हमारी क्षमताएं यानि योग्यता और ज्ञान यानि अनुभव हमारे कार्यों यानि कर्म से बनते हैं और हमारे ये कर्म ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, जो भाग्य से भी बढ़कर है. वास्तव में कर्म ही भाग्य बनाता है और व्यक्ति को सफल बनाता है, जिससे व्यक्ति का चरित्र यानि व्यक्तित्व बनता है. योग्यता और अनुभव से ही कर्म होते हैं, लेकिन आवश्यक नहीं है कि अच्छे कर्म से भाग्य भी अच्छा बने. भाग्य पिछले जन्मों के कर्मों का लेखा-जोखा भी होता है. फिर भी अच्छे कर्म करने वालों का भाग्य जैसा भी हो, व्यक्तित्व सराहनीय होता है. इसलिए कहा गया है कि -
योग्यता और अनुभव का सागर है कर्म
कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
जिंदगी मेें सफल होना है और सुख-सुकून की जिंदगी जीना है तो जिंदगी जीने का कौशल भी आना ही चाहिए और यह कौशल आता है योग्यता से, सामर्थ्य से। जिसके लिए ज्ञानवान होना आवश्यक है। यह हासिल होता है शिक्षा से, वह भी क्रमश:, सीढ़ी दर सीढ़ी। जिसे लांघना नहीं है । धैर्य और ध्यान से शिक्षा प्राप्त करते रहना है। इसी अवधि में अनुभव भी मिलता है, जो कसौटी बनकर परिपक्व बनने में सहायक होता है। यही परिपक्वता सामर्थ्यवान बनाती है और कर्म निर्धारित करती है। यानी योग्यता और अनुभव का सागर है कर्म। इसमें एक बात और मायने रखती है वह है योग्यता का सही यानी उचित उपयोग। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी कारणवश योग्यता का अनुचित उपयोग कर लिया जाता है। इसी उचित और अनुचित से बनता है भाग्य और उसका रूप। उचित से सौभाग्य और अनुचित से दुर्भाग्य। इस तरह योग्यता और कर्म से चरित्र का निर्माण होता है जो व्यक्तित्व में भी झलकता है। अत: कहा जा सकता है कि कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
योग्यता (कौशल) और अनुभव वास्तव में कर्म का आधार बनाते हैं। कर्म कोई संयोग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास है जो इन दोनों से पोषित होता है। जैसे समुद्र की गहराई में अनगिनत धाराएँ मिलती हैं, वैसे ही योग्यता (प्रतिभा) और अनुभव (सीख) मिलकर कर्म को विशाल बनाते हैं। बिना योग्यता के कर्म अधूरा रहता है, और बिना अनुभव के वह दिशाहीन। मेरी राय में, यह सही है—कर्म व्यक्तिगत विकास का सागर है, जहाँ हर लहर एक कौशल या अनुभव जोड़ती है।
कर्म और भाग्य का सागर: व्यक्तित्व
यहाँ कर्म और भाग्य का संगम व्यक्तित्व को परिभाषित करता है। कर्म हमारी पसंद है, भाग्य अप्रत्याशित—दोनों मिलकर चरित्र की गहराई रचते हैं। उदाहरणस्वरूप, एक सैनिक का व्यक्तित्व उसके कर्म (शौर्य, अनुशासन) और भाग्य (युद्ध के अवसर) से बनता है। मैं सहमत हूँ कि व्यक्तित्व कोई स्थिर द्वीप नहीं, बल्कि कर्म-भाग्य का उफनता सागर है, जो चुनौतियों से मजबूत होता है। कुल मिलाकर, यह कथन जीवन की सच्चाई को समुद्र के रूपक से खूबसूरती से बयान करता है। कर्म नियंत्रण में है, भाग्य रहस्य पर दोनों ही व्यक्तित्व को निखारते हैं। यह प्रेरणा देता है कि योग्यता-अनुभव से कर्म करें, भाग्य को स्वीकारें।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
हम जो भी कार्य करते हैं उनसे हमें सीख मिलती है और वोही सीख हमें उन कार्यों में कुशल बनाती है तथा हमें अनुभव मिलता है यही अनुभव हमें जीवन के गहरे सत्य सिखाते हैं जिनसे हम अपने कर्मों को संभारते हैं तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं की योग्यता और अनुभव का सागर है कर्म ,कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व, मेरा मानना है की कर्मों की कोई सीमा नहीं होती और उनसे प्राप्त योग्यता व अनुभव ही जीवन को समृद्ध बनाते हैं क्योंकि हमारे कर्म हमें असीमित गहराई तक ले जाते हैं क्योंकि योग्यता और अनुभव का सागर ही कर्म होते हैं तभी को कर्म से योग्यता आती है, और कर्म हमें सीख देते हैं जिनसे हमारे कार्य कुशल होते हैं देखा जाए अभ्यास ही व्यक्ति को योग्यता देता है, नहीं तो हम जन्म से तो शुन्य होते हैं बल्कि अपने कर्मों से अपनी बुद्धि और योग्यता का विकास करते हैं,अगर व्यक्तित्व की बात करें तो व्यक्तित्व वास्तव में कर्म और भाग्य का ही सागर है क्योंकि हमारे पुराने कर्म मिलकर ही हमारा भाग्य बनाते हैं और हमारे आज के कर्म हमारे भविष्य की नींव रखते हैं जिनमें प्रयास का पलड़ा भारी होता है क्योंकि हमारे अच्छे कर्म ही भाग्य को श्रेष्ठ बनाते हैं देखा जाए व्यक्तित्व केवल किस्मत से ही नहीं बनता बल्कि व्यक्ति के निर्णय,मेहनत और प्रयास ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारते हैं अन्त में यही कहुंगा की जीवन में कर्म और भाग्य दोनों का महत्व है लेकिन कर्म की शक्ति कहीं अधिक आंकी जाती है हमें भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए बल्कि वर्तमान में अच्छे कर्म करने चाहिए क्योंकि निस्वार्थ भाव से किए गए कर्म ही सच्चे अर्थों में व्यक्तित्व का विकास करते हैं,इसलिए योग्यता और अनुभव का सागर कर्म कहलाता है तथा कर्म और भाग्य का सागर व्यक्तित्व ।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व।पूरी तरह से सत्य है।आपके व्यक्तित्व की झलक हर जगह मिल ही जाती है।एक निखरते व्यक्तित्व की आभा व्यक्ति के मुख मंडल पर दिखती है , उसके व्यवहार में दिखती है और मनुष्य का सुंदर कर्म ही उसका भाग्य भी लिख देता है।यदि जीवन मिला है तो कर्म भी करना ही है, मनुष्य अपने प्रतिभा और योग्यता के आधार पर अपने कर्म को आकार देता है,और अनुभव एकत्रित करता है।उसके कर्मों के आधार पर ही उसे यश और अपयश मिलता है। कुछ शब्दों में, मनुष्य का व्यक्तित्व इतना आकर्षक और सुंदर हो कि उसकी आभा चारों दिशाओं में फैले। सुंदर कर्म सुंदर भाग्य लिखता है और मनुष्य के अपने ज्ञान का पुष्टीकरण उसके कर्म से ही है।
आना-जाना ज़िंदगी,सच्चा मानव धर्म।
धरती पर छूटे सभी,साथ चलेगा कर्म।।
साथ चलेगा कर्म,सदा यह भाग्यविधाता।
व्यर्थ नहीं यह देह,कर्म कर कहते दाता।।
सुंदर जब व्यक्तित्व, कर्म- योद्धा बन छाना।
प्रतिभा का संकेत,कर्म से ही है आना।।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
योग्यता और कर्म का सागर है अनुभव, कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व। आज की चर्चा- परिचर्चा के विषय में, मैं तो कहूंगा कि योग्यता और कर्म का सागर है। अनुभव का सागर है कर्म और इन सब के संगम से व्यक्तित्व और कृतित्व का सागर बनता है। वास्तव में योग्यता तो परिश्रम से मनुष्य प्राप्त कर लेता है और उसके आधार पर कर्म की ओर अग्रसर हो जाता है। लेकिन जब तक भाग्य का सहारा ना हो तब तक आशातीत सफलता प्राप्त नहीं होती और व्यक्तित्व निर्माण का पत्र जो है वह अधूरा रह जाता है लेकिन सभी जगह यह सिद्धांत लागू नहीं होता, जहाँ कर्म प्रधान है। वहाँ भाग्य उदित होना निश्चित है। इससे एक सफल सार्थक व्यक्तित्व का निर्माण हो जाता है। यह व्यक्तित्व ही समाज और देश के लिए अपरिहार्य होता है। इसलिए योग्यता और कर्म के पथ पर चलते हुए अनुभव का निर्माण के सागर का होता है। इसी निर्माण को भाग्य का सहारा मिल जाए तो एक सफल सार्थक व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
- डॉ. रवीन्द्र कुमार ठाकुर
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
“योग्यता और अनुभव का सागर है कर्म”—यह कथन संकेत करता है कि कर्म केवल क्रिया नहीं, बल्कि हमारी अर्जित क्षमताओं और जीवन-यात्रा के अनुभवों का समेकित रूप है। मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह उसके ज्ञान, अभ्यास, संस्कार और अनुभवों की परतों से होकर ही बाहर आता है। निरंतर किया गया कर्म योग्यता को धार देता है और अनुभव उसे परिपक्वता प्रदान करता है। इसीलिए कर्म जितना सचेत और सतत होता है, उतना ही वह व्यक्ति को सशक्त बनाता है।“कर्म और भाग्य का सागर है व्यक्तित्व”—व्यक्तित्व किसी एक दिन में नहीं बनता। यह हमारे कर्मों की दिशा और भाग्य से मिली परिस्थितियों के बीच संतुलन का परिणाम है। भाग्य हमें अवसर और चुनौतियाँ देता है, पर उन पर हमारी प्रतिक्रिया—हमारा कर्म—व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान गढ़ता है। कठिन परिस्थितियों में किया गया सही कर्म व्यक्तित्व को उज्ज्वल बनाता है, जबकि सुविधा में किया गया अकर्म उसे खोखला कर सकता है। इस परिचर्चा का सार यह है कि कर्म, भाग्य का विरोधी नहीं, उसका सहयात्री है। भाग्य मंच देता है, पर अभिनय कर्म करता है। योग्यता और अनुभव कर्म को दिशा देते हैं, और कर्म व भाग्य मिलकर व्यक्तित्व की नींव रखते हैं। अतः यदि व्यक्तित्व को ऊँचाइयों तक ले जाना है, तो कर्म को सतत, सजग और मूल्यनिष्ठ बनाना ही होगा।
संक्षेप में—
योग्यता + अनुभव → कर्म
कर्म + भाग्य → व्यक्तित्व
यही जीवन की गतिशील और सार्थक यात्रा है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
कर्म केवल किया गया काम नहीं होता, वह हमारी योग्यता और अनुभव का सागर होता है। जो कुछ हम सीखते हैं और निर्णय लेते हैं सब मिलकर कर्म का रूप लेते हैं। बिना अनुभव के योग्यता अधूरी रहती है और बिना कर्म के अनुभव व्यर्थ हो जाता है। कर्म ही वह दर्पण है जिसमें हमारी मेहनत, धैर्य और समझ एक साथ दिखाई देती है।इसी तरह व्यक्तित्व केवल चेहरे या बोलचाल से नहीं बनता। कर्म और भाग्य मिलकर व्यक्तित्व का सागर रचते हैं। कर्म हमें दिशा देता है और भाग्य हमें अवसर। कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी संयम रखता है, तो उसका कारण उसका कर्म होता है। लेकिन सच यह है कि भाग्य भी अक्सर कर्म के द्वार से होकर ही आता है।इसलिए जो व्यक्ति अपने कर्म को ईमानदारी से साध लेता है, उसका व्यक्तित्व अपने आप निखरने लगता है। वह भीड़ में अलग इसलिए दिखता है क्योंकि उसके कर्मों में योग्यता और अनुभव की गहराई होती है। यही गहराई व्यक्ति को साधारण से असाधारण बना देती है।
- सीमा रानी पटना - बिहार
योग्यता और अनुभव का सागर है !कर्म योग्यता पाकर अनुभव के साथ कर्म की ओर बढ़ताहैं ! विश्व कल्याण में मातृशक्ति को देवी का दर्जा दिया गया है। समाज के हर क्षेत्र में अपने अनुभव अपनी योग्यता के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है,! गार्गी से भारती , लक्ष्मी बाई वह किसी से भी कम नहीं हैं।पुत्र भगीरथ की तपस्या , हिमालय से गंगा को नीचे उतारने सागर से नादियों के मिलने का सौभाग्य योग्यता से मिला ! यही कर्म का भाव ब्रह्मा विष्णु महेश इंसानियत पैदा कर कर्म का भाव प्रत्येक प्राणीयों में होते है !जो समय के अनुकूल अपना भाग्य सागर से जल भर लोगों की प्यास बुझाते है ! ये नही कहते हम प्यास बुझाते है ! प्यास बुझाने पास तो आना ही पड़ता हैं! यही कर्म ही जल दान कर सही गलत को परिभाषित करता है ! व्यक्तित्व ही कर्म और भाग्य का सागर है कर्म ही मनुष्य के भाग्य को सुधारता है ! जिसका कर्म लेखा जोखा परीक्षित के पास होता यमराज तो कर्म करता है! अच्छा या बुरा उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है जिसका भाग्य वह स्वयं लिखता है!और भाग्य का सागर है !व्यक्तित्व से नाम चारों वेद रामायण महाभारत आदि काल से सम्मानित रचनाकारों को पहचान मिलती है !
- अनिता शरद झा
रायपुर - झारखंड
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