न केवल समाज का चित्रण करता है, बल्कि उसे दिशा देने का कार्य भी करता है—वह चेतना जगाता है, प्रश्न खड़े करता है और परिवर्तन की प्रेरणा देता है। मीडिया आज के समय में समाज की आँखों की तरह कार्य करता है। यह घटनाओं को तत्काल हमारे सामने लाता है, हमें जागरूक बनाता है और विश्व के विभिन्न कोनों से जोड़ता है। समाचार, विचार, बहस और विश्लेषण के माध्यम से मीडिया समाज को देखने की दृष्टि प्रदान करता है। सही और निष्पक्ष मीडिया समाज के लिए मार्गदर्शक बन सकता है, जबकि पक्षपातपूर्ण मीडिया भ्रम भी उत्पन्न कर सकता है। साहित्य और मीडिया दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। साहित्य जहाँ गहराई और संवेदना देता है, वहीं मीडिया गति और व्यापकता प्रदान करता है। साहित्य दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ता है, जबकि मीडिया तात्कालिक चेतना जगाता है। यदि दोनों अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से करें, तो समाज का समग्र विकास संभव है। आज के समय में साहित्य को बाजारवाद और मीडिया को टीआरपी की दौड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि दोनों अपनी नैतिकता और जिम्मेदारी को समझें। सत्य, निष्पक्षता और संवेदनशीलता—ये दोनों के लिए अनिवार्य गुण हैं। साहित्य और मीडिया, दोनों ही समाज के मार्गदर्शक हैं। एक समाज का प्रतिबिंब दिखाता है, तो दूसरा उसे देखने की दृष्टि देता है। यदि दोनों सशक्त, संवेदनशील और ईमानदार हों, तो समाज न केवल स्वयं को समझ सकता है, बल्कि बेहतर दिशा में आगे भी बढ़ सकता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

       जैमिनी अकादमी, हरियाणा द्वारा आयोजित इस गरिमामयी चर्चा-परिचर्चा में मणिभाई देशाई जी की स्मृति में "साहित्य समाज का दर्पण है तो मीडिया समाज की आँखें" विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मैं स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूँ। क्योंकि साहित्य मानव सभ्यता की चेतना का संवाहक है। वह समाज की अनुभूतियों, संघर्षों, मूल्यों, विडम्बनाओं और संभावनाओं को शब्दों में ढालकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करता है। साहित्य न केवल समाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है, बल्कि उसे दिशा देने, प्रेरित करने और जागृत करने का कार्य भी करता है। किसी भी युग का साहित्य उस युग की आत्मा का साक्षात् दस्तावेज होता है। इसी प्रकार मीडिया समाज की आँखें है। वह घटनाओं को देखता है, परखता है और उन्हें जनसामान्य तक पहुँचाता है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका एक सजग प्रहरी के समान है, जो सत्ता, प्रशासन और सामाजिक गतिविधियों पर सतत निगरानी रखता है। एक निष्पक्ष, निर्भीक और उत्तरदायी मीडिया किसी भी राष्ट्र की लोकतांत्रिक शक्ति का आधार होता है। साहित्य और मीडिया, दोनों का उद्देश्य समाज को जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना है। साहित्य विचारों को गहराई देता है, जबकि मीडिया उन विचारों को व्यापक जनमानस तक पहुँचाता है। जब दोनों अपने नैतिक दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन की अविरल धारा प्रवाहित होती है। किन्तु, आज के परिवर्तित परिवेश में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठा है कि क्या वर्तमान समय का मीडिया अपनी सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और मौलिक कर्तव्यों की पूर्ति के प्रश्नचिन्ह के कटघरे में खड़ा नहीं है? जब समाचार का स्थान सनसनी ले ले, जब निष्पक्षता पर पक्षधरता हावी हो जाए, और जब जनहित की अपेक्षा व्यावसायिक हित प्राथमिक हो जाएँ, तब आत्ममंथन अपरिहार्य हो जाता है। मीडिया को स्मरण रखना होगा कि उसकी वास्तविक शक्ति केवल सूचना देने में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अपनी अटूट निष्ठा बनाए रखने में निहित है। यही आत्मचिंतन साहित्य और मीडिया दोनों को समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का बोध कराता है। और यही मणिभाई देशाई जी जैसे महान व्यक्तित्व के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

- डॉ इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

        यह सही है कि साहित्य समाज का दर्पण है क्योंकि कोई भी साहित्यकार अपने समय की ज्वलन्त,चर्चित घटनाओं को कविता, प्रबन्ध काव्य, कहानी, आलेख, उपन्यास में उकेरता है। समय की सामाजिक, सांस्कृति क, राजनीतिक और मानवीय भावनाओं को साहित्य में दर्शाता है। बुराइयों को सुधार के लिए अपना मंतव्य भी प्रस्तुत करता है। तत्युगीन समाज का दस्तावेज प्रस्तुत करता है ।  इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। सुधारक भी कहा जाता है। आदिकाल, मध्यकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल सभी कृतिकारों की लेखनी में जन जीवन की मान्यताओं परंपराओं का यथावत चित्रण रहता है पर आज वैज्ञानिक, भौतिक विकास के फलस्वरुप मीडिया द्रुत गति से जन जागरूकता, हर क्षेत्र की सूचनाओं के प्रचार -प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका तुरंत प्रस्तुत करता है । कहीं भी तनाव,मतभेद ,संघर्ष ,युदधात्मक दंगो ,भ्रष्टाचार का सच, पश्चिमी संस्कृति की झलक  और जनहित के कार्यों की गणना, कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक दृष्टि से भी समाज को देखता है ।वास्तव में मीडिया की अग्रणी भूमिका हो गई है यह सच है साहित्य लेखन में कमी आई है उसका कारण सब कुछ डिजिटल  ई पब्लिकेशन का असर है । कलम हाथ से छूट रही है ;मीडिया द्वारा साहित्य लेखन के कार्य भी संपन्न किये जा रहे हैं। मीडिया द्वारा ही आंखें, कान का उपयोग बहुतायत हो गया है। मीडिया बहुआयामी भूमिका से समाज का जन-जन जागरूक हुआ है ।कहीं सुधारक के रूप में, तो कहीं विध्वंसक के रूप में प्रस्तुत होता है ।लेकिन विकास के दौर में साहित्य का पठन-पाठन लेखन अल्प होता जा रहा है। उसकी जगह मीडिया ने ले ली है।

 - डॉ .रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

        समाज में अच्छा-बुरा जो भी होता है, साहित्यकार अपने लेखनी से उसे साहित्य की किसी भी विधा में सृजित कर प्रस्तुत कर देता है और पाठक उसे पढ़कर समाज में विद्यमान उस खामी अथवा विशेषता को समझ लेता है। फिर उस विशेषता का अनुशरण और खामी को दूर करने का अप्रत्यक्ष रूप से प्रयास शुरू हो जाता है। इस तरह ऐसा क्रम अनवरत चल रहा है।साहित्य का समाज से यही रिश्ता है। समाज के लिए साहित्य इसीलिए दर्पण है। समाज में हो रहे घटनाक्रम को प्रदर्शित करने का दूसरा माध्यम मीडिया भी है जो सीधे या संभावित संबंधित व्यक्ति को उजागर करता है। इसीलिए मीडिया को समाज की आँखें माना जाता है। वर्तमान में साहित्य और मीडिया की भूमिका से सभी भली भांति परिचित हैं। निसंदेह दोनों की भूमिका यानी अभिव्यक्ति में कुछ धुंधलापन सा नजर आता है। खासकर मीडिया में । यही कारण है कि समाज को इन दोनों माध्यम से सजग होने का जो लाभ मिलता रहा है,  उसकी समुचित पूर्ती नहीं हो  रही है। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     साहित्य को सदैव समाज का दर्पण कहा गया है, क्योंकि इसमें युग की संवेदनाएँ, विचारधाराएँ, संघर्ष और वास्तविकताएँ प्रतिबिंबित होती हैं। कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास और नाटक—ये सभी समाज के सुख-दुख, अच्छाइयों और बुराइयों को सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं। साहित्य न केवल समाज का चित्रण करता है, बल्कि उसे दिशा भी देता है। वह मनुष्य के भीतर मानवीय मूल्यों को जागृत कर, उसे संवेदनशील और जागरूक बनाता है। यदि साहित्य दर्पण है, तो मीडिया को समाज की आँखें कहना भी उतना ही सार्थक है। मीडिया वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपने आसपास और दुनिया में घट रही घटनाओं को देख और समझ पाते हैं। समाचार पत्र, टीवी, रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म—ये सभी हमारी दृष्टि को व्यापक बनाते हैं। मीडिया हमें न केवल सूचित करता है, बल्कि कई बार हमें सोचने, प्रश्न करने और जागरूक रहने के लिए प्रेरित भी करता है। जैसे दर्पण कभी-कभी वास्तविकता को सीमित रूप में दिखाता है, वैसे ही मीडिया की आँखों पर भी कभी-कभी पक्षपात या स्वार्थ की धुंध छा जाती है। ऐसे में सत्य और असत्य के बीच भेद करना आवश्यक हो जाता है।  साहित्य और निष्पक्ष मीडिया ही समाज को सही दिशा दे सकते हैं। साहित्य और मीडिया दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण अंग हैं। एक हमें भीतर से जागृत करता है, तो दूसरा बाहर की दुनिया से परिचित कराता है। जब दोनों अपनी-अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाते हैं, तब एक जागरूक, संवेदनशील और सशक्त समाज का निर्माण संभव होता है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

     साहित्य की शिक्षा नहीं होती है, लेकिन मन के विचारों को अभूत करना ही साहित्य है, जो धीरे-धीरे अग्रसर होती जाती है। साहित्य समाज का है दर्पण, तो मीडिया है समाज की आँखे। सही है, साहित्य, समाज, मीडिया त्रय नेत्र है, जो अपने-अपने दिशाओं का बोध करवाती है। आज हर छोटी-छोटी बाते मीडिया में पहुंचती है। जो समाज में अभिव्यक्त करती है। पूर्व साहित्य और वर्तमान साहित्य का स्तर घटते क्रमानुसार है, जिसका समाज में संदेश गलत जाता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर" 

    बालाघाट - मध्यप्रदेश

       मनुष्य केवल जीव नहीं, बल्कि अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों का चलता-फिरता संसार है। इस संसार को समझने, पहचानने और दिशा देने के लिए दो शक्तियाँ सदैव साथ चलती रही हैं—साहित्य और मीडिया। यदि साहित्य समाज का दर्पण है, तो मीडिया उसकी आँखें है; एक दिखाता है कि हम क्या हैं, और दूसरा बताता है कि हम क्या देख रहे हैं। साहित्य का दर्पण। साहित्य समाज की आत्मा का प्रतिबिंब है। यह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय, परिस्थितियों और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण है। जब हम मुंशी प्रेमचंद की रचनाएँ पढ़ते हैं, तो हमें केवल कहानियाँ नहीं मिलतीं, बल्कि उस युग9 का सामाजिक यथार्थ, गरीबी, शोषण और मानवीय संघर्ष स्पष्ट दिखाई देता है। साहित्य हमें हमारे भीतर झाँकने की शक्ति देता है—हमारी अच्छाइयों, कमजोरियों और संभावनाओं का साक्षात्कार कराता है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता; उसी प्रकार सच्चा साहित्य भी समाज की वास्तविकता को बिना आडंबर के प्रस्तुत करता है। यह हमें हमारी गलतियों का एहसास कराता है और सुधार की प्रेरणा देता है। इसलिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शक है।मीडिया की आँखें । दूसरी ओर, मीडिया समाज की आँखों की तरह कार्य करता है। यह हमें वर्तमान से जोड़ता है, घटनाओं, परिवर्तनों और विचारों की जानकारी देता है। मीडिया के माध्यम से हम देश-दुनिया में हो रही गतिविधियों को देखते, सुनते और समझते हैं। यह हमारी दृष्टि को व्यापक बनाता है और हमें सजग नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।परंतु आँखों का काम केवल देखना नहीं, सही और गलत में अंतर करना भी है। यदि मीडिया निष्पक्ष और जिम्मेदार हो, तो वह समाज को सही दिशा दिखा सकता है; लेकिन यदि वह पक्षपातपूर्ण या भ्रामक हो जाए, तो दृष्टि भी धुंधली हो सकती है। इसलिए मीडिया का सशक्त, संवेदनशील और नैतिक होना अत्यंत आवश्यक है। दोनों का सामंजस्य। साहित्य और मीडिया, दोनों का लक्ष्य समाज का विकास और जागरूकता है। साहित्य जहाँ गहराई में जाकर भावनाओं और विचारों को आकार देता है, वहीं मीडिया तात्कालिक घटनाओं को सामने लाकर जनमानस को जागृत करता है। एक आत्मा को स्पर्श करता है, तो दूसरा दृष्टि को विस्तार देता है। जब साहित्य की संवेदनशीलता और मीडिया की सजगता मिलती है, तब एक सशक्त, जागरूक और प्रगतिशील समाज का निर्माण होता है। साहित्य हमें सोचने की शक्ति देता है, और मीडिया हमें देखने-समझने की दिशा। अतः यह कहना उचित है कि साहित्य और मीडिया दोनों समाज के अभिन्न अंग हैं। साहित्य हमें हमारा चेहरा दिखाता है, और मीडिया हमें दुनिया दिखाता है। यदि हम इन दोनों का सही उपयोग करें, तो न केवल स्वयं का विकास कर सकते हैं, बल्कि एक बेहतर, संवेदनशील और सशक्त समाज की रचना भी कर सकते हैं। सच तो यह है— “जहाँ साहित्य सत्य का दर्पण है, वहीं मीडिया जागरूकता की दृष्टि; दोनों मिलकर ही समाज को पूर्णता प्रदान करते हैं।”

- अलका पांडेय 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

       साहित्य समाज का दर्पण होता है.... बहुत पुरानी कहावत है जो सत्य भी है !! जैसे दर्पण के सम्मुख खड़े होकर हम हूबहू अपनी परछाई देखते है , ठीक उसी प्रकार समाज में क्या जो घट रहा है , अच्छा या बुरा , प्रिय अथवा अप्रिय , पाप अथवा पुण्य , सुनियोजित अथवा अव्यवस्थित , सुंदर अथवा  कुरूप , सब साहित्य रूपी दर्पण मैं प्रतिलक्षित होता है क्योंकि साहित्य में वही लिखा जाता है जो समाज मैं घर रहा होता है ! साहित्य यदि समाज का दर्पण है टो मीडिया उसकी आँखें क्योंकि मीडिया रूपी आंखों से , वो घटनाएं भी सामने आ जाती है , जो कहीं दर्पण मैं नहीं आती या दिखती ! मीडिया के कारण वो सच रिकॉर्ड होने लगे हैं , जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता , व कटु सत्य उजागर होने लगे हैं ! लोगों मैं इस कारण जागरूकता बढ़ गई है , व घृणित काले पाप , दंडित होने लगे हैं !! मीडिया के आंखों ने टो सबकी आँखें खोल दी है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

        साहित्य समाज का दर्पण है.हम जानते हैं कि साहित्य के द्वारा हमें पता चल जाता है कि वह समाज कैसा था या कैसा है. या वह किस समाज का साहित्य है. साहित्य पढ़ने से समाज के बारे में पूर्ण जानकारी मिल जाती है. उस समय समाज के लोग कैसे थे उनके व्यावहार कैसे थे. उनके रहन सहन कैसे थे इत्यादि की जानकारी प्राप्त हो जाती है. इसलिए कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. और आजकल मीडिया समाज की आंखें बना हुआ है. समाज में कहा क्या घटित होता है तुरंत मीडिया वाले पहुंच जाते हैं. जिससे घटना का असर तुरंत पूरे देश में फैल जाता है. इसलिए ये कहना सही है कि मीडिया समाज की आंखें है.मीडिया समाज में घटित अच्छे बुरे सारी घटनाओं की जानकारी सबकों दे देता है. इसलिए  हम kah सकते हैं कि मीडिया. समाज की आंखें हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

               वाहहहहह - - - कितनी सटीक और सही बात है। "साहित्य समाज का दर्पण है"बरसो से सुनते आ रहे हैं। मीडिया समाज की आँखें हैं यह बात एकदम सच और अभिनंदनीय है। मीडिया की आँख से कुछ नहीं छिपता। परतों में दबे हीरे जैसे व्यक्तित्व खोज लेती है मीडिया और समाज में दमकते नकली हीरों की सच्ची तस्वीर पेश कर देती है मीडिया। हाँ  - - मीडिया बिकाऊ नहीं होना चाहिए। इतिहास गवाह है कि अनेकानेक सच्चे पत्रकारों को मौत दे दी गयी। अनेकानेक अच्छी पत्रिकाओं और पुस्तकों को गर्त में दफना दिया गया। लेकिन सच्ची सच्चाई यह है कि युगों युगों से साहित्य समाज का दर्पण है तो ऐसे मीडिया के चलते ही। आजादी की लड़ाई में अनेकों लेखकों ने अपनी लेखनी से भारतवासियों को दिशायें दीं। सुभाषचन्द्र से लेकर गाँधी तक  - - अलग अलग विचारधारा वाली मीडिया ने इनके विचारों को फैलाया और आजादी की लौ बुझने नहीं दी। तात्पर्य यही कि भारत जैसे २०००वर्ष पुरानी संस्कृति वाले देश मे साहित्य और मीडिया दोनों की भूमिका अनमोल अनुपम अनन्य अनोखी है। ये दोनों परस्पर पूरक हैं। सदा एकदूसरे के साथ ही अनोखे कारनामे कर दिखाते हैं। इनमें पत्रकारों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।आज के दौर में पीत पत्रकारिता इनकी विशेषता और जरूरत है तभी कोई देश कुछ हद तक तरक्की कर सकता है यह मेरा अपना मत है  - - मानने की बाध्यता नहीं । जिस तरह तन को मन चाहियें उसी तरह साहित्य को मीडिया चाहिए।

- हेमलता मिश्र मानवी 

    नागपुर -महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " साहित्य और मीडिया को लेखन ने ही जन्म दिया है। परन्तु परवरिश अलग-अलग हुईं है। बाकी समय के अनुसार काफी कुछ बदल गया है। मीडिया के विभिन्न स्वरूप आ गये है। जैसे साहित्य के अनेक रूप हैं। वर्तमान में साहित्य और मीडिया न अपने अपने नयें अंदाज फल फूल रहे हैं। जो अनेक तरह की भूमिका निभा रहा है। फिर भी दोनों की स्थिति एक ही नहीं है। 

           - बीजेन्द जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)


Comments

  1. साहित्य जीवन को पूर्ण करता है ।आपके भावों को व्यक्त करने का ज़रिया है साहित्य नहीं तो कहीं न कहीं आप पूर्ण विकास नहीं हो पाता।आपके भावों को साहित्य के बीच लाता है और सही समय की पहचान दिलाता है ।साहित्य समाज का दर्पण है ।मीडिया आज के समय में समाज की आँखें हैजो दूर दूर तक आपकी अभिव्यक्ति सबों के बीच रखता है ।
    - सुधा पाण्डेय
    लंदन
    ( WhatsApp से साभार)

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  2. समाज में घटने वाली हर घटना, सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक, धार्मिक सभी प्रकार की स्थिति का उल्लेख साहित्यिक विधाओं में साहित्यकारों के द्वारा किया जाता है। इसीलिए कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण है। देश एवं समाज की सामाजिक स्थिति का बखूबी वर्णन तात्कालिक साहित्य में मिल जाता है।
    मीडिया उसका प्रचार एवं प्रसार करता है। हर आवाज को पहुंचाने वाला संवाहक बनता है। प्रत्येक स्थिति पर उसकी नजर रहती है। इसीलिए मीडिया को समाज की आंखें कहा जाता है जो तुरंत ही हर एक चीज को नोट करती हैं।
    - गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
    नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
    ( WhatsApp से साभार)

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