कल रविवार को टीवी पर " आप की अदालत " कार्यक्रम में गायक कैलाश खेर का इन्टरव्यू देख रहा था। जो प्रसिद्ध पत्रकार आदरणीय रंजत शर्मा द्वारा पेश किया जा रहा था। गायक कैलाश खेर जैसे व्यक्तित्व का कार्यक्रम देखना, बहुत भाग्य से देखने को मिलता है। कार्यक्रम से बहुत अच्छा ज्ञान प्राप्त हुआ है। जिससे ये दो लाइन उत्पन्न हुई है। जो आज की परिचर्चा का शीर्षक के रूप में सामने पेश है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:- जिंदगी की इस अंधी दौड़ में, हम सब अपने हालात और सामर्थ्य के अनुसार , अपने गंतव्य की ओर , अग्रसर होते हैं और निरंतर प्रयासरत रहते है !! किसी को लक्ष्य प्राप्ति होते है व किसी को नहीं ! कोई अपनी हार से सीखकर , अपने आप को सुधारकर , नए जोश के साथ , फिर संघर्ष करता है , व अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है , और कोई हारकर संघर्ष करना ही छोड़ देता है ! जिसे इस रह मैं सफलता मिल गई , वो ही उसकी अपनी है , व जो न मिली , उसका वह सपना है !!
अपना बनाना चाहते हो ,
यदि तुम अपना सपना !!
कर्म की राह पर , तुम ,
निरंतर चलते रहना !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
“जो मिल गया वह अपना है, जो ना मिला वह सपना है” मेरी राय में हमें जो मिल गया यानि जो कुछ भी हमारे पास है।चाहे वो छोटी सी चीज़ हो, एक रिश्ता हो, एक स्किल हो, एक मौका हो या एक नौकरी हो वो ही हमारा अपनी है। → उसे _गुरु मानो_,
_पर उस पर अभिमान नहीं करना चाहिए_, लेकिन कभी अनदेखा भी न करना चाहिए । जो मिल गया है, वो हमारे कर्म, लगन, यानि लक का फल है — उसे _अपना_ समझो।“अपना” का मतलब जो तुम्हारे पास है, तुम्हारे लिए है, तुम्हारे द्वारा बनाया गया है।_ लेकिन कभी नहीं मिल सकता वो हमारा सपना नहीं होता। सपना होता है हमारा- लक्ष्य, आकांक्षा, इच्छा — जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन अगर हम इसे _“ना मिला = सपना”_ कहकर छोड़ दे तो वो सचमुच सपना ही रह जाएगा। “जो मिल गया — उसे अपना मानो,और सेफ्टी रखो। जो ना मिला — उसे लक्ष्य बनाओ।जो सपना है — उसे पूरा करने के लिए कर्म करो!जीवन में थोड़ा बदलाव करके देखो: सपना भी अपना बनते देर नही लगती। गजल सम्राट कवि दुष्यंत जी की लाइने-
कौन कहता है कि आसमां में
सुराख नहीं हो सकता।
एक पत्थर तो ,
तबीयत से उछालो यारो।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
यह कथन स्वीकार और आकांक्षा के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित करता है और जीवन के यथार्थ को अत्यंत सरल तथा प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। जो मिला उसके प्रति कृतज्ञता आत्मसंतोष और यथार्थ बोध का भाव झलकता है और यह सिखाता है कि वर्तमान में उपलब्ध साधनों और उपलब्धियों को अपनाना ही मानसिक शांति का आधार है। वहीं जो नहीं मिला उसे हताशा नहीं बल्कि सपने का नाम देकर भविष्य के प्रति आशा संघर्ष और सतत प्रयत्न की ज्वाला प्रज्वलित की गई है जो मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।यह पंक्ति न तो पराजय को स्वीकार करती है और न ही मोहभंग को बल्कि यह जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने की कला सिखाती है। यह बताती है कि जीवन में उपलब्धियों को सम्मान के साथ स्वीकार करना और अधूरी आकांक्षाओं को लक्ष्य बनाकर निरंतर प्रयास करना ही सच्चा सकारात्मक दृष्टिकोण है। यह विचार मनुष्य को ठहराव से बाहर निकालकर कर्म पथ पर अग्रसर करता है और उसे आत्मविश्वास तथा धैर्य से भर देता है। इसमें वैराग्य नहीं ऊर्जा है और निराशा नहीं संभावना है। यह शिकायत नहीं संकल्प है बल्कि यह कथन जीवन की चुनौतियों को अवसर में बदलने का साहस प्रदान करता है और मन को दृढ़ बनाता है।यह आत्मस्वीकृति और आत्मविकास के बीच संतुलन स्थापित करते हुए मनुष्य को आंतरिक शक्ति से जोड़ता है। वर्तमान सामाजिक और व्यक्तिगत संघर्षों के बीच यह विचार मनुष्य को आत्मबल धैर्य और कर्मशील आशावाद का संदेश देता है। यह समझाता है कि सपने टूटते नहीं बल्कि दिशा देते हैं और हर अधूरा सपना आने वाले संघर्ष की भूमिका बनता है। ऐसे विचार समाज में आशा चेतना और सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा बन सकते हैं।
- डॉ इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू एवं कश्मीर
जो मिल गया उसी में संतुष्ट होना है ! अपना लक्ष्य होना चाहिए ! इंसान मत्वकांक्षाओं की उड़ान में उड़ अपना अस्तित्व नही खोना हैं! अस्तित्व के साथ सहअस्तित्व बना पथ प्रदर्शक बनना चाहिए! गुरु बन शिष्य को जो उपलब्धि हासिल होती है ! जीवन सँवारने वह समझ जाता है “जो मिल गया वह अपना है”बाकी सभी हताशा निराशा का मायाजाल है ! मोह का बंधन है ! जो तरह तरह के सपने दिखाता जिंदगी को भुलावे में रखता है ! इंसान अपनी बाते कहने सुनने में अपने आपको निरीह समझ भुलावे में जीता है! मुक्कदर का खेल समझ ,जो ना मिला वह सपना है ! आगे जीने के लिए
समझो तो बहुत कुछ है
ना समझो तो कुछ नहीं है
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
कर्म और भाग्य जीवन के दो ऐसे पहलू हैं जिनके बीच जीवन का पूरा अस्तित्व समाया होता है। या यूँ भी कहा जा सकता है कि इन दोनों से पूरा जीवन प्रभावित रहता है। इन्हीं के प्रभाव से हमारा जन्म निर्धारित होता है और जीवन में मिलना- न मिलना तय होता है। इसमें एक बात और महत्वपूर्ण है, वह है कर्म से भाग्य के निर्माण का। हमारे कर्म ही हमारा भाग्य बनाते हैं। यह ईश्वर की नीतिगत नियति व्यवस्था है। जिसमें प्रत्येक जीवन को कर्म करने का अवसर मिलता है ताकि वह अपना भाग्य बनाकर अपने जन्म और जीवन को उन्नत और समृद्ध बना सके। इसी परिप्रेक्ष्य में यह कहना गलत नहीं होगा कि जो मिल गया वह अपना है और जो ना मिवा वह सपना है। यह सब कर्म के अनुसार निर्धारित भाग्य का प्रतिफल है। यह सूक्ष्म आध्यात्म है, इस चक्र को समझना जागरूकता होगी और सद्कर्म करना समझदारी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
यह बात एकदम सही है। जो मिलता है वही हमारे कर्मों का प्राप्य होता है और वही हमारा होता है क्योंकि उसे हमने अपने श्रम से अर्जित किया है।अब वह हमारे लिए अच्छा, कम अच्छा या बुरा है यह अलग बात है। जो नहीं मिलता उसने ईश्वर की मर्जी निहित होती है। ईश्वर जानता है हमारे लिए क्या सही है और क्या नहीं है। इसलिए जो नहीं मिला उसे ईश्वर की मर्जी मान कर स्वीकार कर लेना चाहिए। कविवर हरिवंश राय बच्चन ने भी यही कहा है… मन का हो तो अच्छा ना हो तो बहुत अच्छा क्योंकि वह ईश्वर के मन का होता है।
- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून - उत्तराखंड
जिन्दगी एक रात है, जिसमें न जाने कितने सपने हैं, जो मिल गया वह अपना है, जो ना मिला वह सपना है. जिंदगी में हर किसी को आकांक्षाएं बहुत होती हैं. एक इच्छा पूरी होने से पहले ही दूसरी इच्छा सिर उठा लेती है. अब हर किसी की हर एक इच्छा पूरी नहीं हो सकती और इच्छा पूरी न होने पर उदासी और उदासी के बाद अवसाद, अवसाद का अर्थ है बेड़ा गर्क! दूसरी तरफ इच्छा पूरी न होने पर अगर सोचा जाए कि-
जो मिल गया वह अपना है
जो ना मिला वह सपना है
तो मौज-ही-मौज है! जो मिल गया, उसका इस्तेमाल करो, आनंद लो, खुश रहो और जो ना मिला उसको सपना समझकर उदास मत हो. सपना पूरा करने के लिए भले ही कोशिश जारी रखो, पर तनाव से परे हटकर! यह तनाव ही तो जो मिल गया, उसका इस्तेमाल कर उसका आनंद नहीं लेने देता! इसलिए-
न ज्यादा लगाव
न ज्यादा तनाव!
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
देखा जाए जिंदगी एक रात की भाँति है जिसमें न जाने हम कितने ख्वाब देखते हैं कि आज हमारे पास वो चीज है,कल कोई दुसरी होगी,परसों तीसरी कहने का भाव लोभ मोह के चक्कर में हम कुछ न कुछ हासिल करने की तमन्ना दिल में रखते हैं जबकि जो हमारे पास होता है उसका जिक्र कम करते हैं लेकिन ज्यादा पाने की लालसा हमेशा रखते हैं वास्तव में हम यह नहीं जानते की जो मिल गया है वोही अपना है और जो न मिला वो मात्र सपना है, तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं ,मेरा तर्क है कि जो चीजें हमें जीवन में प्राप्त हो जाती हैं वही हमारी अपनी हैं और जो नहीं मिल पाती या खो जाती हैं वो सिर्फ हमारे ख्वाब या कल्पना बन कर रह जाते हैं इसलिए हमें वर्तमान को स्वीकार कर के ही खुश रहना चाहिए,क्योंकि संतोष धन ही सबसे उत्तम धन है इसलिए जो आपके पास हो उसे ही आपना मान कर संतोष करना चाहिए क्योंकि जो चला गया या मिलने वाला है उसके लिए पछताने का कोई फायदा नहीं जीवन में संतुष्टि और सकारात्मकता का भाव होना चाहिए ताकि दुसरों की या बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर न रहते हुए जो पास है उसी को हीरा समझ लिया जाए,साहिर लुधियानवी ने सच लिखा है,जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया, गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया, कहने का भाव जो हमारे पास है वोही सही दौलत व खजाना है जो खो गया हो या जो मिलने वाला हो वो तो ख्वाब थे या होंगे लेकिन हमें अपने पास वाले खजाने को संभालना आना चाहिए चाहे,दौलत हो,बुद्धि हो या ज्ञान इन सभी को हम बढा सकते हैं बशर्ते हमें इन्हें संभालना आना चाहिए क्योंकि जो हमारे पास है वोही असली खजाना है जिसका इस्तेमाल हम अपनी बढौतरी के लिए कर सकते हैं बाकि तो सब ख्वाब हैं जो कभी पूरे नहीं होते और सपना बन कर हमारे दिलो दिमाग में घूमते रहते हैं,इसलिए हर मानव को जो मिला है उसे ही अपना समझ कर सही खर्च करना आना चाहिए ताकि उसे ख्वाब लेने की जरूरत ही न पड़े जबकि हम अपनी बुद्धि, अपने ज्ञान ,अपनी दौलत का सही इस्तेमाल ही नहीं कर पाते लेकिन जो हमारा है ही नहीं उसके सपने देखते हैं तभी तो कहा है,कस्तुरी Shubh बसे भृग ढूंढे बन माहि ऐसे घटि,घटि राम हैं दुनिया देखे नाहिं।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
“जो मिल गया वो अपना है, जो न मिले वह सपना है”—यह कथन जीवन की यथार्थवादी सोच को अभिव्यक्त करता है। मनुष्य का जीवन इच्छाओं, अपेक्षाओं और उपलब्धियों के बीच निरंतर संतुलन साधने का प्रयास है। जो हमें प्राप्त हो जाता है, वही हमारी वास्तविक संपत्ति बनता है—चाहे वह संबंध हों, अवसर हों या अनुभव। इनके प्रति संतोष और कृतज्ञता का भाव जीवन को स्थिरता और शांति देता है। वहीं, जो प्राप्त नहीं हो सका, उसे सपना मानना जीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सपने निराशा का कारण नहीं, बल्कि लक्ष्य की दिशा दिखाने वाले दीपक होते हैं। यदि हर अधूरी इच्छा को पीड़ा बना लिया जाए तो जीवन बोझिल हो जाएगा, लेकिन यदि उसे भविष्य की संभावना के रूप में स्वीकार किया जाए तो वही सपना परिश्रम और आशा की शक्ति बन जाता है। यह कथन हमें आसक्ति और मोह से मुक्त होकर यथार्थ को अपनाने की सीख देता है। यह सिखाता है कि जीवन में हर वस्तु या व्यक्ति हमारे अधिकार में नहीं होता, फिर भी जीवन सुंदर और सार्थक रह सकता है। जो मिला है, उसे पूरे मन से अपनाना और जो नहीं मिला, उसके लिए आत्मग्लानि के बजाय सकारात्मक प्रयास करना ही जीवन की परिपक्वता है। अतः यह पंक्तियाँ संतोष, कर्म और आशा—तीनों के संतुलन का संदेश देती हैं। यही संतुलन मनुष्य को मानसिक शांति, जीवन में स्थायित्व और आगे बढ़ने का साहस प्रदान करता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
हम अक्सर देखते हैं कि हमारे अपने जीवन में हमें जो मिला हुआ है उसे न देख कर, जो नहीं मिला सदैव ध्यान उसी की ओर रहता है। बहुत लोग ऐसे होते हैं जिन्हें, जितना हमें मिला है उतना भी नहीं मिलता। अपने से बड़ों को देखकर हमें कभी शिकवा शिकायत नहीं करनी चाहिए। जो मिल गया वही अपना है, उसे ही स्वीकार कर, प्रभु का शुक्र अदा करते हुए जीवन में प्रसन्न रहना चाहिए। जो नहीं मिला उसे सपना समझ कर छोड़ देना चाहिए। समय से पहले भाग्य से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। सपने में पाए गए धन के पीछे भागना मूर्खता है। इसलिये, जो नहीं मिला उसके लिए व्याकुलता छोड़कर, जो मिला है उसे प्रसन्न रहकर भोग लेना चाहिए क्योंकि एक जीवन के वर्ष बहुत कम हैं और इच्छाएं वट वृक्ष की भांति अपनी जड़ें फैलाती रहतीं हैं।
- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
" मेरी दृष्टि में " जो अपना है वह अवश्य मिलेगा। इस को भाग्य कहते है। इस को नसीब कहते है। संघर्ष से बहुत कुछ मिलता है। जो जीवन भर का प्रयास से मिलता है। वह अनमोल कहलाता है। फिर भी कुछ प्रयास सफल नहीं होते हैं। जो सपना बनकर रह जातें हैं।
- बीजेन्द्र जैमिनी
(संपादन व संचालन)
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