पद्म भूषण विजय तेंदुलकर स्मृति सम्मान - 2026

           शिक्षा वह धन है । जिस को कोई चोरी नहीं कर सकता है। ना ही शिक्षा का कोई बांटवा कर सकता है। शिक्षा देने से शिक्षा (ज्ञान) बढ़ती है। शिक्षा से बहुत कुछ मिलता है। जो जीवन में बहुत काम आता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं : -
       सरस्वती के भंडार की बड़ी अपूर्व बात ज्यों ज्यों खर्चे त्यूं त्यूं बड़े बिन खर्चे घटि जात,  इस दोहे में  शिक्षा रूपी‌ धन की‌ बात की जा रही है कि यह एक‌ ऐसा धन है‌ जो खर्च करने से या बांटने से बढता है  नहीं तो दुसरे धन खर्च करने से घटते हैं केवल शिक्षा धन ही‌ एक ऐसा धन है जिसे जितना बांटा जाए उतना ही बढ़ता‌ जाता है,  इसके साथ साथ यह एक ऐसा ‌धन है जिससे‌‌ कोई हिस्सा नहीं मांग सकता इससे अपना ज्ञान  बढता भी है और इंसानियत को मोल भी  उंची‌ स्तर तक पहुंचता है और इंसान‌ की  इज्जत, शान‌ ,शौकत व पद में  बढ़ोतरी होती‌ है, यही नहीं शिक्षा ज्ञान,कौशल और नैतिकता प्रदान कर व्यक्ति के‌ जीवन को बेहतर, उज्ज्वल और उद्देश्यपूर्ण बनाती है जिससे व्यक्ति आत्मनिर्भर और सश्क्त बनता है और समाज में एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित होता है,इसके‌ साथ साथ यह अच्छे करियर के अवसर खोलती है और इससे  मानसिक विकास, सही निर्णय लेने तथा‌‌ सामाजिक कार्यों में भाग लेने व सफल बनाने में हिम्मत  की बढौतरी होती है, यही‌ नहीं शिक्षा ही व्यक्ति ‌को सशक्त बनाती है  जिससे आत्मविश्वास में बढोतरी होती है जिससे व्यक्तित्व में निखार आता है तथा कैरियर और आर्थिक उन्नति  में विकास होता है अन्त में यही कहुंगा की शिक्षा के बिना  मनुष्य पशुओं के‌ समान माना जाता है क्योंकि शिक्षा ही  सही और गलत का‌ फर्क ‌सिखाती‌ है‌ जिससे व्यक्ति नैतिक मुल्यों के‌‌ साथ जीवन जीता है कहने का भाव शिक्षा एक शक्तिशाली उपकरण है जो व्यक्ति को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान  समृदि और एक सार्थक जीवन की‌ और ले‌ जाती है इसलिए शिक्षा वह धन है‌ जिससे इंसान, इंसान कहलाने का हकदार बनता है।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

         यह पंक्ति शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है।शिक्षा ऐसा धन है जो बाँटने से कम नहीं होता, बल्कि और अधिक समृद्ध होता है। जब हम अपना ज्ञान दूसरों के साथ साझा करते हैं, तो समाज में समझ, चेतना और सकारात्मकता का विस्तार होता है। शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि सोचने-समझने की शक्ति देती है। “शिक्षा वह धन है जिसे इंसान बनता है”  यह पंक्ति बताती है कि शिक्षा मनुष्य को मानवीय मूल्यों से जोड़ती है। वह हमें सही-गलत में फर्क करना सिखाती है, संवेदना, अनुशासन और जिम्मेदारी का भाव जगाती है। कुल मिलाकर, शिक्षा मनुष्य को केवल पढ़ा-लिखा नहीं बनाती, बल्कि उसे सच्चे अर्थों में इंसान बनाती है यही इसकी सबसे बड़ी पूँजी है।

- सुनीता गुप्ता 

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

        जीवन में शिक्षित होना बहुत आवश्यक है। यह ऐसा माध्यम और साधन है,जिसके तहत आप न केवल स्वयं को बल्कि परिवार ,यहाँ तक कि राष्ट्र के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। जीवन में शिक्षा का क्षेत्र अनंत है। अत: शिक्षा के लिए क्रमश: स्वयं की सामर्थ्य के अनुसार आगे बढ़ना होता है और इसके लिए लगन,धैर्य संकल्प, एकाग्रता और परिश्रम की शत-प्रतिशत सतत आवश्यकता होती है। इनमें कोई भी कारक कमजोर हुआ कि उदेश्य की सफलता के अंश में गिरावट आयी। शिक्षा में जितने निपुणता होगी , जितने ज्ञानवान बनेंगे, भविष्य में उतना ही श्रेष्ठ योगदान समाज और राष्ट्र को देने में सामर्थ्यवान बन सकेंगे।शिक्षा केवल किताबी ज्ञान और परीक्षा में सफल होने तक सीमित नहीं है। बल्कि शिक्षा जागरूक,समझदारी, चरित्रवान और संस्कारवान बनने का पथ है। इसमें जितने निपुण होंगे औरों को दिशा देने में सक्षम होंगे। शिक्षा में ऐसा महत्वपूर्ण चमत्कार भी निहित है, एक यह कि इसे जितना बांटेंगे, उतना बढ़ता है। दूसरा जितना बढ़ेगा उतने श्रेष्ठ इंसान बनेंगे। सार यह कि शिक्षा अर्जन में कोई टाल-मटोल नहीं, जितना हो सके अपनी सामर्थ्य से अर्जित करते चलें।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       निःसंदेह शिक्षा से बड़ा कोई धन नहीं है दुनिया में। प्रागैतिहासिक काल में गुरुकुलों में शैशवकाल के समापन के साथ ही शिक्षारंभ हो जाती लेकिन समय बदला - - नियम बदले--परंपराएं बदलीं - - फिर इंसान को तो बदलना ही था और आज के जी वन से लेकर महाविद्यालय और पी एच डी तक शिक्षा सिर्फ अर्थोपार्जन का जरिया रह गई है। भेड़ियाधसानी चाल से दौड़ रहे माता-पिता मँहगी से मँहगी स्कूलों में बच्चों बच्चों को दाखिल करने के लिए दरदर भटक रहे हैं! कैसी शिक्षा कैसा ज्ञान जो पढे लिखे बेरोजगार युवाओं को सिर्फ पतन की राहों पर झोंक रहे हैं। आज माने या न माने  - - मेरा मानना है कि कि पैसों के पहियों पर दौडती शिक्षा देश की संस्कृति का उपहास कर रही है। लाॅर्ड मैकाले की आत्मा अट्टहास कर रही है और वशिष्ठ विश्वामित्र माथा ठोंक रहे हैं तात्पर्य यही कि शिक्षा युग की जरूरत है लेकिन युगानुरूप शिक्षा चुनें। अपने बच्चों को इंसान बनायें जो इंसाफ की डगर पर चल कर अपने देश के सच्चे नागरिक बनें।।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

     कहा गया है-"सरस्वती के भंडार की बड़ी अपूरव बात, ज्यों खर्चे त्यों त्यों बढ़े, बिन खर्चे घट जात" यह शिक्षा,ज्ञान वह धन है जो खर्च करने पर बढ़ता है यानि दूसरों को बॉंटने पर इसमें बढ़ोत्तरी होती है क्योंकि बार बार का अभ्यास,दक्ष बनाता है।जब शिक्षा, ज्ञान को साझा करते हैं वितरित करते हैं तो अभ्यास की आवृत्ति होती है और यह आवृत्ति उस शिक्षा ज्ञान को बढ़ाती ही है। इसके विपरीत न खर्चने यानि अभ्यास न करने, वितरण न करने से वह ज्ञान विस्मृत होने लगता है,घटने लगता है।यह भी सत्य है कि शिक्षा मनुष्य का निर्माण करती है।इस निर्माण में हम अकादमिक शिक्षा की कम , नैतिक और मानवीय मूल्यों की शिक्षा की बात अधिक कर रहे हैं। क्योंकि अकादमिक रुप से कथित उच्च शिक्षित अनेक लोगों को हमने विध्वंसक कार्यों में संलिप्त पाया है। यदि मानवीय जीवन मूल्यों का विकास नहीं होता तो वह शिक्षा व्यर्थ है। इस संदर्भ में शिक्षा से हमारा आशय मानवीय जीवन मूल्यों को संवर्धित करने वाली शिक्षा से ही है।

 - डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

 धामपुर - उत्तर प्रदेश

        सत्यवचन ... केवल शिक्षा ही वह  धन है , जो जितना बांटो , उतना बढ़ता है ! जैसे जैसे हम इसे बांटते हैं , इसका कोश बढ़ता जाता है ! हालातों और परिस्थितियों के चलते , कुछ लोग इस अमूल्य धन को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं , , व हमें इसका वितरण कर , सबसे बड़ा पुण्य कमा लेना  चाहिए ! शिक्षा ज्ञान बढ़ाती है , व  शिक्षा अच्छे संस्कार भी देती है ! शिक्षा से व्यक्ति सभ्य बनता है , व सुसंस्कृत ! शिक्षा व्यक्ति को एक अच्छा इंसान बनने मैं सहायक होती है !! 

- नंदिता बाली

सोलन -हिमाचल प्रदेश

      शिक्षा वह धन है जो बाँटने पर बढ़ता है और शिक्षा ही वह धन है जिस से इंसान बनता है। कहा भी गया है-

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।

पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।

इसका अर्थ है कि विद्या हमें विनय अर्थात् विनम्रता और सज्जनता देती है, विनम्रता से सही कर्म करने की योग्यता प्राप्त होती है। योग्यता से किए गए सही कर्म हमें सुख-समृद्धि और धन देते हैं।धन से सही आचरण करते हुए सुख और शांति प्राप्त होती है। तो शिक्षा यानी विद्या का लक्ष्य  विनम्र, योग्य और सदाचारी बनकर जीवन में सच्ची सुख-शांति प्राप्त करना है।  तो शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के के लिए बहुत महत्वपूर्ण है इसी लिए हर शिक्षित व्यक्ति को अपने संचित ज्ञान को अपने तक ही सीमित ना रखते हुए दूसरों को बाँटते रहना चाहिए ताकि दूसरे भी उसके ज्ञान से लाभान्वित हो, उनमें भी विनम्रता, योग्यता,धन, धर्म और सुख, शांति और समृद्धि पाने के अवसर प्राप्त करें। यदि हम अपने अर्जित ज्ञान को केवल अपने तक ही सीमित रखें और दूसरों को उसे ना बाँटे तो हमारा अर्जित ज्ञान हमारे साथ ही समाप्त हो जायेगा। इसलिए शिक्षा हर व्यक्ति को मिले, हर व्यक्ति अपने अर्जित ज्ञान को बाँटता रहे ताकि हर व्यक्ति एक अच्छा इंसान बनने में उससे लाभान्वित होता रहे।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

      इसमें कोई संदेह नहीं की शिक्षा वह धन है, जिसके बांटने से यह बढ़ता है। यदि न बांटा जाए तो, आदमी शिक्षित होते हुए भी अशिक्षित हो जाता है। जिस प्रकार ठहरे हुए जल में सड़न पैदा हो जाती है, यानी वह दूषित हो जाता है। इसी तरह यदि शिक्षा को न बांटा जाए तो, वह भी एक प्रकार से बिना प्रवाह के दूषित हो जाती है। जितनी खर्च की जाए यह उतनी ही अर्जित होती है। इस बात में तो कोई शंका ही नहीं है कि शिक्षा के बिना मनुष्य अधूरा रह जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य बिना शिक्षा के, अपने जीवन का सही उपयोग नहीं कर पाता। बिना शिक्षा के स्वयं की तथा देश की प्रगति सही ढंग से नहीं हो पाती। देश की उन्नति के लिए लोगों का शिक्षित होना बहुत ही अनिवार्य है। लेकिन जो शिक्षा लार्ड मैकाले नीति के अंतर्गत देश में परोसी जाती रही है वह शिक्षा तो गुलाम भारत से भले ही आजाद हुई हो लेकिन उसकी मानसिकता औपनिवेशिक है। उस शिक्षा से लोगों के भीतर की अंग्रेजियत नहीं गई है। यह केवल क्लर्क और सेवक ही बनाती है। इसके पक्षधर वही लोग रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के समय ऊंची ऊंची पदवियां उनके तलवे घिसकर प्राप्त की थीं। दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के बाद भी, देश की बागडोर ऐसे ही लोगों के हाथ रही है। यही कारण है कि लोग शिक्षित तो हुए हैं लेकिन एक उच्च स्तरीय सोच, एक शिक्षा नीति और राष्ट्रभाषा के माध्यम के अभाव से प्राप्त नहीं कर सके हैं।शिक्षा, एक राष्ट्रभाषा के माध्यम से होती है, जो देश के लोगों से अज्ञान और संकुचित मानसिकता का त्याग करवा के, देश को एकता और अखंडता के एक सूत्र में बांधने का काम करती है। शिक्षा का जॉब ओरिएंटेड होना बहुत जरूरी है। तभी वास्तविक अर्थो में भारत एक विकसित राष्ट्र बन सकता है। वर्तमान केंद्र सरकार इस दिशा में शिक्षा नीति में सुधार करके, इस और अग्रसर हो रही है। इसलिए कह सकते हैं कि सही अर्थों में शिक्षा ही मनुष्य को इंसान बनाती है। यही एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण करते हैं। अर्थात शिक्षा वह धन है जो बांटने से बढ़ता है और इंसान बनाता है।

 - डॉ. रवीन्द्र कुमार ठाकुर 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश

        शिक्षा वह धन है जो तिजोरी में नहीं, दिलों में रखा जाता है।यह ऐसा दीपक है, जो एक से दूसरे हाथ में जाते-जाते और सफ़ेद हो जाता है।शिक्षा सिर्फ बोलना नहीं, समझना भी सिखाती है, वो जीतना नहीं, सहना भी सिखाती है। यह इंसान के भीतर छिपे मनुष्य को जगाती है।अनपढ़ लोग मेहनत तो कर सकते हैं पर शिक्षा उसे दिशा देते है।यह घमंड नहीं, विनम्रता का संस्कार रचती है।जहाँ शिक्षा होती है, वहाँ अंधेरे टिक नहीं पाते।यह रोटी कमाने का साधन नहीं, सही रास्ता चुनने की ताकत है। सच्चाई यही है कि शिक्षा से इंसान बनता है और इंसान से समाज।

- सीमा रानी     

 पटना - बिहार 

      शिक्षा वह धन है जो बांटने से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है और यही असली धन है जिससे इंसान का व्यक्तित्व और समाज का निर्माण होता है; यह भौतिक संपत्ति से परे है क्योंकि यह ज्ञान, समझ और चरित्र प्रदान करती है, जिससे व्यक्ति आत्मनिर्भर और समाज के लिए उपयोगी बनता है. भौतिक धन बांटने से कम हो जाता है, लेकिन शिक्षा का ज्ञान बांटने से बढ़ता है क्योंकि जब आप किसी और को सिखाते हैं, तो आपका ज्ञान और स्पष्ट होता है और दूसरों को भी लाभ मिलता है. शिक्षा केवल जानकारी नहीं है; यह व्यक्ति को सोचने, समझने, नैतिक मूल्यों को अपनाने और सही-गलत का फैसला करने की क्षमता देती है, जिससे एक अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनता है. इसके साथ ही शिक्षा सर्वश्रेष्ठ संपत्ति है, इसे कोई चुरा नहीं सकता और यह जीवन भर साथ देती है, धन-वैभव से कहीं अधिक मूल्यवान है क्योंकि यह जीवन को दिशा और उद्देश्य देती है. शिक्षा आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण करती है, मानसिक विकास करती है और सामाजिक सुधार करती है. चंद शब्दों में कहा जाए तो "शिक्षा का महत्व अनिर्वचनीय है''.

- लीला तिवानी 

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

    शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह वह अमूल्य धन है जो मनुष्य के व्यक्तित्व, विचार और चरित्र का निर्माण करता है। धन, संपत्ति या भौतिक संसाधन बाँटने से घटते हैं, किंतु शिक्षा बाँटने से बढ़ती है। जब हम अपने ज्ञान, अनुभव और समझ को दूसरों के साथ साझा करते हैं, तो न केवल सामने वाला व्यक्ति समृद्ध होता है, बल्कि हमारा स्वयं का दृष्टिकोण भी और अधिक व्यापक हो जाता है। शिक्षा वह शक्ति है जो मनुष्य को सही और गलत में अंतर करना सिखाती है। यह व्यक्ति को आत्मनिर्भर, विवेकशील और संवेदनशील बनाती है। एक शिक्षित व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी उपयोगी बनता है। शिक्षा से ही मनुष्य में करुणा, सहिष्णुता, जिम्मेदारी और सामाजिक चेतना का विकास होता है—यही गुण उसे सच्चा “इंसान” बनाते हैं। जब शिक्षा समाज के हर वर्ग तक पहुँचती है, तब समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त होता है। अशिक्षा अंधकार है, जबकि शिक्षा प्रकाश है, जो व्यक्ति को रूढ़ियों, अज्ञान और भय से मुक्त करती है। यही कारण है कि शिक्षा को दान, सेवा और सहयोग का सर्वोच्च रूप माना गया है। अतः यह कहना पूर्णतः उचित है कि शिक्षा वह धन है जो बाँटने पर बढ़ता है और शिक्षा ही वह साधन है जिससे इंसान बनता है। एक शिक्षित समाज ही सशक्त, संस्कारित और प्रगतिशील राष्ट्र की नींव रख सकता है। इसलिए हमारा दायित्व है कि हम शिक्षा को केवल ग्रहण ही न करें, बल्कि उसे निरंतर साझा भी करें, ताकि मानवता का विकास निरंतर होता रहे।

-डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

       शिक्षा मानव की अनमोल धरोहर है। शिक्षा मानव किसी से भी ग्रहण कर सकता है।वहीं बाद में गुरू,शिक्षक के नाम से संबोधित होता है। शिक्षा बांटने पर बढ़ता है।गुरूवार हमें ज्ञान दान करते हैं, जिसे हम शिष्य के रूप में हासिल कर,अपना जीवन उज्जवल बनाते हैं।मानव कै सर्वांगीण विकास में शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शिक्षा रूपी धन बांटने से बढ़ता है घटता नहीं है। ज्ञान की परिधि बढ़ती जाती है। शिक्षित मानव अपने गुरू की महिमा का बखान करता है। इस में कंजूसी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।न ही भेदभाव बरतनी चाहिए।पारदर्शिता व समरसता भाव अपनाया जाना चाहिए। शिक्षा ग्रहण की कोई उम्र का बंधन नहीं होता। शिक्षा प्राप्त करने के द्वार हमेशा खुले रहते हैं। हमें निःसंकोच भाव से शिक्षा हासिल करनी चाहिएं । शिक्षा प्राप्त कर मानव के बौद्धिक, चारित्रिक,नैतिक व्यक्तित्व का विकास होता है।मानव एक श्रेष्ठ इंसान बनता है। सृष्टि में जन्म लेता है बढ़ता है तो परिवार उसकी प्रथम पाठशाला होती है।उसी से वह शिक्षा प्राप्त करता है। संस्कार व शिष्टाचार ग्रहण करता है। शिक्षा वह धन है,जिस से इंसान अपना जीवन सुधारता संवारता है। बौद्धिक गुणों केबल पर अपना चारित्रिक विकास करता है। मानवीय मूल्यों को सहेजने की क्षमता आती है। शिक्षा रूपी धन को कोई चुरा नहीं सकता।न ही कोई हिस्सा मांग सकता है। शिक्षा अनमोल धन है जिसे जितना खर्च कीजिए उतना ही बढ़ता है।मानव एक अच्छा इंसान बनता है नये आयाम सृजित करता है। आदर्श गुणों का समावेश होता है। समाज में मान-सम्मान मिलता है।नवल कीर्तिमान स्थापित करता है।पद- प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।यश मिलता है। समाज में भूरी- भूरी प्रशंसा होती है।वह कोहिनूर बन जाता है। शिक्षित मानव सदैव आदरणीय, सम्माननीय बन जाता है।

- डॉ. माधुरी त्रिपाठी 

रायगढ़ - छत्तीसगढ़

     शिक्षा वह अमूल्य धन है जो बांटने पर बढ़ता है और केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि विचारों, संवेदनाओं और अनुभवों का अनमोल भंडार है। यह दीपक है जो अज्ञान के अंधकार को चीरता है और जितना साझा किया जाए, उतना गहरा और प्रभावशाली होता है। शिक्षा मनुष्य को केवल ज्ञानी नहीं बनाती, बल्कि उसे मानवता, नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की राह दिखाती है। यह ज्ञान की गहराई, चरित्र की सुदृढ़ता और आत्म-निर्भरता की शक्ति प्रदान करती है। जो इसे ग्रहण करता है, वह स्वयं में परिवर्तन लाता है, समाज में प्रकाश फैलाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्तंभ बनता है। शिक्षा का असली सार यही है कि यह न केवल स्वयं को उज्जवल बनाती है, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रकाशित करती है, और इसी कारण यह वह अमूल्य निधि है, जो मनुष्य को सच्चा मानव बनाती है।वास्तव में, शिक्षा का प्रभाव सीमित नहीं होता; यह व्यक्ति के भीतर सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता को सशक्त बनाती है। यह हमारी संवेदनाओं को विकसित करती है, हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध कराती है, और हमें समाज में न्याय, समानता और सहानुभूति के मूल्यों के प्रति सजग बनाती है। जो शिक्षा को अपनाता है, वह मात्र अपनी सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए भी कार्य करता है। शिक्षा से सुसज्जित मनुष्य न केवल कठिनाइयों का सामना साहस और धैर्य से करता है, बल्कि दूसरों को भी मार्गदर्शन देने में समर्थ होता है। इस प्रकार शिक्षा एक ऐसी शक्ति है, जो अज्ञान, भ्रांति और असमानता के अंधकार को दूर कर, मानवता के प्रकाश से समाज को आलोकित करती है। यही कारण है कि शिक्षा केवल एक व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक प्रगति, नैतिक उन्नति और सच्ची मानवता की आधारशिला है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर

     यह 100% सच है की मां सरस्वती की शिक्षा का भंडार ऐसा है जो प्रथमतः ग्रहण करके दूसरों को भी ग्रहण कराता है तब इससे शिक्षित होकर मनुष्य इस अमूल्य संपदा को जब बांटने लगता है तो इससे सबसे पहले तो कोई इसे छीन नहीं सकता बल्कि हमारे साथ यह शिक्षा रूपी ज्ञान धन की उत्तरोत्तर वृद्धि ही करता है।इससे व्यक्ति का आत्मनिर्भरता के साथ व्यक्तिगत सामाजिक राष्ट्रीय तथा सामाजिक प्रगति में भरपूर योगदान होता है ।व्यक्ति सशक्त होकर  बेरोजगारी दूर करता है ।सबको आर्थिक समृद्धि के साथ सफल जीवन जीने का वास्तविक धन प्राप्त होता है। 

- डाॅ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

    शिक्षा ही ऐसा दीया है जो अज्ञानरूपी अंधेरे को  हटा कर हमारे जीवन में रौशनी करताहै। जिससे हमें अच्छे और बुरे का ज्ञान होता है शिक्षा प्राप्त करके ही हम सभ्य इंसान बन सकते हैं शिक्षा ही ऐसा धन है जिसे जितना खर्च करो उतना ही बढ़ता है और धन जितना खर्च करो वह खत्म हो जाता है परंतु शिक्षा ज्यौ ज्यौ खर्च होती है त्यौ त्यौ बढ़ती है

बांटो तो बढ़े, छुपाओ तो बुझे —

शिक्षा ही ऐसा अनमोल रत्न

जो पत्थर को भी सोना कर दे। 

विद्या विनयम् ददाति

शिक्षा वह धन है जो बांटने पर बढ़ता है।

तुम किसी को पढ़ाओ → तुम्हारा ज्ञान गहरा होता है- तुम किसी को समझाओ → तुम्हारी समझ बढ़ती है।

तुम किसी को इंसान बनाओ → तुम्हारा दिल बड़ा हो जाता है 

 मनुष्य = जीव + शिक्षा

बिना शिक्षा के — जीव ही है, मनुष्य नहीं बल्कि पशु के समान है

संस्कृत में श्लोक 

येषां न विद्या  तपो न दानम् ,

ज्ञानम् न शीलम् गुणो न धर्म:

  ते मृत्यु लोके भूमिभारभूता:

   मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति। 

- रंजना हरित 

बिजनौर - उत्तर प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में "  शिक्षा से ही इंसान बनता है। वैसे तो जन्म से इंसान जानवर होता है। शिक्षा का ज्ञान ही रोजगार पैदा करता है। रोजगार से जीवन चलता है। रोजगार के बिना जीवन की कल्पना करना असम्भव है। जिससे जीवन कहना उचित नहीं है। अतः जीवन के लिए शिक्षा जरूरी है।

             - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)

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