पद्मश्री रामानंद सागर स्मृति सम्मान - 2025
जब ज्ञान होगा तो धर्म का निर्वहन स्वत: ही होगा और जब धार्मिक प्रवृत्ति वाला स्वयं: ही मानव सेवा में लग जाता है और मानव सेवा के प्रतिफल में जो आशीर्वाद मिलता है वह ईश्वरीय वरदान से बढ़कर होता है। कुछ लोग जो धर्म को केवल कर्मकांड ही मान लेते हैं वो इस मानव सेवा के वरदान से वंचित रह जाते हैं। ज्ञान सही और ग़लत का,सुकर्म और कुकर्म का हो जाए तो धर्म मार्ग पर चलना सहज हो जाता है। मानव सेवा से बड़ा वरदान कुछ नहीं होता।सनातन धर्म में तो सेवा को विशेष रुप से किया जाता है।मानव तो मानव पशु पक्षियों तक की सेवा की जाती है। वृक्षों और जलस्रोतों तक की सेवा की जाती है।इस सेवा के मूल में भी मानवीय सेवा ही होती है। यह वरदान सभी पा सकते हैं,बस मन में सेवा भाव रखकर कार्य करना है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
मानव सेवा वरदान और धर्म से बड़ा ज्ञान है उक्त कथन मात्र मानवीय भावना नहीं, बल्कि गहन नैतिक, संवैधानिक और विधिक अर्थ रखता है। मानव सेवा का तात्पर्य है कि किसी भी व्यक्ति के प्रति बिना भेदभाव के करुणा, सहायता और सम्मान का व्यवहार करना है। यह सेवा व्यक्ति की गरिमा को केंद्र में रखती है, जो भारतीय संविधान का मूल तत्व है। भारतीय संविधान किसी विशेष धर्म को नहीं, बल्कि मानव गरिमा, समानता और विवेक को सर्वोच्च मानता है। अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन और अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता देता है, पर यह स्वतंत्रता नैतिकता, विवेक और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि धर्म भी ज्ञान और मानवीय मूल्यों से ऊपर नहीं हो सकता। क्योंकि ज्ञान ही व्यक्ति को उचित अनुचित का बोध कराता है, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता देता है और मानव सेवा को दिशा प्रदान करता है। बिना ज्ञान के धर्म अंधानुकरण बन सकता है, जबकि ज्ञान से प्रेरित आचरण ही सच्ची सेवा और न्याय को जन्म देता है। वर्णननीय है कि विधिक दृष्टि से भी न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि संविधान एक जीवित अभिलेख है, जिसका उद्देश्य मानव पीड़ा को समझना और राहत देना है। इसलिए जो आचरण मानव सेवा और ज्ञान पर आधारित है, वही संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है। उल्लेखनीय निष्कर्षतः यह कहती है कि उपरोक्त कथन पूर्णतः वैधानिक, नैतिक और संवैधानिक है। यह स्पष्ट करता है कि मानव सेवा सहित राष्ट्र सेवा ही सर्वोच्च मौलिक कर्तव्य है और ज्ञान उसका आधार है, जो बताता है कि धर्म तभी सार्थक है जब वह मानवता और विवेक के अधीन ही नहीं बल्कि राष्ट्रहित में भी हो।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
भारतीय संस्कृति के प्रबल प्रणेता विनोबा भावे ने मानव सेवा का बड़ा अभियान चलाया था। वे भू मालिकों से भूमि दान मांगते और वह भूमि किसानों को देकर देश में अन्न की फसलें उगाने का स्तुत्य कार्य करते। भूमिहीन किसान अपनी मेहनत का सम्मान पाते और जीविका चलाते। यहाँ मैं मानती हूँ कि इससे बड़ी मानव सेवा और क्या हो सकती है जहां भूखे को रोटी मिले और भूमि को अपना दाय। दूर दूर तक पडि़त पड़ी भूमि का सदुपयोग और भूखे को जीवन यापन का इज्जतदार रास्ता। मानव सेवा का यह ज्ञान निःसंदेह धर्म से बड़ा है। पूजा-पाठ अर्चना से ईश सेवा होती है लेकिन मानवमात्र की सेवा ईश सेवा से बढ़कर है। हमारे धर्मग्रंथों और वेद-पुराणों में ये उदाहरण कूट - कूट कर भरे हैं जहाँ मानव सेवा को सबसे बड़ा वरदान बताया गया है। नीति कथाओं से हमारा साहित्य जगत तारणहार बना है लेकिन सच कहें तो कितने लोग इनसे सीखते हैं। जरूरत इस बात की है कि समाज में हर इंसान मानव सेवा का रास्ता समझे अपनाये। आज के युग में महात्मा गाँधी से लेकर सभी राजनीतिक दलों के दिग्गज नेता से लेकर अभिनेता तक - - और सामान्य मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सब इस मंत्र को लेकर चल रहे हैं। ऐसा नहीं कि ईश सेवा के विरोधी हैं - - लेकिन मानव सेवा को भी ईश सेवा का ही मार्ग माने, उन पर चले तो देशसेवा के साथ साथ इंसानियत का पाठ हम स्वयं पढेंगे और दूसरों को सिखाने का स्तुत्य कार्य कर पायेंगे - - और सिद्ध होगा कि राम से बड़ा राम का नाम।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
जीवन में मानव सेवा एक अभिन्न अंग है, जिसके माध्यम से अनेकानेक सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। मानव सेवा है वरदान, धर्म से बड़ा है ज्ञान। यह सत्य है, इसी आधार पर जीवन प्रसंग चलता है। कई मानवों को खुजली रहती है। सब सेवा एक साथ करने की, लेकिन इसे सेवा नहीं कहा जा सकता है, इससे कुछ हासिल नहीं होता है, मात्र मानसिक और शारीरिक रूप से तनाव उत्पन्न होता है, हम सोचते जरुर है, हमें आत्मीय सुख मिल रहा है, लेकिन यह सेवा, सेवा नहीं होती है? एक मानव एक ही सेवा करें, तो अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है और उसे वरदान प्राप्त होता है। इसी तरह एक धर्म अपनाने से ज्ञान बढ़ता है और अपनी तपस्या पूर्ण होती, ज्ञान से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के दुःख को समझना, उसे दूर करने का प्रयास करना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है। इसी संदर्भ में कहा गया है— मानव सेवा है वरदान। जब हम किसी भूखे को भोजन कराते हैं, पीड़ित को सहारा देते हैं या अशिक्षित को ज्ञान का दीप देते हैं, तब हम ईश्वर की सच्ची आराधना करते हैं। धर्म हमें नैतिकता, करुणा और सद्भाव का मार्ग दिखाता है, किंतु यदि धर्म केवल बाहरी आडंबर बनकर रह जाए और उसमें विवेक व समझ का अभाव हो, तो वह मानवता से दूर ले जा सकता है। यहीं ज्ञान का महत्व सामने आता है। ज्ञान मनुष्य को सोचने, प्रश्न करने और सही-गलत में अंतर समझने की शक्ति देता है। ज्ञान के बिना धर्म अंधविश्वास बन सकता है, जबकि ज्ञान के साथ धर्म मानव कल्याण का साधन बनता है।इतिहास साक्षी है कि महात्मा बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरु नानक जैसे महापुरुषों ने मानव सेवा और ज्ञान को ही सच्चा धर्म माना। उन्होंने जाति, पंथ और संप्रदाय से ऊपर उठकर मानवता की बात की। आज के समय में भी जब समाज अनेक विघटनकारी विचारों से जूझ रहा है, तब ज्ञान-आधारित सोच और सेवा-भाव ही सामाजिक समरसता को बचा सकते हैं। अतः यह कहना उचित होगा कि मानव सेवा केवल एक पुण्य कर्म नहीं, बल्कि समाज के लिए एक वरदान है, और धर्म तभी सार्थक है जब वह ज्ञान से आलोकित हो। ज्ञान हमें मानव बनाता है और सेवा हमें महान। यही दोनों मिलकर एक सशक्त, संवेदनशील और सभ्य समाज की नींव रखते हैं।
निष्कर्षतः
धर्म का लक्ष्य आत्मशुद्धि है,
ज्ञान का लक्ष्य बोध है,
और मानव सेवा—इन दोनों से सर्वोच्च है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
सत्य कथन मानव सेवा वरदान ही है. इस सेवा बढ़ कर कोई सेवा नहीं है. मानव सेवा में परम आनंद की प्राप्ति होती है. भूखे को खाना खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना,कंपकंपाती ठंढ में किसी को गर्म वस्त्र देना, बेघरों को घर देना उससे बढ़ कर और मानव सेवा क्या हो सकती है. किसी ग़मगीन, दुःखी व्यक्ति के चेहरे पर खुशी ला देना सबसे बड़ी मानव सेवा है.धर्म जो धारण किया जाय उसे धर्म कहते हैं. जो कि ज्ञान से ही सम्भव है. इसलिए धर्म से ज्ञान को बड़ा बताया गया है. यदि हमें ज्ञान ही नहीं रहेगा तो हम धर्म के बारे में कैसे जान सकते हैं. और यदि नहीं जान पायेंगे तो फिर धर्म को नहीं समझ पायेंगे. जब नहीं समझ पाएंगे तो फ़िर धर्म को धारण करना मुश्किल हो जाएगा.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
मानव सेवा सबसे बड़ा वरदान या कि कहिए आशीर्वाद है, क्योंकि यह केवल धार्मिक कर्मकांडों से नहीं, बल्कि वास्तविक ज्ञान और मानवता के अनुभव से आती है, जहाँ दूसरों की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म और ईश्वर की सच्ची पूजा है, जो हमें जीवन का असली उद्देश्य सिखाता है और समाज को बेहतर बनाता है. अनेक दर्शनों और आध्यात्मिक विचारों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग का हो, उसकी मदद करना, उसके दुःख-दर्द को समझना और उसे दूर करना ही सबसे पवित्र कार्य है. मानव सेवा यह ज्ञान ही सबसे बड़ा वरदान है. ऐसे सच्चे धार्मिक लोगों से ही धरती अपनी धुरी पर टिकी हुई है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
जिंदगी में विविधता भी हैं और विचित्रता भी। असमानताएं भी बहुत हैं। किसी के पास ऐश्वर्य के सभी साधन उपलब्ध हैं तो किसी के पास खुद जो कपड़े पहने हुए है उसके अलावा कुछ नहीं। इन सब स्थितियों के लिए कर्म और भाग्य का प्रतिफल कहकर इस अंतर को अनदेखा किया तो जा सकता है परंतु ऐसा करना उस पक्ष के लिए उचित नहीं होगा। जो बेसहारा हैं, दीन-हीन हैं। हमारा धर्म और हमारी नैतिकता, हमारी इंसानियत , हमारा फर्ज निभाना यहाँ बहुत आवश्यक है कि हम उनका सहारा बनें। उनकी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो बने, जितना बनें, उनकी यथाशक्ति मदद करें। एक फिल्मी गीत है, " अपने लिये जिये तो क्या जिये। एक दूसरा गीत है " गरीबों की सुनो, वो तुम्हारी सुनेगा। "रामचरितमानस की एक चौपाई है, " परहित सरस धर्म नहीं भाई। " इन पंक्तियों से सीखना भी है और कार्यान्वयन भी करना है। यही मानव सेवा है। यही हमारे सद्कर्मों में से एक है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
मानव सेवा हमें दूसरों की मदद करने और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर प्रदान करती है। नि:स्वार्थ भाव से सेवा ही हमें अपने समाज और समुदाय के प्रति जिम्मेदार बनाती है, जो हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करती है। मानव सेवा का प्रभाव न केवल दूसरों पर पड़ता है, बल्कि हमें भी आंतरिक शांति और संतुष्टि मिलती है। धर्म का अर्थ है -" कर्तव्य, जिम्मेदारी और नैतिकता। "यह हमें सही और गलत के बीच के अन्तर का बोध कराता है मानव सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है, क्योंकि यह हमें दूसरों की मदद करने और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर प्रदान करतीं हैं। धर्म और ज्ञान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मानव सेवा सबसे ऊपर है, क्योंकि यह हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करती है।हमें धर्म, ज्ञान और मानव सेवा के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। संक्षेप में कहना चाहूँगी कि "हमें अपने धर्म का पालन करते हुए ज्ञान प्राप्त कर मानव सेवा को तैयार रहना चाहिए।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
अगर मानव सेवा की बात करें तो मानव सेवा एक वरदान से कम नहीं क्योंकि निस्वार्थ भाव से दुसरों की मदद करना,जरूरतमंदों को सहारा देने से बढ कर कोई अच्छा कार्य नहीं है जिससे न केवल दुसरों का भला होता है बल्कि सेवा करने वाले को भी आत्म संतुष्टि मिलती है जो एक सच्ची ईश्वर की भक्ति के समान है तथा इससे गरीबों,बिमारों और जरूरतमंदों के प्रति करूणा,स्नेह तथा एकता की भावना को बढावा मिलता है कहने का भाव मानव सेवा ही ईश्वर सेवा के बराबर मानी जाती है तभी कहते हैं नर सेेवा नारायण सेवा है, यही आज की चर्चा का विषय है की मानव सेवा है वरदान और धर्म से बड़ा है ज्ञान, सत्य भी है मानव सेवा किसी स्वार्थ के बगैर दुसरों के कल्याण के लिए कार्य करने को प्रेरित करती है जो मानव समाज की उन्नति का आधार है तथा दुसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का मौका देती है इसे ही जीवन का परम उदेश्य माना जाता है,अगर धर्म की बात की जाए तो धर्म का ज्ञान व्यक्ति को मानवता और सही कर्मों की और ले जाता है क्योंकि बिना धर्म के ज्ञान केवल अंधविश्वास या कर्मकांड बन सकता है देखा जाए ज्ञान का अर्थ केवल किताबी पढ़ाई से नहीं है बल्कि आत्मज्ञान ,विवेक और सत्य को समझने का है जो सही गलत का भेद सिखाता है, धर्म ही कर्तव्य, न्याय और सदाचार है इसलिए धर्म से बड़ा है ज्ञान क्योंकि ज्ञान उस कर्म की दिशा तय करता है जिससे व्यक्ति का कल्याण हो सके अन्त में यही कहुंगा की सत्य और मानवता सबसे बड़ा धर्म है और इन्हें जानना सबसे बड़ा ज्ञान है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
यदि हम यह मानते हैं कि नर ही नारायण है तो भगवान के निकट पहुँचने अथवा उसे पाने के लिए मानव सेवा से अधिक उत्तम कुछ और है ही नहीं। मानव सेवा अर्थार्त प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर को देखना और उसका उसी प्रकार सम्मान, सेवा आदि करना जैसे हम ईश्वर की करते हैं। मानव सेवा से ही जीवन में संतुष्टि आती है। जीवन प्रफुल्लित होता है। करुणा, दया व धर्म में बढ़ोतरी होती है। मानव सेवा को जिसने जीवन का ध्येय बनाया वह न केवल स्वयं सकारात्मक व रचनात्मक ऊर्जा से भर जाता अपितु ताउम्र अच्छे स्वास्थ्य का लाभ भी लेता है।मानव सेवा वरदान साबित होती है। यह सही है कि धर्म से बड़ा ज्ञान है। जिसे सही मायने में ज्ञान प्राप्त हो जाता है वह मानव की बनायी धर्म की बेड़ियों से ही आज़ाद हो जाता है। वह ज्ञान द्वारा कर्म व मानव सेवा के मर्म को ज़ान लेता है। उसे पाप-पुण्य, अहिंसा व कर्म के बारे में बताना सूरज को दिया दिखाने के सामान है।
- रेनू चौहान
दिल्ली
ऐसे तो सभी प्राणियों की सेवा करना धर्म है, लेकिन मानव सेवा सबसे बड़ा वरदान है।हमें हमेशा मानव की सेवा करनी चाहिए।यह सर्वाधिक बड़ा धर्म है।जो व्यक्ति ऐसा करते हैं,वे पुण्य के भागी बनते हैं।अतः हमें मानव की सेवा करनी चाहिए।धर्म से बड़ा ज्ञान होता है। हमें खूब पढ़ना चाहिए।खूब ज्ञान अर्जित कर हमें विद्वान बनना चाहिए।दूसरों को भी ज्ञान देना चाहिए।यह भी अच्छे कर्मों में आता है। हमें बड़े महापुरुषों से शिक्षा लेनी चाहिए।
- दुर्गेश मोहन
पटना - बिहार
मानव सेवा सबसे बड़ा वरदान और सबसे बड़ी पूजा है। कहा भी गया है..नर सेवा नारायण सेवा। इसे पूर्णरूपेण चरितार्थ करते हुए मैंने अपने पति को देखा है। घर हो या बाहर…वे सेवा करने में कभी पीछे नहीं रहते। निस्वार्थ भाव से की गई सेवा से इतना आशीर्वाद और आशीष मिलता है और इतनी शुभकामनाएँ मिलती हैं कि मनुष्य का आँचल कभी रिक्त नहीं होता। सेवा वही है जो बिना किसी लालसा के की जाये। फल की कामना से की गई सेवा का कोई मोल नहीं। निस्वार्थ सेवा का मूलमंत्र जिसने अपने जीवन में अपना लिया उसे अलग से कोई पूजा करने की आवश्यकता ही नहीं है। सेवा सबसे बड़ा धर्म है। जो भी इस धर्म का पालन करता है वह ईश्वर के सबसे निकट होता है। मानव सेवा ऐसा परम धर्म है जिसमें सारे धर्मों का सार और ज्ञान निहित है।
- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून - उत्तराखंड
मेरी राय में “मानव सेवा है वरदान, धर्म से बड़ा है ज्ञान” यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा है।मानव सेवा वह कर्म है जिसमें बिना भेद-भाव, बिना स्वार्थ, किसी इंसान के दुःख को अपना समझकर हाथ बढ़ाया जाता है। यही सेवा मनुष्य को मनुष्य बनाती है। जब कोई भूखे को भोजन देता है, दुखी को ढाँढस बँधाता है या असहाय का सहारा बनता है, तब वह किसी धर्म का नहीं बल्कि मानवता का पालन कर रहा होता है। इसलिए मानव सेवा सचमुच एक वरदान है—देने वाले के लिए भी और पाने वाले के लिए भी। जहाँ तक धर्म की बात है, धर्म का मूल उद्देश्य भी तो इंसान को बेहतर बनाना ही है। लेकिन जब धर्म आडंबर, भेदभाव या अहंकार का रूप ले ले, तब ज्ञान उससे बड़ा बन जाता है। ज्ञान हमें सोचने, समझने और सही-गलत में फर्क करने की शक्ति देता है। ज्ञान बिना करुणा के अधूरा है और धर्म बिना ज्ञान के अंधा। असल में, यदि धर्म हमें मानव सेवा की ओर नहीं ले जाता और ज्ञान हमें विनम्र नहीं बनाता, तो दोनों का मूल्य कम हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि मानव सेवा ही सच्चा धर्म है और ज्ञान उसका सबसे उज्ज्वल रूप। संक्षेप में,धर्म रास्ता दिखाता है,ज्ञान समझ देता है,और मानव सेवा उन्हें सार्थक बनाती है।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
सभी प्रकार के साधनों की सेवा के बाद मानव सेवा मिलती है। जब किसी भक्त पर भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं, तब बड़ा उपकार करके उसे मानव सेवा देते हैं। सेवा साधन नहीं है बल्कि सभी साधनों का फल है- सेवा। जब कोई प्राणी जप, तप, पूजा, पाठ, दान, नियम- व्रत, तीर्थ- यज्ञ आदि -आदि सब कुछ करके निवृत्त हो जाता है तब उन सभी साधनों के फलस्वरूप उसे मानव सेवा मिलती है। मानव से बढ़कर दुनियां में कुछ नहीं है। श्री नारायण भगवान को जब अपनी आकृति बहुत पसंद आई तब, उन्होंने बिल्कुल अपने जैसी दुनिया बनाई। हर मानव के रूप में नारायण भगवान स्वयं हैं। तभी कहते हैं कि ज्ञानीजन सदा मानव सेवा करने को तत्पर रहते हैं। मानव की सेवा भगवान की पूजा है। हम सदैव देखते हैं कि जब किसी परिवार में बहुत बड़ी खुशी का अवसर आता है तब परिवार वाले सभी लोगों को भोजन करवाते हैं, वस्त्र, रुपए इत्यादि भेंट देकर हर मानव को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद पाते हैं। कुछ महानुभाव शब्दों द्वारा शिक्षा ज्ञान देकर अथवा अन्य अनेक कर्मों द्वारा अपना धर्म समझकर मानव सेवा करते हैं। माता-पिता की सेवा करना, परिवार को पालना, बड़ों का आदर करना, जीव- जंतुओं की रक्षा करना, सत्य की राह पर चलना आदि कर्मों को करना व्यक्ति का धर्म है। इससे भी बढ़कर इस धर्म का ज्ञान होना बहुत बड़ा वरदान है। इसी कारण से मानव सेवा को सभी साधनों का फल, प्रभु का दिया हुआ वरदान माना गया है।
- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
" मेरी दृष्टि में " सेवा और ज्ञान को सभी समझते हैं। जो धर्म से जुड़े होते हैं। धर्म के आते ही सेवा और ज्ञान का स्वरूप बदल जाता है। इसलिए धर्म को बीच में नहीं लाना चाहिए।
बहुत ही अच्छे विषय पर चर्चा हुई, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय बीजेंद्र जी, बधाई शुभकामनाएं 🙏💐😊
ReplyDeleteहार्दिक आभार।
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