- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
जो लोग भगवान के साकार रूप को नहीं मानते , वो भी यह टो मानते हैं कि संसार का सृजन करनेवाली , समस्त घटनाक्रम को नियंत्रित करनेवाली , कोई अदृश्य शक्ति है !! एक ऐसी दिव्य शक्ति , जो हर व्यक्ति के कर्मों को देखती है , व अपने तराजू में तोलती है अच्छे व बुरे कर्म ! कर्मों के अनुसार फल भी प्रदान करती है ....अच्छे का फल अच्छा व बुरे का बुरा !! अब मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह इसे शक्ति का नाम देता है या प्रभु का !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
यदि प्रभु शक्ति की तरफ ध्यान केंद्रित करें तो ईश्वर को परम सर्वशक्तिमान माना गया है जो हम सभी के लिए सच्ची शक्ति और आश्रय है क्योंकि प्रभु ही कठिन समय में हमें हमारी बाधाओं को पार करने की प्रेरणा देता है कहने का भाव प्रभु का आनंद ही हमारी शक्ति है, यदि प्रभु साथ है तो जीवन में हर चीज, शांति, सफलता धन , दौलत, सुख इत्यादि को पाना संभव है इसका मतलब आत्मशक्ति से अधिक ईश्वर पर पूर्ण विश्वास ही हमें दृढ़ और निर्भीक बनाता है तो आईये आज इसी चर्चा का प्रचार करते हैं कि शक्ति है तो प्रभु भी है, प्रभु है तो सब कुछ है, मेरा मानना है ईश्वर ही असीम शक्ति का परम स्रोत है और जब हम भगवान पर विश्वास करते हैं तो हमें कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीने, लडने और सब कुछ पाने की आंतरिक शक्ति ईश्वर ही प्रदान करते हैं उनके बगैर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, प्रभु ही एकमात्र सत्य है और उसी के हाथ में सब कुछ है, हमारे सुख, दुख का सहारा वोही है, ईश्वर की आस्था से ही मानसिक शांति, शक्ति और हर चुनौती का सामना किया जा सकता है इसलिए प्रभु है तो सब कुछ मुमकिन है रही बात शक्ति की तो प्रभु का आनंद और कृपा ही मनुष्य की महान शक्ति है और यह मत भूलें कि भगवान हर रूप में हमारे आसपास ही होते हैं और उनसे कोई भी चीज़ भूली नहीं है वो तो हमारे पल, पल के कर्म को देख रहा है, चाहे निस्वार्थ प्रेम हो, समर्पण की बात हो या आस्था की बात हो वो तो हर जगह विराजमान हैं, उन्होंने तो भरी सभा में द्रौपदी की लाज रखी थी, भगत प्रहलाद की रक्षा की थी, अर्जुन का सारथी बनकर उनका मार्गदर्शन कर लाज रखी थी कहने का भाव वश में होते आए हैं, भगवान भक्तों के सिर्फ हमें भगवान पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए और हम में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि हम उनके दिए हुए हर कर्म को भली भाँति कर सकें और हर नेक कार्य को करते समय भगवान को अर्पण करते रहें कि तेरा ही सब कुछ है तभी हमारी शक्ति, भक्ति बन सकती है अगर इंसान अपनी सही शक्ति को पहचान कर भगवान को हाजिर रख कर हर कार्य को सही ढंग से निभाने में कामयाब हो जाए तो तो वो यही समझेगा कि प्रभु है तो सब कुछ है और हमारी शक्ति में प्रभु जी का वाश है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
मनुष्य के जीवन में आस्था और शक्ति का संबंध अत्यंत गहरा, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण है। प्रस्तुत पंक्तियाँ—
“शक्ति है तो प्रभु भी हैं, प्रभु हैं तो सब कुछ है”—
इसी अंतर्संबंध को सरल शब्दों में, किंतु गहन दर्शन के साथ अभिव्यक्त करती हैं। “शक्ति है तो प्रभु भी हैं”— यह कथन संकेत करता है कि ईश्वर की अनुभूति किसी बाहरी खोज का परिणाम नहीं, बल्कि अंतःकरण में निहित शक्ति का प्रस्फुटन है। यहाँ शक्ति का अभिप्राय केवल शारीरिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता, आत्मिक चेतना, नैतिक बल और वैचारिक स्पष्टता से है। जब मनुष्य भीतर से सशक्त होता है, तभी वह प्रभु की उपस्थिति को जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में अनुभव कर पाता है। निर्बल मन शंका और भय में उलझा रहता है, जबकि सशक्त मन हर क्षण ईश्वर का सान्निध्य पहचान लेता है। दूसरी ओर, “प्रभु हैं तो सब कुछ है”— यह पंक्ति पूर्ण विश्वास और समर्पण का भाव प्रकट करती है। ईश्वर में आस्था होने पर जीवन के अभाव, संकट और असुरक्षाएँ अपना प्रभाव खो देती हैं। प्रभु का विश्वास मनुष्य को आश्वस्त करता है कि जीवन की प्रत्येक घटना का कोई न कोई अर्थ अवश्य है। इसी विश्वास से जीवन को दिशा, उद्देश्य और संतुलन प्राप्त होता है। तब सुख और दुःख, लाभ और हानि—सब समान भाव से स्वीकार्य हो जाते हैं। समग्र रूप से ये पंक्तियाँ यह प्रतिपादित करती हैं कि शक्ति और प्रभु परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक तत्व हैं। शक्ति से प्रभु की अनुभूति संभव होती है और प्रभु में विश्वास से जीवन में सर्वसमर्थता का भाव जाग्रत होता है। यही संतुलन मनुष्य को भीतर से समृद्ध, स्थिर और अडिग बनाता है। इस प्रकार, ये पंक्तियाँ केवल आस्था की घोषणा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का सार हैं—जो मनुष्य को आत्मबल, विश्वास और चेतना के मार्ग पर अग्रसर करती हैं।
- रंजना वर्मा उन्मुक्त
रांची - झारखंड
जीवन धन्य जो शक्ति के आधार पर ही अपना जीवन यापन करते हुए चला जाता है, फिर विभिन्न क्षेत्रों में सफलता अर्जित करता चला जाता है। शक्ति है तो प्रभु भी है, प्रभु है तो सब कुछ है। यह सत्य का परिदृश्य है। मन के विचार है, शक्ति से ही संरचना हुई है। जब हार कर ही प्रभु के चरणों में जाते है। जब सब काम पूर्ण हो जाते है, तो प्रभु पर विश्वास हो ही जाता है। यह देश संस्कृति, संस्कार,सभ्यता विभिन्न धर्मता को लेकर चलता है, एकता और अखण्डता का परिचयात्मक है......
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
होई है वही जो राम रचि राखा
को करि तरक बढावैं साखा
प्रभु श्रीराम और कोटि-कोटि देवता हैं आपके साथ - - - तो मानस शक्ति और लौकिक पारलौकिक शक्तियाँ आपके लिये सब कुछ उपलब्ध होती हैं। प्रभु का ध्यान आप पर है तो आपकी मानस शक्तियाँ आपपर प्रसन्न होती हैं और प्रभु आपके साथ हैं तो सब-कुछ आपके लिये सहज हैं - - - सरल हैं। सत्य है कि प्रभु सदैव शक्ति की उपासना से प्रसन होते है - - - प्रभु है तो बड़ी से बड़ी कठिनाईयां भी रास्ता बदल लेती हैं। शक्ति का तात्पर्य सिर्फ शारीरिक ताकत से नहीं होता है बल्कि शक्ति के अनेकानेक स्वरूप होते हैं। शक्ति - - ज्ञान की - - धन की - - व्यवहार की सब एक से बढ़कर एक होती हैं। प्रभु की दृष्टि आप पर सकारात्मक है तो जीवन का सफर आसान है। इसलिये ध्येय रखें सदैव जीवन का - - प्रभु की आज्ञा है तो आत्मोत्सर्ग ही रास्ते बनाता है। अतः सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्न शक्ति की उपासना करें ।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
शक्ति है तो प्रभु भी है। बिना शक्ति के भला कौन किसका प्रभुत्व स्वीकारता है। लौकिक संसार में तन,मन,धन की शक्ति और अलौकिक संसार में चमत्कारिक शक्ति ही प्रभुत्व दिलाती है। शक्ति के बल पर ही देवता, दानवों को परास्त कर पाते हैं। जब प्रभु होते हैं तो सब कुछ होता है। सब सुख होते हैं और इन सुखों से सब ही लाभान्वित होते हैं। प्रभु की कृपा सब पर बराबर होती है कौन कितना ले पाता है यह उसके कर्म और भाग्य पर निर्भर रहता है। प्रभु ने तो प्रकृति में सब कुछ उपलब्ध कराया है। इस प्रकृति के कण कण में प्रभु की शक्ति दिखाई देती है।उसी से हमें भी शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए हमेशा प्रभु का स्मरण रहना चाहिए।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
भगवान के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता इस बात को हम हर पल महसूस करते हैं । हमारे कहने से पेड़ का एक नन्हा सा पत्ता भी नहीं हिलता । प्रभु (आत्मा / शक्ति) के बगैर हमारे शरीर का कोई अस्तित्व नहीं है । शक्ति और भगवान एक दूसरे के पूरक हैं क्योंकि मानव में जो शक्ति है (बल / भगवान / आत्मा) उसे वह अपनी इच्छा से अलग नहीं कर सकता वैसे ही भगवान को उसकी शक्ति से अलग नहीं किया जा सकता । आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो यह शक्ति ईश्वर का ही रूप है । दार्शनिक सोच की बात करें तो शक्ति को भगवान का रूप माना जाता है । सुख में सुमिरन तो बहुत कम लोग करते हैं मगर दुख में तो सभी प्रभु के शरण में ही जाते हैं । यहाँ तक कि धरती पर भगवान के रूप में डॉक्टर भी अंत में जीवन बचाने के लिए प्रभु से प्रार्थना करने को ही कहते हैं । आत्मा का शरीर से निकल जाना, शक्तिरुपी प्रभु का निकल जाना ही है, क्योंकि शौर्य तलवार में नहीं, भीतर की शक्ति में होता है, अतः शक्ति है तो प्रभु भी है प्रभु है तो सब कुछ है ।
- बसन्ती पंवार
जोधपुर - राजस्थान
नास्तिक हों या आस्तिक यह सत्य तो स्वीकार योग्य है ही कि किसी न किसी ने इस सृष्टि का निर्माण तो किया ही है, कोई न कोई तो है जो इस सृष्टि का संचालन कर रहा है। वर्ना प्रकृति के ये विविध और अनोखे रूप-रंग का नजारा, विभिन्न किस्म की वनस्पति, जलचर,थलचर और नभचर ,उभयचरों का होना और न केवल होना बल्कि निरंतर उनका जन्म और मृत्यु का क्रम सब अचंभित करने वाला और अलौकिक तो है। इसे शक्ति माने या प्रभु । एक ही बात है ,एक ही भाव है। इसे आज के आज के अविष्कारों में कंप्यूटर और मोबाइल के उदाहरण से समझा सकता है। इन उपकरणों में कितने किस्म के फंक्शन हैं। हमारे हाथ में लिये मोबाइल से हम पल भर में कितनी सुविधा ले सकते है। जबकि उसका कोई प्रत्यक्ष में कहीं कनेक्शन नहीं। इसे शक्ति माने तो इसका निर्माण करने वाला भी है न। ठीक ऐसे ही हम सृष्टि को शक्ति माने तो उसके निर्माण करने वाला भी होगा ही। अत: सार में यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है, कोई अनुचित नहीं है कि शक्ति है तो प्रभु भी है।प्रभु है तो सब कुछ है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
इस पंक्ति का भाव है कि शक्ति केवल शारीरिक या भौतिक नहीं होती, बल्कि आत्मिक और विश्वास की शक्ति भी होती है। जब इंसान के भीतर विश्वास, साहस और संकल्प की शक्ति होती है, तो उसे ईश्वर की अनुभूति होती है। और जब ईश्वर पर विश्वास हो, तो जीवन में आशा, मार्गदर्शन, धैर्य और सुरक्षा का भाव स्वतः आ जाता है यानी सब कुछ मिल जाता है। यह कथन मनुष्य को आत्मबल और ईश्वर-विश्वास दोनों की महत्ता समझाता है।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
शक्ति के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं है और मानव सर्वथा शक्ति-हीन है. मनुष्य में तो सांस लेने तक की शक्ति नहीं है. शक्ति प्रभु की देन है. अतः मनुष्य में शक्ति होने का अर्थ है प्रभु का होना, भले ही वह दिखे-न-दिखे. प्रभु ही सब कुछ बनाने-उपजाने वाला है, प्रभु ही सबको सब कुछ देने वाला है. इसलिए प्रभु है तो सब कुछ है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
उक्त कथन “शक्ति है तो प्रभु भी है, प्रभु है तो सब कुछ है” मात्र शब्द नहीं हैं, बल्कि जीवन और समाज के वास्तविक अनुभवों का प्रतिबिंब है। इस पर मेरी राय इस प्रकार प्रस्तुत है कि शक्ति का स्वरूप केवल भौतिक या बाहरी नहीं होता बल्कि आध्यात्मिक, मानसिक और नैतिक भी होता है। जब व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है, तभी वह प्रभु या ईश्वर के अस्तित्व को अनुभव कर पाता है। यह शक्ति व्यक्ति को अपने कर्तव्य, अधिकार और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने में सक्षम बनाती है। प्रभु का अनुभव अर्थात अस्तित्व तभी वास्तविक लगता है जब व्यक्ति शक्ति के माध्यम से कर्म और धर्म का पालन करता है। जब वह अपने जीवन में साहस, संयम, और न्याय का पालन करता है, तो प्रभु की उपस्थिति स्वतः अनुभूत होती है। यह अनुभव आशा, संतोष और आत्मविश्वास देता है। उल्लेखनीय है कि जीवन, मृत्यु, न्याय, करुणा और सृष्टि का नियम ही शक्ति और प्रभु के साथ संतुलन बनाता है, तब मानव जीवन की संपूर्णता, उद्देश्य और दिशा को समझ पाते हैं। यह ज्ञान सबको किसी भी संकट या चुनौतियों में स्थिर और सकारात्मक बनाए रखता है। इसलिए यह सकारात्मक कथन हमें यह भी प्रेरित करता है कि शक्ति का दुरुपयोग न करें, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की भलाई में लगाएँ। प्रभु की अनुभूति और आस्था तब सार्थक होती है जब शक्ति का प्रयोग न्याय, करुणा और मानवता के लिए किया जाए। अन्ततः संक्षेप में कहूँ तो, यह संदेश हमें आत्मशक्ति, ईश्वर-भक्ति और जीवन में सकारात्मक योगदान की याद दिलाता है। जब शक्ति प्रभु के साथ संतुलित होगी, तब जीवन, समाज और राष्ट्र में वास्तविक सामर्थ्य और सामंजस्य स्थापित होगा।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
यह कथन भारतीय दर्शन की उस गहरी अनुभूति को प्रकट करता है जहाँ शक्ति और प्रभु अलग नहीं, पूरक हैं। शक्ति बिना प्रभु दिशा-हीन है और प्रभु बिना शक्ति निष्क्रिय। जब व्यक्ति के भीतर शक्ति (विश्वास, साहस, कर्मबल) जागृत होती है, तभी उसे प्रभु का अनुभव होता है। और जब प्रभु पर आस्था होती है, तो जीवन की हर परिस्थिति में “सब कुछ है” का भाव जन्म लेता है—
आशा, धैर्य और समाधान।
जीवन व्यवहार में
यह कथन हमें सिखाता है कि
कर्म ही शक्ति है
आस्था ही प्रभु है
और दोनों के समन्वय से ही जीवन पूर्ण बनता है
केवल शक्ति पर अहंकार विनाश लाता है,
केवल प्रभु पर निर्भरता अकर्मण्यता।
दोनों का संतुलन ही समृद्धि है।
शक्ति है तो प्रभु भी हैं” — यह आत्मबल की स्वीकारोक्ति है।
“प्रभु हैं तो सब कुछ है” — यह पूर्ण समर्पण की अवस्था है।
इसी संतुलन में जीवन, साधना और समाज की सार्थकता निहित है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
जी हाँ शक्ति ही है जो ईश्वर के रूप में सबमे विद्यमान रहती है ,अर्थात ईश्वर सर्वत्र है ।हम सब एक मात्र परमात्मा का ही अंश हैं, इसमें कोई दो राय नहीं । वह सत्य स्वरूप परमात्मा एक है, जिसे हम सभी अलग-अलग नामों से पुकारते हैं ।धरती ,जल, वायु ,आकाश हर जगह उसकी ही सत्ता है ।उसकी मर्जी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिलता ।वह कण-कण में विद्यमान है। हमारे भीतर भी हमारे बाहर भी । हर पल हमारे साथ है वह । आदि शंकराचार्य ने भी कहा है कि जब तक हम अपने आत्मस्वरूप में नहीं पहुंचते हैं, यह संसार दृष्टिगोचर होता है ।जैसे ही मैं अपने स्वरूप में पहुंचते हैं यह संसार रूपी स्वप्न खो जाता है ।यदि कुछ रह जाता है तो वह है सर्व व्यापक परम ब्रम्ह ,,,। धरती जल आकाश वायु हर जगह परमात्मा की सत्ता है । सच तो यह है कि हम सभी परमात्मा के अंश हैं और परमात्मा से जुदा कदापि नहीं रह सकते । यह अंश भी समाप्त हो जाता है,,, परमात्मा में विलीन हो जाता है,,,, और केवल रह जाता है परमात्मा ,,,,,। ईश्वर अंश जीव अविनाशी ,,,,अर्थात संसार का हर जीव ईश्वर का ही अंश है यहां हर जीव में ईश्वर का अंश व्याप्त है, लेकिन मनुष्य परमात्मा की वह अद्भुत रचना है जो अपनी क्षमताओं को जागृत करता हुआ अपने उसी को प्राप्त कर सकता है । इसके लिए परमात्मा ने उसे विशेष रूप से तैयार किया है ।यदि कोई मनुष्य अपनी क्षमताओं को जागृत करता हुआ अंतिम लक्ष्य तक पहुंच जाता है तो उसके समान संसार में कोई नहीं। परमात्मा और प्रकृति दोनों ने समभाव से मिलकर एकाकार होते हुए जीव की उत्पत्ति की है। दोनों ही एक नया अस्तित्व छोड़ते हैं वहीं जीव है ।इसलिए संसार का हर कार्य करते हुए, संसार का हर सुख दुख, हर सुख-सुविधा का आनंद लेते हुए हमें परमपिता परमात्मा को कभी नहीं भूलना चाहिए । जब अचानक हम किसी तकलीफ ,चोट,दर्द में आते हैं तो हमारे अंदर बैठा परमात्मा हमें अपनी याद दिलाता है क्योंकि हम तुरन्त स्वतः ही परमात्मा की याद कर गुहार करने लग जाते हैं ,,,परमात्मा ही हमारी जीव आत्मा में बैठा हुआ है ,वही हमको सुलाता है ,जगाता है हमको सुख दुख से अनुभव करवाता है,,, हमारे सारे कर्मों को करवा रहा है, हमारी बुद्धि, मन सारी इंद्रियां ,हाथ-पैर, नाक ,कान, आंख आदि उसके द्वारा ही चलायमन हैं ,,,कार्य कर रहे हैं। परंतु जिस प्रकार मेहंदी के पत्ते की लाली हमें दिखाई नहीं देती उसी प्रकार हमारे शरीर में छुपा परमात्मा हमको दिखाई नहीं देता। हम हंसते, रोते ,बोलते सब उसके ही द्वारा है,, यह सारी क्षमता हमें वह परमात्मा ही देता है ,,। तो कहने का तात्पर्य यह है कि हम सभी एक ही ईश्वर के अंश हैं अर्थात प्राणी मात्र में परमात्मा विद्यमान है तो क्यों ना ईश्वर के अंश जीव मात्र से बस प्रेम किया जाए ,,,बस प्रेम किया जाए ,।शक्ति भी मिल जाएगी प्रेम रूपी ईश्वर की शक्ति , ईश्वर प्राप्ति का मार्ग भी ।
- सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
बात आस्तिक या नास्तिक होने की नहीं है। बात है श्रद्धा और विश्वास की। यह तो हम सभी मानते हैं कि कोई शक्ति है जो समस्त ब्रह्मांड को चला रही है। उसे हम ईश्वर के रूप में समझें या खगोलीय शास्त्र में किसी विशाल ऊर्जा-शक्ति के रूप में समझें, दोनों ही मत एक ही बात की ओर इशारा करते हैं कि हम सब को चलाने वाला कहीं कोई एक है। अब जीवन की सरलता के लिए और मनुष्य के स्वभाव को देखते हुए सनातन धर्म में प्रभु के एक स्वरूप की कल्पना की गई है जिसके लिए हमारे मन में असीम श्रद्धा और भक्ति होती है और इस भक्ति से बँधा हुआ हमारा मन वह सभी कार्य करता है जो तथाकथित रूप से उसी ईश्वर के द्वारा हमारे लिए निर्दिष्ट किया गया है। अन्य धर्मावलंबियों के लिए भी ईश्वर का मूर्त रूप नहीं होते हुए भी किसी एक शक्ति की कल्पना अवश्य की गई है और उसी के दर्शाए नियमों का अनुसरण करते हुए सभी व्यवहार करते हैं। जब कभी हमारे जीवन में निराशा का वातावरण होता है या फिर हम किसी दुविधा में होते हैं तब इस प्रभु को याद करके हमारे मन को शक्ति प्राप्त होती है, उसमें नव ऊर्जा का संचार होता है और हम उस संशय से उबरते हुए आगे की ओर अपने कदम बढ़ाने में सक्षम होते हैं। इसलिए इससे यही पता चलता है कि प्रभु का स्मरण करने से हमारे मन में शक्ति आती है। जब हमारा मन शांत और धीर होता है तभी हमारे द्वारा संपादित कोई भी कार्य सफल होता है। प्रभु से हमें शक्ति प्राप्त होती है और हमारी उसी शक्ति और हमारे विवेक का संगम हमें हमें प्रभु भक्ति के लिए प्रेरित करता है। तात्पर्य यही है कि प्रभु की भक्ति और शक्ति दोनों ही परस्पर एक दूसरे के ऊपर अवलंबित प्रतीत होते हैं जब हम भक्ति में डूबते हैं तो हमारे मन में शक्ति आती है और प्रभु की शक्ति ही है जो हमें हमारे विषम परिस्थितियों में एक उचित दिशा निर्दिष्ट करते हुए आगे बढ़ाने की खातिर प्रेरित करती है। जब हम प्रभु की भक्ति में लीन होते हैं तब तब स्वतः ही हमारे भीतर उर्जा का संचार होता है, मन के सभी संशय दूर होते हैं और जीने की राह सरल हो जाती है। अर्थात ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रभु है तो सब कुछ है।
- रूणा रश्मि 'दीप्त'
राँची - झारखंड
शक्ति है तो प्रभु भी है और प्रभु है तो सब कुछ है। यह वाक्य सत्य है। शक्ति का पर्यायवाची जगदंबिका ही हैं और जहाँ जगदंबिका हैं वहाँ प्रभु का होना भी निश्चित है।इस धरती का सब कुछ नश्वर है एक मात्र ईश्वर ही परम् सत्य है। जिसने ईश्वर को पा लिया उसके पास सबसे बड़ी दौलत है। मीराबाई ने कहा भी है..पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
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