लघुकथा - 2024 (लघुकथा संकलन) - सम्पादक ; बीजेन्द्र जैमिनी

लघुकथा - 2018 , लघुकथा -  2019 , लघुकथा - 2020 , लघुकथा - 2021 , लघुकथा - 2022 , व लघुकथा - 2023 की अपार सफलता के बाद लघुकथा - 2024 का सम्पादन किया जा रहा है । जो आपके सामने ई - लघुकथा संकलन के रूप में है । लघुकथाकारों का साथ मिलता चला गया और ये श्रृंखला कामयाबी के शिखर पर पहुंच गई । सफलता के चरण विभिन्न हो सकते हैं । परन्तु सफलता तो सफलता है । कुछ का साथ टूटा है कुछ का साथ नये - नये लघुकथाकारों के रूप में बढता चला गया । समय ने बहुत कुछ बदला है । कुछ खट्टे - मीठे अनुभव ने बहुत कुछ सिखा दिया । परन्तु कर्म से कभी पीछे नहीं हटा..। स्थिति कुछ भी रही हो । यही कुछ जीवन में सिखा है ।  लघुकथा‌ का  स्वरूप भी बदल रहा है। जो समय की मांग या जरूरत कह सकते हैं।  परिवर्तन, प्रकृतिक का नियम है। जिसे नकारा नहीं जा सकता है। एक तरह से देखा जाए तो ये लघुकथाकारों का आयोजन हैं। जो सत्य से परें नहीं है। 

       लघुकथाकारों के साथ पाठकों का भी स्वागत है । अपनी राय अवश्य दे । भविष्य के लिए ये आवश्यक है । आप के प्रतिक्रिया की  प्रतिक्षा में ......।

क्रमांक - 001


                               मातम

जश्न का माहौल था।घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था।एक तरफ हलवाई तरह तरह के पकवान बना रहा था।घर के आंगन मे औरते मंगल गीत गा रही थी।नाच रही थी।कभी कभी कोई औरत जबरदस्ती विमला का हाथ पकड़कर अपने साथ नचाने लगती थी।
घर के बाहर बेंड की धुन पर बच्चे और बड़े नाच रहे थे।थिरक रहे थे।शामियाने में कुर्सियां लगी थी।जिन पर बैठे दीनानाथ और उनके दोस्त, रिश्तेदार  गप्पे मार रहे थे।
यह सारा आयोजन दीनानाथ औऱ विमला की पुत्रवधू सारिका के स्वागत के लिए हो रहा था।सारिका ने चार बेटियो को जन्म देने के बाद वंशबेल को आगे बढ़ाने वाले कुलदीपक पुत्ररत्न को जन्म दिया था।सारिका पुत्ररत्न के साथ अस्पताल से घर आनेवाली थी।दिनानाथ का बेटा करण पत्नी को लेने के लिय अस्पताल गया था।
बहू के आने से पहले समाचार आया था।अस्पताल में आग लग गई थी।जिसमे जलकर दस बच्चे मर गए थे।उन दस में सारिका का नवजात शिशु भी था। जहाँ पर जश्न का माहौल था।वहाँ पर मातम पसर गया था। ००
                  ‌     - किशन लाल शर्मा
                        आगरा--उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 002
 
                                   इंद्रधनुष 

"ट्रिन ट्रिन ..।"मोबाइल की घंटी बजते ही शुभि ने फोन उठाया 
"हाँजी, आफिस से चार दिन की छुट्टी है त्यौहार की ।बताइये मेमसाहिबा जी , बंदा कहाँ का रिजर्वेशन कराये?"
सुशांत की आवाज में मस्ती घुली हुई थी।शुभि कुछ कहती उसके पहिले ही टी.वी.पर आने वाले प्रोग्राम सदाबहार गीत से प्रसारित गीत के बोल उसके कानों में पड़े ---" अपनी अपनी किस्मत है कोई हँसे कोई रोये...।"
"हाँ सुशांत , घर आजाइये फिर बताते हैं।इस बार  मैंने तैयारी कर ली है ।सरप्राइज है।"सुशांत पूछता रहगया और शुभि ने फोन बंद कर तुरंत बाकी काम करने शुरु करदिये।
"हाँ तो बताइये ,क्या सरप्राइज है ?"
चाय का कप लेते हुये सुशांत ने पूछा।
"चाय नाश्ता खतम कीजिए और गाड़ी निकालिये। फिर बताते हैं।"शुभि ने मुस्कुराते हुये सफारी बैग बाहर निकालने शुरु किये।
"अरे बताओ न .।क्यासस्पेंस क्रियेट किये जा रही हो तब से? औरयह.पैंकिंग ?"
"पापा ..मम्मी कुछ न बता रहीं ।आप ही बताइये न इस बार हम कहाँ जा रहे हैं?सुचित ने पूछा 
"घर ...उन अपनों कीसुधि लेने जो हर साल हमारे इंतजार में दरवाजे पर आँखें गड़ाये रहते हैं। उस खुशबू को महसूस करने जो किसी इत्र से भी ज्यादा महकती है। और रंगों का वो इंद्रधनुष देखने जो ससुराल की पहली होली पर खिल कर रह गया था।"शुभि की आँखें यादों से भीगी हुईं थी।
लाउडस्पीकर से गूंज रहा था गीत ...."होली केदिन दिल खिल जाते हैं ,रंगों मेंरंग मिल जाते हैं।" ००
                          -  मनोरमा जैन पाखी 
                              भिंड - मध्य प्रदेश
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क्रमांक - 003

                            बदनामी

"अरे सुना क्या कुछ?"
"क्या हुआ?"
"अरे, श्यामलाल जी की लड़की तो बहुत तेज है भई! ऐसा व्यवहार कहीं लड़कियों को शोभा देता है?"
"मगर हुआ क्या?"
"अरे! आपको नही पता! कल कालेज जाते समय बस मे एक लड़के से मारपीट कर बैठी।"
"मारपीट!! लड़की होकर!! अरे!!"
"और नही तो क्या!"
"पर हुआ क्या था?"
"अरे होना क्या था! सुना है लड़के ने जरा छेड़-छाड़ दिया था। अरे छू-वू लिया होगा इधर-उधर कहीं! अब बस मे भीड़ मे ये सब तो होता  रहता है। लेकिन नही साहब हम तो चंडी हैं सोचकर उस लड़के को एक चांटा जड़ दिया। जोर से चिल्लाई अलग।"
"फिर?"
"फिर क्या! लड़का भी बदमाश था! उल्टा हाथ उठा दिया।"
"अरे फिर!!"
"फिर तो पूछिए मत, इन महारानी ने उस लड़के को इतना कूटा, इतना कूटा कि पूछिए मत!"
"और बाकी के लोग!!"
"अरे बस के सब लोग पहले तो तमाशा देख रहे थे फिर जब लड़का पिटने लगा तो उन्होंने भी हाथ साफ कर लिया।"
"फिर तो अच्छा सबक मिला लड़के को! अब किसी को ना छेड़ेगा!"
"खाक सबक मिला! बदनामी तो चारो तरफ लड़की की ही हो रही है।"
"अरे! मगर.... ००
                         - अंजू अग्रवाल 'लखनवी' 
                               अजमेर - राजस्थान
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क्रमांक - 004

                               सलोनी 

          सुबह काम वाली‌ बाई सलोनी जब आयी,तब तक सेठ कुन्दन लाल जी‌ के शव को शवदाह गृह ले जाया जा चुका था। वह ‌भी‌ रिक्शा कर वहां पहुंच गयी। शवदाह की प्रारम्भिक प्रक्रिया पूरी कर कुन्दन लाल जी‌ का बेटा और बहू 
घर चले गये।सलोनी बाहर बैंच पर बैठ गयी और अपने आंसुओं को ‌रोकने की कोशिश ‌करने लगी।तभी एक कर्मचारी हस्ताक्षर कराने के लिए आया।नाम पुकारने पर कोई नहीं आया,
तो सलोनी ने आगे बढ़कर अपने 
हस्ताक्षर कर दिये।कितना समय लगेगा, सलोनी के पूछने पर उसने बताया कि कुछ घंटे लगेंगे।
अपने छोटे-छोटे बच्चों को झोपड़ी में छोड़कर वह आयी थी, अभी यहां से भी कैसे जा सकती थी।  वह वहीं बैठ कर फूट -फूट कर रो पड़ी । उसे लगने लगा जैसे उसके पिता का ही साया उसके सर से उठ गया हो ‌।
                     -  मिथिलेश दीक्षित
                     लखनऊ - उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 005

                               हादसा 

हादसा बहुत बड़ा था। राजनीति चिंतित हो गई थी। सारे मोहरे जिम्मेदारी के दायरे में आ रहे थे।  विपक्ष इस मामले को जिस मजबूती के साथ उठा रहा था, उसे देखकर सरकार को तुरंत ही कोई निर्णय लेना था।
 अंततः सरकार के एक बुद्धिमान नौकरशाह ने इसका रास्ता खोज ही दिया। उसने कहा," हुजूर! जांच बिठा दीजिए और सारे संबंधित का तबादला उसकी सुविधा के किसी दूसरे स्थान पर कर दीजिए। यहां पर नया अधिकारी बिठा दीजिए। जनता भी संतुष्ट हो जाएगी। विपक्ष का मुंह भी बंद हो जाएगा।  हमारे मोहरे भी हमारे साथ ही बने रहेंगे।"
 इस सुंदर उपाय पर सरकार की बांछें खिल गई थी। ००
                             - सतीश राठी 
                            इदौर - मध्यप्रदेश
======================================क्रमांक - 006

                                   मास्टर जी 

       मास्टर राम केसर के दिमांग मे आया। चलो ! आज पुरे स्टाफ को चाय पर बुलाया जाऐ। पुरे स्टाफ के लोगो को वो अपने घर पर ले आया। 

पत्नि चिल्लाई कि क्यों चाय पे लेकर आ गऐ ।घर मे तो चीनी  नही है ! मास्टर जी ने कहा - तू ! टेंशन मत ले । यह मेरा काम है। मैं देख लूंगा। बस! तू  चाय बना कर ला  । 

      वह सारी फिकी चाय लेकर  बाकि मास्टरों के पास गया और कहां - देखो भाई ! इन सारी चाय मे से एक चाय फिकी है। वो! जिसके हिस्से मे आऐगी ,कल ! वो सबको पार्टी देगा। सब लोग चाय पी गऐ। एक ने भी नही कहां चाय फिकी है । एक मास्टर ने तो हद कर दी । भाभीजी ! इतनी चीनी क्यू डालती हो ? कहीं शुगर हो गई तो,,,,,,, ! 

                             - बीजेन्द्र जैमिनी

                           पानीपत - हरियाणा

======================================क्रमांक - 007


                               छद्म 

शहर के नेता नरेश भान ने शाम को अपने दोनों बेटों को बुलाकर कहा-" कल के बंद की अगुवाई करने का जिम्मा संगठन ने मुझे सौंपा है।
 कल हम सुबह 11:00 बजे चौक से इकट्ठे होकर जुलूस का आयोजन करेंगे और फिर जुलूस शहर की गलियों से गुजरता हुआ डी सी कार्यालय में मांग पत्र के साथ संपन्न होगा।"
इसके बीच भीड़ उग्र हो गई तो..?युवा बेटे ने कहा ।
"तब वहीं जुलूस खत्म समझो।
 गिरफ्तारियां होंगी हम नेता हैं और हम गिरफ्तार हो जाएंगे। नेता ने मुस्कुरा कर जवाब दिया ।
परंतु आप दोनों इस शहर में नहीं रहेंगे । आप दोनों कल दूसरे शहर चले जाएंगे। 
कल को आपका करियर भी तो देखना है। कहीं अरेस्ट-वेस्ट हो गए तो दिक्कत हो जाती है।
हर जगह करेक्टर प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ती है ।
अच्छे करियर के लिए पुलिस में कोई केस नहीं होना चाहिए।" दोनों बेटे अपने पिता की बात मानकर दूसरे शहर चले गए ।
दूसरे दिन सुबह जुलूस निकला।
नेताजी के साथ जुलूस वाली शाम तक कई युवा गिरफ्तार हो गए थे ।
उनमें बहुत से युवा पढ़े-लिखे डिग्री धारक थे । सैंकड़ों युवाओं के साथ गिरफ्तार नेताजी का जोश देखते ही बन रहा था ।
वह युवाओं से अपने हक के लिए मर मिटने का आह्वान कर रहे थे ...।
मानो उनका यह आह्वान अपने बेटों के भविष्य के लिए ही हो...। ००
                          - अशोक दर्द 
                     डलहौजी - हिमाचल प्रदेश
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क्रमांक - 008

                     ये दिन फिर नहीं आएंगे

“भाजी, शर्ट बड़ी सोहनी लग रही है।” सरवजीत ने कहा, तो मैं मुस्कुरा दिया, “शुक्रिया, तेरी भाभी की पसंद है, वही लेकर आती है मेरे लिए।” 
“नहीं, पसंद बड़ी अच्छी है भाभी जी की”, उसने कहा, “इसी तरह की पहना करो, बढ़िया-बढ़िया सी। अच्छे लगते हो।” 
“हां, पर तुम्हें तो पता ही है कि अब बच्चे बड़े हो रहे हैं, तो उनका भी खर्चा बढ़ ही रहा है। पहले मकान बनाने की, और दूसरी जिम्मेदारियां थीं, अब इनकी पड़ गई हैं, तो...।” मैंने मजबूरी जताते हुए कहा। 
“वह तो ठीक है भाजी, पर जब रब्ब दे रहा है, तो खर्चा करना भी चाहिए।” सरवजीत ने कहा। 
कुछ कहना तो चाहता था, पर तभी सरवजीत बोल पड़ी, “कुछ और न समझना भाजी, हमने भी बड़े गरीबी वाले दिन देखे हैं। यह तो कह लो कि कुछ किस्मत से और कुछ मेहनत से नौकरी मिल गई, तो अब अच्छे दिन आए हैं। और जब वाहेगुरु ने अच्छे दिन दिखाए ही हैं, तो क्यों न उसका शुक्र मनाना, और अच्छे से रहना।” 
“बात तो तेरी ठीक है”। मैंने कहा। 
अचानक मुझे कोई पुरानी घटना याद आ गई, जब इसी तरह अपने एक सहकर्मी के साथ मैं बाहर ट्रेनिंग पर गया हुआ था। एक बहुत ही अच्छी फिल्म लगी हुई थी, जिसे वहां मौजूद सभी साथी देखने जा रहे थे। मैंने भी अपने सहकर्मी से फिल्म देखने चलने को कहा, तो उसका जवाब था, “नहीं यार, मेरी समर्थता नहीं है”। 
“क्यों?” मैंने पूछा। 
“मेरे बच्चे बड़े हैं, और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं। तुम चले जाओ।” उसने कहा था। 
“तुम्हें छोड़कर? ऐसे कैसे?” मैंने जोर देकर कहा था, “चल न यार, कुछ नहीं होता। हाथ तंग है तेरा, पर इतना भी नहीं कि एक फिल्म न देख सके। मैं कौन सा जुआ खेलने के लिए कह रहा हूं। एक फिल्म ही तो है, चल।” 
“नहीं यार, तुम चले जाओ।” उसने फिर कहा। 
“एक बात याद रखना मेरी, और सब कुछ मिल जाएगा बाद में, पर ये दिन फिर नहीं आएंगे।” मैंने कहा था। 
आज भी वह उन दिनों को याद करता हुआ कहता है, “दोनों बच्चे अच्छे से सेट हो गए हैं। पर अगर उस दिन मैं तेरी बात न सुनता, और फिल्म देखने न जाता, तो मलाल ही रह जाता सारी उम्र का, क्योंकि मेरा भी बहुत ज्यादा मन था। सही कहा था तुमने...।”
...आज मैं भी मन ही मन स्वयं से यही कह रहा था, “ये दिन फिर नहीं आएंगे...।” ००                   
                         - विजय कुमार 
                  अम्बाला छावनी-  हरियाणा
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क्रमांक - 009
                           कस्टमाइज़ बच्चा

         "अरे सुनती हो, जल्द आओ  देखो क्या क्या हो रहा हैं  इस दुनिया में", नवीन  ने रीना को आवाज़  लगायी। 
         रसोई से हाथ पोंछते हुऐं रीना बाहर आयी "क्यों क्या हुआ ऐसा?"
         "देखो टीवी में क्या दिखा रहे हैं। अब  कस्टमाइज़ संतान पैदा की जा सकेगी उसकी फैक्ट्री किसी साइंटिस्ट ने लगा ली है और अब कस्टमाइज़ बच्चे पैदा कर सकेंगे। माँ बाप जैसा चाहेंगे उस बच्चे का रूप रंग, उसकी फितरत वैसे ही होगी जैसी वह चाहते  हैं"।
         "ऐसा कैसे हो सकता हैं?" रीना ने हैरानी से पूछा।
         "भगवान  बन गये हैं कुछ लोग,  देखो दिखा रहे हैं टीवी में, अब आप अपने बच्चों को अगर खिलाड़ी बनाना चाहेंगे तो वह खिलाड़ी बन जायेगी, अगर आप अपने बच्चे को प्रोफेसर बनाना चाहेंगे तो प्रोफेसर बन जाएगा, अगर आप अपने बच्चे को अभिनेता बनाना चाहतें  है तो भी अभिनेता बन जायेगा, नेता बनाना चाहते हैं तो नेता बन जाएगा।”
         “ऐसा कैसे हो सकता है? यह सब झूठ हैं, अपनी मर्जी से डिजाइनर बच्चे (पैदा) कर सकते हैं।” रीना हाथ  हिलाते हुऐ रसोई में वापिस जाने लगी तो नवीन ने कहा, "तुम्हें विश्वास नहीं आ रहा है? ऐसा सच में हो रहा हैं।” 
         रीना ने जाते-जाते पलट कर कहा, "अच्छा चलो, मानती हूँ बन जायेगा डिजाइनर बच्चा। पर भगवान जो निश्छल आत्मा देकर भेजता है वह आत्मा कहाँ से लायेंगे?"  ००     
                                -     अपर्णा गुप्ता     
                             लखनऊ - उत्तर प्रदेश                    ======================================
क्रमांक - 010

                               दिवा स्वप्न

मुनिया ने जबसे होश सम्भाला उसके पिता ने उसे भी कूड़ा बीनने पर लगा दिया। वह यह काम तो करती लेकिन उसका मन उसमें नहीं लगता..! वह जब विद्यालय की पोशाक पहने हुए बच्चों को विद्यालय जाते हुए देखती तो उसका मन होता कि वह भी इन बच्चों की तरह विद्यालय जाए।
आज उसने फैसला कर लिया कि वह भी विद्यालय जाएगी और शाम को घर आते ही उसने अपने पिता से कहा,-"बापू! कूड़ा बीनने में मेरा मन नहीं लगता है। मैं भी तमाम बच्चों की तरह विद्यालय जाना चाहती हूँ।"
"नाली के कीड़े रेशम पर सोने का सपना नहीं देखते...! अगर उन्हें रेशम पर लिटा दिया जाए तो वे मर जाते हैं," उसके पिता ने कहा।
"मैं नाली का कीड़ा नहीं हूँ.. मैं भी उन बच्चों की तरह ही बच्चा हूँ.. मैं विद्यालय जाऊँगी ही जाऊँगी!” मुनिया ने कहा!
"विद्यालय जाएगी…, विद्यालय जाएगी तो तेरा पेट कैसे भरेगा?" नशे में डगमगाता पिता ने कहा।
"जैसे वे बच्चे भरते हैं...।" मुनिया ने पूछा।
"तू समझती क्यों नहीं..? वे लोग धनी माँ-बाप के संतान हैं...।विद्यालय में ग़रीब बच्चों के लिए ज़ोंबी पाये जाते हैं…!” पिता बिटिया को भटकाने का प्रयास करता है।
"बाहर सड़क पार वाले भैया.. तो मुझसे कह रहे थे.. कि पढ़ने के लिए.. कोई फीस नहीं लगती, किताबें और खाना भी मुफ्त में मिल जाता है...," मुनिया ने कहा!
"फिर तू उ भैया से कह वो तुझे भरती करा दें...! लेकिन बिटिया तू ज़ोंबी से अपनी रक्षा तू कैसे कर पाएगी? घर कैसे चलेगा..?" पिता पूछता है।
"बापू..! मैं पढ़ूँगी भी स्कूल से लौटकर कचरा भी बीन लिया करूँगी, तुम चिन्ता न करो..! इंसानों के संग रहकर ज़ोंबी भी इंसान बनते हैं…!” मुनिया विद्यालय जाने के लिए दृढ़ थी।
"ठीक है बिटिया…,” पिता का दिल भर आया, वह भी चाहता था कि उसकी बिटिया पढ़े…! खुशी से पिता की आँखें गीली हो आयीं और उसने मुनिया को सीने से चिपका लिया।००
                       - विभा रानी श्रीवास्तव
                               पटना -बिहार
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क्रमांक - 011

                                    बोझ

     सिर पर ईंटों का बोझ उठाएं उस अधेड़ उम्र की औरत को चक्कर सा आ गया। और सिर पर रखी ईंटे एक के बाद एक धड़-धड़  करके उसके पैर के पंजे पर गिर पड़ीं। दर्द के मारे उसकी चींख निकल गई। पैर की एक अंगुली से खून निकल आया। चमड़ी फट गई।
     उसने इधर-उधर एक नजर देखा कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा। इत्मीनान  होने पर उसने अपनी ओढनी के पल्लू को फाड़ा और एक टुकड़ा लीर निकाली और अपनी चोटग्रस्त अंगुली पर लगी धूल- मिट्टी को साफ करने लगी। दर्द के मारे उसकी आंखों में आंसू आ गए।
       अंगुली में उठ रही थाह पीड़ा को दृढ़ता के साथ उसने दिमाग से परे झटका और उठ खड़ी हुई। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जैसे उसे कोई चोट लगी ही नहीं। उसे डर था कहीं ठेकेदार या उसके आदमी को चोट का पता चल गया या अंगुली पर बंधी पट्टी को देख लिया तो वह कल उसे काम पर ही नहीं रखेगा। एक दिन की मजूरी मारी जाएगी। 
     उसके मन- मस्तिष्क में अपने बच्चों और खाट पर पड़े बीमार पति के चेहरे एक-एक करके उभरने लगे। यह दर्द उसके पारिवारिक दर्द से कहीं कम ही था।परिवार का सारा बोझ उसके कंधों पर था। इतने बड़े बोझ के आगे उसने बहुत पहले ही नाजुक औरत के अपने चौले को उतार फैंका था।
      वह दोगुने जोश और हिम्मत से भर उठी और नीचे गिरी पड़ीं ईंटों को एक-एक करके वापस अपने सिर पर  रखने लगी। एक...दो...तीन...। ००           .....
                               - डाॅ. रशीद ग़ौरी
                          सोजत सिटी - राजस्थान
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क्रमांक - 012

                           झंडे से कमाई 

सलमान के तेज क़दम आज हवा से बातें कर रहे थे।वह जल्द से जल्द घर पहुँचना चाह रहा था।भिड़े हुए दरवाज़े को धीरे से ढकेल बिना आवाज़ किए स्कूल के कपड़े उतार कर सुबह की अपनी बनाई रोटी खाई।आज जल्दबाज़ी में सब्ज़ी नहीं बना पाया था।
आठ दिन हो गए ,माँ को खटिया पकड़े हुए आज दवा ले ही आऊँगा…प्याज़ मिर्ची के साथ तीन रोटी तीन मिनट में ठूँस कर  भागा राकेश चाचा की दुकान पर…।
“लाइए चाचा कितने हैं ?”
“पूरे सौ हैं बेटा”
बारिश ने भी आज ठान लिया था जम कर बरसने का लेकिन कर्मठ और दृढ़ सलमान को आज कोई तूफ़ान डिगा नहीं सकता और उसने भी ठान ली थी कि सारे बेच कर ही घर जाऊँगा।बारिश से बचने के लिए सर पर ओढ़े प्लास्टिक को उतार सारे तिरंगे को उस में सहेज लिया।
चौक पर खड़े भीगते सलमान पर कुछ लोग तरस खा कर मोल-भाव करते और झंडा ख़रीद ही लेते।
जैसे ही कोई पास आता सलमान ,”जय हिन्द! सर “कह कर झंडा आगे बढ़ा देता और कहता इसका “कोई मोल नही सर जी…जो आपकी श्रद्धा।”
आज भाग्य ने साथ दिया।सारे झंडे बिक गए।
रात नौ बजे बारिश से तर बतर सलमान राकेश चाचा के घर झंडे का हिसाब देने गया।
“ये लो चाचा पूरे सौ झंडे के पैसे।”
सलमान के हाथ में एक झंडे को देख राकेश ने  पूछ लिया -“एक झंडा नहीं बिका क्या?”
“नहीं चाचा ये तो मैंने अपने लिए ख़रीदा है।”
झंडे को लहराते हुए शान से सलमान ने कहा और दौड़ पड़ा दवाखाने की ओर…
सुबह सलमान बेहद खुश था क्योंकि माँ और छप्पर पर देश का झंडा मुस्कुरा रहा था। ००
                            - सविता गुप्ता
                          राँची - झारखंड
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क्रमांक - 013

                            कोयले का सच 

मंत्री जी  कोयला खदान में कोयला खत्म हो गया है ।
ऐसी खबर टीवी चैनल प्रसारित कर रहे हैं ।
पी ए जी आप इस बात की पुष्टि कोल माइन के हेड को फोन करके पूछिए क्या स्थिति है ? यह खबर कैसे लीक हो गई ।
जी सर मैं अभी पता करता हूँ।
फोन की घंटी जा रही थी उधर कोई फोन नहीं उठा रहा था। फिर से प्रयास  किया तो साहब के असिस्टेंट ने फोन उठाया "मैं मंत्री जी का पीए बात कर रहा हूँ।" टीवी पर जो न्यूज प्रसारित हो रही है वह कैसे लीक हुई ।
हमें लगता शायद किसी मजदूर की आपसी बातचीत का विडियो किसी ने न्यूज वालों को दे दिया है ।
अब क्या होगा ?
पी ए साहब बात तो सत्य है ।  कोयले को अनवरत निकाला जा रहा है यह तो एक दिन होना ही था ।
कुछ ही घंटो में एक के बाद एक सभी शहरों में अंधकार छा गया मशीनें बंद हो गई । चारों और हाहाकार मच गया ।लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ गई । 
पी ए नेे देखा दूर एक  गांव में  सोलर लाईट जलते हुए मुस्कुरा रही थी ।पीए के मुंह से निकला "अति सर्वत्र वर्जयेत"।००
                        - अनिता गहलोत
                        नागपुर - महाराष्ट्र
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क्रमांक - 014

                           पर मत काटो

अपनी बेटी की कामयाबी और आत्मविश्वास देखकर उसे अंदर तक गदगद कर देता था। आज बेटी मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ओहदे पर है, आत्मनिर्भर है, कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की उसे जरूरत नहीं है। 
सुनंदा जब भी फुर्सत में बैठती तो टी.वी. ऑन करके विचारों में खो जाती। बचपन से आत्मनिर्भर बनने की अपनी ख्वाईश तो न जाने कहाँ दफन हो गया। 
कम उम्र में घर गृहस्थी में झोंक दिया गया। फिर तो किसी बात की सुध ही नहीं रही। 
बेटी के जन्म लेने पर उसने ठान लिया था, कि इसे मैं आत्मनिर्भर बनाऊंगी। इसकी उड़ान में कोई बाधा नहीं आने दुंगी।
इधर टी.वी.में चलते हुए सिरियल में एक मजदूर माँ-बाप अपनी बेटी के लिए आपस में  कह रहे थे, 'अरे ई स्कूल का जाई लागल, कि एकरा के पांखि हो गईल'।
'लईका ढूंढ के बियाह कराई देई, अपन घर-दुआर के बोझा पड़िते उड़ब छोड़ि देत।' माँ ने कहा।
सुनंदा के मूँह से सहसा निकला "नहीं नहीं इसके पर मत काटो।"
                          - पूनम झा 'प्रथमा'
                              जयपुर - राजस्थान 
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क्रमांक - 015
                            समझदार कौन 

एक गांव की बात है । गांव में दो सगे भाई रहा करते । बड़े का नाम गीता राम  पेशे से मास्टर । चालाक और मतलबी इन्सान । और छोटा शांति स्वरूप । छोटा जैसा नाम वैसा स्वभाव । न कोई लालच मन में न कोई फरेब । मेहनत मज़दूरी करता । जो मिलता उसी में संतोष ।
बरसात का मौसम । भारी बारिश बरस रही । बारिश के चलते भूस्खलन हो गया । पहाड़ी से पत्थर गिर गए थे । जगह जगह जमीन धंस गई । खेतों के डंगे बैठ गए । मक्की की फसल खराब हो गई । 
गीता राम के एक खेत का डंडा दो अलग-अलग जगहों से ढह गया । नीचे वाला खेत उसके छोटे भाई शांति स्वरूप का । गीता राम ने डेढ़ दो फुट बाहर की ओर से अपने छोटे भाई के खेत से डंगा लगा दिया । शांति स्वरूप का वो खेत छोटा पड़ गया । लेकिन उसने यह सोच कर सब्र कर लिया कि गीता राम आखिर है तो उसका बड़ा भाई । चलो कोई फर्क नहीं पड़ता । घर की ही तो बात है । 
कुछ दिन बाद उसी खेत का बचा हुआ शेष डंगा भी गिर गया । गीता राम ने उसे भी दोनों ओर बढ़े हुए भाग के बराबर चिनाई कर दी । इस तरह उसका पूरा खेत डेढ़ दो फुट बढ़ गया और उसके भाई का खेत डेढ़ दो फुट छोटा पड़ गया ।  फिर भी शांति स्वरूप ने कुछ नहीं कहा । 
गीता राम का आलीशान बड़ा सा मकान । उसने एक कुत्ता पाल रखा है । कुत्ते का नाम है ब्रेवो । कुत्ता इतना तेज और खुंखार कि किसी को भी अपने मालिक के घर और आसपास फटकने नहीं देता । आदमी तो दूर चिड़िया तक फटक नहीं सकती वहां ।
कुछ दिन बाद की बात है । नम्बरदार जैसे ही गीता राम के घर की ओर जाने के लिए मुड़ा ही कि कुत्ते ने देखा कोई आ रहा है । उसने जोर जोर से भौंकना शुरू कर दिया । गीता राम घर से बाहर निकला तो देखा कि नम्बरदार आ रहा है तो उसने अपने कुर्ते को आवाज लगाई - ब्रेवो ... ब्रेवो ...  । इधर आ  ... आ जा ... आ जा ... । उसने कुत्ते को पकड़ कर सांकल से बांध दिया ।
ठिठका - सा नम्बरदार जब गीता राम के घर पहुंचा तो मारे डर के उसका चेहरा देखने लायक था । भय साफ झलक रहा था । उनके बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया । 
नम्बरदार - मास्टर जी ! आपका कुता तो बहुत ख़तरनाक है ।
गीता राम - नहीं , नम्बरदार जी ! बहुत समझदार है । किसी अजनबी को अपनी सीमा के भीतर घुसने ही नहीं देता ।
नम्बरदार - अच्छा ! बहुत अच्छी बात है । आजकल तो इंसान को अपनी सीमा का ज्ञान ही नहीं है । वो तो बस आगे ही बढ़ता रहता है । ये तो जानवर है । इसे तो अपने मालिक की संपत्ति और सीमा का इल्म है ।  सच में , ये तो बहुत समझदार कुता है । नम्बरदार की बातें सुनकर गीता राम उसके मुंह की ओर टकटकी लगाकर देखता ही रह गया । ००
                                  - अनिल शर्मा नील 
                             बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
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क्रमांक - 016

                   जैसा करेगा वैसा भरेगा

    दीपावली के अवसर पर उसने उस बुढ़िया को अपनी दुकान के आगे फुटपाथ पर हट्टी लगाने के लिए इस शर्त पर जगह अनुमति दे दी कि जितनी कमाई होगी उसका 20% वह दुकानदार को देगी जबकि उस दुकान के आगे का फुटपाथ उसका नहीं था , नगर पालिका का था ।
      बुढ़िया ने हाँ भर दी ।
      जब ग्राहक आता तो उस दुकानदार से कहता , " तुमने बहुत अच्छा किया जो इस गरीब बुढ़िया की मदद कर दी ।" और यह कहते हुए वह बुढ़िया से सामान खरीद लेता ।
    शाम को दुकानदार बुढ़िया से बोला , " तुम्हारे नाम से मेरा सामान भी बिक गया। कल से तुम रोज यहाँ फुटपाथ पर अपना सामान लगाकर बेच सकती हो ।" वह 20% कमाई उस दुकानदार को देते हुए बोली , " धन्यवाद भैया तुम्हारा जो तुमने मेरी मदद की ।"
     शाम को नगर पालिका वाले आए और सीसीटीवी कैमरे के आधार पर दुकानदार से बोले , " तुमने उस बुढ़िया से फुटपाथ का किराया लेकर सरकार के कानून का उल्लंघन किया है ।" और यह कहकर वे उससे 50% जुर्माना लेकर चलते बने ।
     भलाई का बदला ऐसे मिलेगा दुकानदार अब यह सोचकर पछता रहा था ।००
                             - राजकुमार निजात
                               सिरसा - हरियाणा
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क्रमांक - 017
                              टूटता तिलस्म 

“दादी! कहानी सुनाओ ना।”
"कहानी! कौन-सी सुनाऊँ …? चिड़ा-चिड़िया वाली …।”
 "ना-ना। कोई नई कहानी सुनाओ।"
“अरे! अब नयी कहाँ से लाऊँ …? अच्छा लो, सुनाती हूँ। बचपन में सुनी थी अपनी दादीमाँ से। - एक थी राजकुमारी। बहुत ही प्यारी, सबकी लाडली।"
“हम्म…! जैसे मैं?
"हाँ रे! खेलते-कूदते, पढ़ते-लिखते एक दिन वह बड़ी हो गयी।" 
"फिर।"
"फिर क्या? अच्छी-सी नौकरी करने लगी। जो भी उससे मिलता, बहुत ही खुश होता।" 
"वो क्यों?"
"क्योंकि, वह स्वभाव से बहुत अच्छी थी और हर काम बहुत सलीके से करती थी।"
"अच्छा!"
"एक दिन उसे एक राजकुमार मिल गया, उसे बहुत पसंद करने लगा। उसका ख्याल भी रखने लगा।”
"अच्छा! मतलब केयर, जैसे पापा करते हैं मम्मी की?”
“हाँ भई! बार-बार बोलोगी तो मैं भूल जाऊँगी ना?"
"ओके बाबा! अब नहीं बोलूँगी।"
"फिर एक दिन, एक बदमाश आदमी आया और राजकुमारी को पकड़कर अपने साथ ले जाने लगा।”
"उई बाबा! फिर?"
"फिर क्या, राजकुमार भी वहाँ आ पहुँचा और जूडो-कराटे करके उसे मार भगाया। कहानी खत्म।"
"उँहं! एंड तो जरा भी पसंद नहीं आया।"
"फिर तुम्हीं बता दो ना... ?"
"बदमाश आदमी ने जैसे ही राजकुमारी को पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। राजकुमारी ने ढिशुम-ढिशुम करके उसे वहीं मार गिराया। ऐसेsss …।” कहकर गुड़िया अपने नुथने फुलाए, हवा में हाथ-पैर मारती जूडो कराटे के एक्शन करने लगी। 
उसे निहारती दादी की आँखें सजल हो आईं। जैसे सदियों से अदृश्य बेड़ियों से जकड़ी दादीमाँ को गुड़िया ने अतीत के गलियारों से बाहर निकाल दिया था।००

                       - प्रेरणा गुप्ता 
                      कानपुर - उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 018                     

                       सोच का दायरा   

" मंगल ! मुझे मालूम था तुम हर बार की तरह इस बार भी दुकान जरूर लगाओगे , लाओ  इक्कीस दीये दे दो। "
" जी साहब ।"
" अरे जग्गू बेटा ! साहब जी को इक्कीस दीये देना ।"
 दस वर्षीय जग्गू के चेहरे पर असीम मुस्कुराहट हाथ मे दियो का पैकेट-
" लिजिए अंकल !  पूरे इक्कीस दीये रख दिए हैं ।"
" शाबाश बेटा ! यह लो रुपए, पढ़ते हो ?"
"जी अंकल ! पांचवी कक्षा मे हूं।"
" बहुत बढ़िया , मन लगाकर पढ़ाई करना नही तो अपने पिता की तरह ही जिंदगी भर कुम्हार का काम करते रह जाओगे।"
" जी अंकल ।"
दीये का पैकेट ले प्रमोद ने जैसे ही स्कूटर स्टार्ट की उसी वक्त मंगल उनके करीब आ हाथ जोड़ कहने लगा-
" माफ करिएगा साहब जी ! आपसे एक बात कहना चाहता हूं ।"
" हां-हां कहो "
"साहब जी !आज जो बात आपने जग्गू से कहीं फिर कभी मत कहिएगा ।"
" क्यों , मैंने ऐसा क्या कह दिया  जिससे तुम्हें बुरा लगा ?"
 " आपने एक बात तो बहुत अच्छी कही कि खूब मन लगाकर पढ़ाई करना किंतु साथ ही आपने यह भी कहा कि- 'नहीं तो मेरी तरह कुम्हार बनकर रह जाएगा' इस तरह की बातें बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालती है उनके मन में अपने पैतृक व्यवसाय के प्रति हीनता के भाव जन्म लेने लगते हैं बड़े होकर खुदा ने खास्ता उसकी कहीं नौकरी नहीं लगी तो वह तनाव में कोई गलत कदम उठा सकता है  यदि वह पैतृक व्यवसाय से जुड़ा रहेगा तो अपनी रोज रोटी कमा ही लेगा इसीलिए मै  स्कूल की छुट्टी के दिन इसे अपने साथ कुछ समय के लिए लेकर आता हूं  ताकि वह अपने पैतृक व्यवसाय को समझ सके उसका सम्मान करे।"
मंगल के विचार  सुन प्रमोद का मुंह आश्चर्य खुला का खुला रह गया। मन ही मन सोचने लगा कितनी सकारात्मक सोच है मंगल की, काश! यही सोच आम जनों में भी व्याप्त हो जाए।००
                         - मीरा जैन
                     उज्जैन . - मध्यप्रदेश
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क्रमांक - 019
 

                          आँखों के बटन 

           लेखक बिरादरी में उन्होंने आखिर अपनी जगह  बना ही ली है ।  
           ऐसा अचानक से नहीं हुआ है । बचपन में  तुकबंदियाँ किया करते थे। लिखने का शौक और छपे हुए  पन्नों  पर अपना नाम देखना उन्हें अपने कुछ होने का बोध करवाता था।परन्तु उनकी तरफ  कोई  कुछ ध्यान नहीं देता था।   इसलिए कभी - कभी कुंठित होकर कलम को अलविदा कह देने की नौबत भी आ जाती थी। पर फिर अचानक न जाने अंदर ही अंदर क्या कुलबुलाता कि कवि सम्मेलनों से होकर वापस आते तो फिर से पन्ने काले करने लगते। फिर भी बात  बन नहीं रही थी। 
         पर बात तो बनानी ही थी।इसी जिद ने उनसे उनकी रातों की नींद छीन ली थी। नींद में कोई खलल न हो , इसके लिए  उन्होंने एक नया तरीका निकाला।  जिस भी मंच पर जगह मिलती अपनी कम , औरों कि ज्यादा कहने  लगे ।  किसी के लिए कसीदे पढ़ते तो किसी की रचना पर अपनी बेबाक राय रख देते। जरुरत के अनुसार तालियां पिटवाते। रचनाओं की संरचना पर लम्बी - लम्बी टिप्पणियां करते। यही सिलसिला सोशल मिडिया के  मंचों पर भी दोहराते ।  धीरे - धीरे तरह - तरह की साहित्यिक गतिविधियों को संचालित करने  और बाद में आयोजित करने में  भी सिद्धहस्त हो गए । इन कार्यों के लिए धनराशि की व्यवस्था उन  लोगों से की  जाती जो साहित्यिक रचनाओं की दृष्टि से नौसिखिये होते परन्तु आर्थिक दृष्टि से संपन्न। मंच पर उन्हें अतिरिक्त  महत्व दिया जाता। अपनी प्रशंसा सुनने की तमन्ना के आगे कुछ धनराशि खर्च करना उनके लिए पिकनिक सरीखा उत्सव होती थी।  इनके साथ कुछ अच्छे रचनाकारों को भी समाहित और सम्मानित कर दिया जाता। इन महान श्रमजीवी लेखकों के भारी - भारी पर्स की बदौलत उनकी दूकान खूब चल निकली। सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के कर्ता - धर्ताओं के आंगन में पैठ भी इसी सूत्र के माध्यम से सरल हो गयी। आखिर प्रंशसा की भूख तो वहां भी थी ही। इन श्रमसाध्य प्रयासों ने उनके लिए सफलता के द्वार खोल दिए। उनकी अपनी रचनाएँ भी तहलके की श्रेणी में कही जाने लगीं। सैकड़ों प्रसंशक उनके चारों और जुड़ गए।  प्रिंट की दुनियां में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा। 
    आज वे दो - दो आँखों वाले परन्तु दृष्टिविहीन  धनाढ्य साहित्यसेविओं की दृष्टि में साहित्य जगत के चमकते सितारे बन गए हैं भले ही उनके द्वारा संचालित मंच किसी भी साहित्यिक दृष्टि से हीन होते हैं ।          
                               - सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
                           साहिबाबाद - उत्तर प्रदेश
=====================================क्रमांक - 020

                             नियम नीति 


नीति कहती - दादी आप हर दीपावली लक्ष्मीपूजा के बाद १६ कौड़ी से जुआँ खिलाकर , हम सबको हरे नारंगी नीले नोट बाटती हो फिर पापा क्यों कहते है जुआँ खेलना अच्छी बात नही है ? 

दादी कहती - कोई भी रीति रिवाज त्योहार ईश्वर द्वारा बनाये ,नियम तुम्हारे नाम की तरह सबसे बड़ी पोती हो नीति रखा आगे राह तुम्हें ही दिखाना है !  

अब सुनो , भगवान लक्ष्मी नारायण अपने परिवार के साथ जुआँ खेल मनोरंजन करते वही परंपरा सामान्य जनमानस ने अपनाई , घर के पैसे घर में होते मन ख़ुशियों से परिपूर्ण मिठाई खिलाई जाती   

नीति कहती - पर दादी महाभारत में जुए में पांचाली को हार बैठे ,तो कृष्णा ने चक्र चला इज्जत बचाई 

दादी कहती - यही तो दुष्परिणाम है ईश्वर हमेशा सही और ग़लत दोनों राह दिखाते है , 

चलना ना चलना आपकी मर्ज़ी है ! 

तो दादी ये सब धन की माया है ! 

दादी कहती -इसी में हमारी प्रकृति संसार बसा है ! ००

                      - अनिता शरद झा

                        रायपुर - छत्तीसगढ़

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                              कड़वा सच

रोहतास आज  घूमते-घूमते अपने मित्र राधेश्याम के घर चला गया।  तो उसने देखा कि वहां दोनों पति-पत्नी में किसी बात को लेकर झगड़ा चल रहा था। जब रोहतास ने उनसे पूछा कि तुम झगड़ा क्यों कर रहे हो तो राधेश्याम की पत्नी ने रोहतास से  कहा- "देवर जी, हमें राजनीति से क्या लेना-देना? लेकिन यह घर में घुसते ही नेता पुराण शुरू कर देता है। अमुक  परिवार ने देश  को लूट खाया। अमुक नेता पशुओं का चारा ही खा गया। वगैरा-वगैरा यही रोना रोता रहता है।
इन नेताओं ने तो कुछ खाकर अपना घर भरा होगा। पर इस सत्यानासी ने तो अपने पुरखों से मिली सारी जमीन-जायदाद ही बेच खाई। जिसके चलते हम दाने-दाने के मोहताज हो गए। नेताओं की करतूत का बखान करता रहता है, अपनी करतूत का बखान नहीं करता।" अपनी पत्नी के मुख से जब यह सुना तो राधेश्याम का मुँह देखने लायक था। क्योंकि भाभी श्री ने कड़वा सच बोल दिया था। ००
 ‌                  - रोहित यादव
                   मंडी अटेली - हरियाणा
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क्रमांक - 022

                         डोरियां टूट गईं 

“अचला, भई, संडे मॉर्निंग की दूसरी चाय पिला दो। बहुत तलब हो रही है।”
“हाँ रूद्र, अभी चढ़ाती हुं।”  
“मम्मा, आज मुझे नाश्ते में पाव-भाजी खानी है, प्लीज़ बना दो ना।” 
“बेटा, आज मैंने तो पनीर के सैंडविच की तैयारी कर रखी है। पाव भाजी अगले संडे बना दूँगी।” 
“ऊँ...नहीं...मुझे तो आज पाव भाजी ही खानी है। प्लीज़ बना दो न मम्मा, मेरी अच्छी मम्मा,” मेरे बारह वर्ष के बेटे गुड्डू ने ठुनकते हुए फरमाइश की। 
“अच्छा बाबा, बनाती हूँ।”
“बहू, मेरी ग्रीन टी का क्या हुआ। अभी तक बनी नहीं क्या?” दालान से श्वसुर जी चिल्लाये।
“ला रही हूँ बाबू जी।” 
“और लड्डू गोपाल की पूजा का भोग तैयार किया या नहीं? मैं नहा कर आ गई।” ये मेरी सासू माँ थीं।
“बस बना ही रही हूँ माँ जी, अभी लाई।”
सुबह के नाश्ते और अन्य कामों से फारिग हो कर मैं जरा हाथ में अखबार लेकर बैठी ही थी कि तभी पति-देव मेरे सामने  मुस्कुराते हुए प्रकट हुए और बोले, “आज लंच में आलू और पनीर के कुलचे और नर्गिसी कोफ्ते  बना लेना भई। विनीत और अवनीश आ रहे हैं खाने पर। कल यूं ही बातों बातों में मैंने उनसे तुम्हारे हाथों के बने कुलचों और कोफ्तों की तारीफ़ कर दी तो दोनों मेरे पीछे ही पड़ गए, “हम दोनों कल भाभी जी के हाथ के कुल्चे और कोफ्ते खाने आरहे हैं।” दोनों की बीवियाँ आज कल मायके गई हुई हैं।” 
उनकी इस बात से मेरी पेशानी पर झल्लाहट से सलवटें पड़ गईं जिन्हें देख कर रूद्र शायद किंचित अपराध-भाव से भर बोल उठे, “प्लीज़ यार, बना देना न। जानता हूँ तुम थक गई होगी, लेकिन सच कह रहा हूँ, कल मैंने उनको इन्वाइट नहीं किया। सच..., तुम्हारी कसम।”
मानस चक्षुओं के समक्ष अनायास कल शिल्प-मेले में पपेट-शो में डोरियों से बंधी, नाचती कठपुतली सजीव हो उठी। 
दोपहर में  मेहमानों के लिए उनकी फरमाइश के व्यंजन बनाए और उन्हें खिलाए। 
आगंतुकों को विदा कर के मैं कमर सीधी करने तनिक लेट गई थी। 
तभी बाहर साँझ के झुटपुटे में रिमझिम फुहारें पड़ने लगीं। 
“बहू-रानी, बारिश हो रही है भई। पकोड़े खाने को मन मचल रहा है।” 
“माँ जी, मैं बहुत थक गई हूँ। रूद्र, प्लीज आप पकौड़ों के लिए प्याज और सब्जियां धो-काट दीजिए। मां जी, आप बेसन घोल दीजिए। बाबू जी, आप धनिए की चटनी पीस दीजिए। और बस मैं फटाफट आप सब के लिए गरमागरम पकौड़े तल दूंगी। 
और हां, गुड्डू बेटा, तुम्हें दौड़ दौड़ कर सबको पकौड़े सर्व करने होंगे।”
कठपुतली की डोरियां खट से टूट गई थीं। ००
                                  -  रेणु गुप्ता
                                  जयपुर - राजस्थान
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क्रमांक - 023
                                 बहू

एक शादी समारोह में पचपन वर्षीया राधा अपनी बेटी और बहू के साथ पधारी।  राधा जी की सुंदरता और सेहत  उनकी उम्र से आधी लग रही थी। बेटी और बहू दोनों के नैन नक्श सुंदर थे ।सभी की नजरें उन तीनों पर केंद्रित हो गई।
 एक महिला धीरे से  अपने बगल की महिला के कान में फुसफुसाई,"तीनों कितनी सुंदर लगती हैं,लेकिन उनमें से एक के चेहरे में आभा कुछ कम दिखती है। लगता है एनीमिक है"
"जी,वह घर की बहू है" दूसरी महिला ने धीरे से कहा। ००
                               - निर्मल कुमार दे
                             जमशेदपुर - झारखंड
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क्रमांक - 024

                       वक्त-वक्त की बात

सिद्धि का फोन बज उठा। रिद्धि का कॉल था।
उसने फोन उठाया तो रिद्धि की बातें शुरू हो गई।वह अपनी बात बता रही थी लेकिन सिद्धि के दिमाग में कुछ और चलने लगा।
लगता है कल की ही बात है।रिद्धि हमेशा मुझसे शिक़ायत करती रहती थी।कहती 
"दीदी आप ही मेरे घर आया करें मेरा जाना तो सम्भव नहीं हो पायेगा। मैं क्या करूँ मुझे समय ही नही मिलता।सुबह से कब रात हो जाती है पता ही नहीं चलता। 
कभी - कभी मैं भी आश्चर्य करती और कह देती थी- "ऐसा क्या करती रहती हो भई ,सभी अपने घरों में काम करती है।पति, बच्चे परिवार कौन नहीं देखता।पर समाज में भी तो मिलना - जुलना जरूरी है।बहुत सी औरते बाहर काम भी करती हैं और घर - बाहर दोनों अच्छी तरह सम्भालती है और तुझे सिर्फ घर संभालना इतना भारी लगता है।"
ये सब सुन वह बिल्कुल रुआँसी हो जाती और इसे अपनी कमी मान बैठती।
"शायद मैं ही सही तरीके से चीजों को मैनेज नही कर पा रही हूं दीदी।" वह कहती - "अब क्या बताऊँ ,सुबह जबसे नींद खुलती है काम शुरू हो जाता है।बच्चों को बिस्तर से उठाना ही तो बड़ा काम है ,फिर उन्हे स्कूल के लिए तैयार करना नाश्ता बनाना, फिर स्कूल भेजना, और तब लगता एक बड़ काम हो गया।
फिर बारी आती है पति की।आफिस जाने तक उनके पीछे- पीछे लगे रहना पड़ता है।अब क्या कहूँ दीदी न देखूँ तो कब क्या छोडकर ऑफिस चले जायेंगे और आने पर चिक- चिक शुरू।ऐसे ही पचासों काम है।बाई ,माली, बच्चों के आने की फिक्र ,उनकी पढ़ाई ,तरह- तरह के खाने की ज़िद और कितना कहूँ और क्या - क्या कहूँ आपसे ,इनसब के बीच अपनी सुध भी नही रहती।  चैबीस घण्टे कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता।
बस दीदी मैं तो सोचती हूँ कब बच्चे बड़े होंगे और इन कामों से छुटकारा मिलेगा।मैं तो थक गई ये सब करते- करते।"
वो दुखी नही थी, हाँ थोड़ी परेशान जरूर रहती थी।तब लगता रिद्धि सही कहती है ।शायद वह सही ढंग से मैनेज नहीं कर पा रही थी।ऐसे ही धूप - छावं के बीच सालों निकल गए। बच्चे बड़े हो गए और सेटल भी।अब तो वो दूसरे शहरों में रहते हैं।क़भी - कभी छुट्टियों में ही आना होता है उनका।
आज भी उससे बातें होती है तो बस शिकायतों की पोटली खोल देती है रिद्धि।अपने उसी लहज़े में कहती - "क्या करूँ दीदी अब तो मन ही नहीं लगता घर में अकेले।बच्चे बाहर चले गए तो लगता कोई काम ही नहीं।अकेली बैठे - बैठे बोर हो जाती हूँ।याद है न दीदी मैं कितना कहती थी कि कब ये बड़े होंगे और मुझे इनके कामों से छुटकारा मिलेगा।पर अब लगता है कि ये क्यों बड़े हो गए।उन कामों के बिना तो जिंदगी ही अधूरी सी लगती है।ढूंढ-ढूंढ कर कामों में व्यस्त रखती हूँ खुद को।क्या करूँ चौबीस घंटे इतने लंबे हो गए कि बीतते ही नहीं।उसका गला भर आता,उसके आँसूओं को,उसके खालीपन को मैं महसूस कर सकती हूँ।बस उसे यही कहती कि दुनिया की रीत यही है।और खुद भी उदास हो जाती।
बस यही सोचती हूँ ,चौबीस घण्टे भी अजीब होते  हैं। कभी पल में बीत जाता है तो कभी एक पल भी सदियों के समान लगता है।
सब वक़्त-वक़्त की बात है। ००
                     -  मधुलिका सिन्हा
                     गुरुग्राम - हरियाणा
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क्रमांक - 025

                              उपज

देश की वार्षिक मीटिंग के अतिरिक्त वर्तमान की एक बड़ी समस्या को लेकर उच्च स्तरीय मीटिंग बुलाई  गई थी।
जिसमें सरकारी अधिकारियों के अलावा वैज्ञानिक, डॉक्टर, पर्यावरण विशेषज्ञ एवं अन्य क्षेत्रों के बुद्धिजीवी भी शामिल थे।
सरकार की तरफ से जनगणना मंत्री ने समस्या को प्रस्तुत करते हुए कहा "जनगणना में कन्याओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है पुरुषों की तूलना में।"
"हाँ यह समस्या मेरे क्लिनिक और अस्पताल में भी बहुलता से पाँव पसार रही है। जबकि हर दम्पति लड़के की कामना करते हैं कन्याओं का जन्म आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।" डॉक्टर ने कहा।
वैज्ञानिक ने भी अपना मत रखते हुए कहा "हमारे लैब परीक्षण में पुरुषों के स्पर्म में वाई क्रोमोजोम्स की संख्या में बहुत कमी देखी जा रही है जबकि एक्स क्रोमोजोम्स ही अधिक हैं। जैसाकि आप सभी जानते हैं पुरुषों के जन्म के लिए वाई क्रोमोजोम ही आवश्यक होते हैं ।"
तभी पर्यावरण विद उठ कर बोल पड़ी "यह तो प्रकृति का नियम है। जो बोया जाएगा वही तो उगेगा। आखिरकार धरती की कोख में इतने भ्रूणों का बीज जो बोया गया है ।" ००

 ‌‌‌‌‌‌                       - कनक हरलालका
                           धूबरी - आसाम
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क्रमांक - 026

                          नैनों की भाषा

वह मुठ्ठी में पैसों को दबाये बोझिल कदमों से घर की ओर चला जा रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था घर पहुँच कर बच्चों और पत्नी को क्या जवाब देगा।  सांत्वना देने के लिए अब माँ भी घर पर नहीं है। पत्नी की किचकिच से तंग आकर माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आया था। मूर्ति बनाने की कला उसे विरासत में मिली थी। वह मूर्ति बनाता था और माँ हमेशा की तरह मूर्ति के चेहरे की भाव भंगिमाओं को सधे हाथों से उकेरती थी। पत्नी का काम मूर्ति के जेवरों और कपड़ों की सज्जा करना था। दशहरा पर दुर्गा जी की मूर्तियों की बिक्री से उसका साल भर का राशन और सभी के कपड़ों का इंतजाम हो जाता था पर इस बार... 
घर पहुँचते ही पत्नी ने मुस्कुरा कर चाय का गिलास पकड़ाया। 
"सुनो! इस बार मैं माँ के हिस्से की दो साड़ियाँ यानि चार साड़ियाँ लूंगी" इठलाती हुए बोली। 
"चार क्या इस बार तो मैं एक भी साड़ी न दिला पाऊँगा।"
" क्यों "
" इस बार आधी मूर्तियांँ भी नहीं बिकी।" कहते हुए चेहरे दर्द उभर आया
"ऐसे कैसे हो सकता है हमारी मूर्तियाँ तो हाथों- हाथ बिक जाती थी।" 
"हाँ, पर लोगों का कहना है इस बार  मूर्तियों की आँखों में वो आकर्षण नहीं है जो हमेशा रहता था। उदास आँखों वाली मूर्तियाँ उन्हें नहीं चाहिए।" 
"पर चेहरा तो आपने हमेशा की तरह ही बनाया था फिर क्यों...? "
जब भी आँखों में रंग भरता हूँ तो माँ की आँखे सामने आ जाती हैं। 
"जब माँ की आँखों में उदासी हो तो दुर्गा माँ कैसे मुस्कुरा सकती हैं।" ००

                             - मधु जैन
                      जबलपुर - मध्यप्रदेश
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क्रमांक - 027

                              नौकरानी

  "मम्मी ,आपने अपनी फेवरिट साड़ी मेड को क्यों दे दी?"
  " अरे ! वैसा ही साड़ी मैंने अपने सहेली की मेड को आज पहने देखा।"... चेतना ने अपनी बेटी से कहा ।
  "तो क्या हुआ ,आपकी सहेली ने ही उसे दिया होगा।"
  " जो भी हो, जो मेड पहने, वैसी साड़ी मैं तो नहीं पहनूँगी।"... चेतना बोली ।
  "यह क्या बात हुई मम्मी, मेड क्या इंसान नहीं है? उसे हमारे जैसा पहनने और खाने का हक नहीं है?"
  " वह कुछ भी करे, मैं उन्हें कहाँ रोकने जा रही हूँ। फिर भी उनमें और हममें कुछ तो फर्क है  और देखो तो आज ही मैंने अपनी मेड को इतनी महंगी साड़ी दी और आज ही उसने छुट्टी मार ली। कह रही थी कि उसकी बहन को शादी के लिए देखने लड़के वाले आ रहे हैं। "
    "अरे,जाने दो न मम्मी। एक दिन खुद से घर का काम कर लो ।" यह कहकर उसकी बेटी कॉलेज चली गई। बेटी के जाने के बाद चेतना घर के सारे कामों को निपटाने में लग गई । उसे महसूस हो रहा था कि मेड के झाड़ू- पोछा, बर्तन- चौका करने से उसे कितना आराम है ।सारा काम करके उसने पल भर के लिए दम भरा तो उसकी नजर किचन के स्लैप पर पड़े चने के साग पर पड़ी।हरा-हरा चने का साग का पहाड़ उसे मुंह चिढ़ा रहा था।जाड़े में चने का साग और भात खाने में जितना आनंद आता है, उससे ज्यादा कच्चा साग तोड़ने और उसे बनाने में हालत पतली हो जाती है। घर के काम से थके- मांदे शरीर की रही-सही कसर चने की साग ने निकाल ली ।घर का काम और खाना बनाते-बनाते दोपहर हो चुका था। उसने अभी तक स्नान भी नहीं किया था ।तभी दरवाजे की बेल बजी। अस्त-व्यस्त कपड़े, बिखरे बाल, पस्त सा मुखड़ा लिए उसने दरवाजा खोला। सामने उसकी मेड उसकी ही दी हुई साड़ी पहनकर बनी-ठनी खड़ी थी।ढ़ंग से पहनी हुई खूबसूरत साड़ी,शैभ्पू किये लहराते बाल,काजल,लिपस्टिक-बिन्दी लगाये वह कहीं से भी मेड नहीं दिख रही थी। अपने हाथो में पकड़े मिठाई का डब्बा उसे थमाते हुए वह बोली,"खुशखबरी है मेमसाहब, मेरी बहन की शादी तय हो गयी है।"
अभी चेतना कुछ कहती कि तभी एक कोरियर वाला भी पार्सल लेकर उसी समय आ गया और पार्सल मेड को देकर, उससे कहा," मैडम यहाँ साइन कर लीजिए।"
   " मैडम मैं नहीं ,ये हैं।"... चेतना की मेड चेतना की तरफ इशारा करते हुए कोरियर वाले से बोली। ००
                       - रंजना वर्मा उन्मुक्त
                            राँची - झारखंड
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क्रमांक - 028

                            जिम्मेदारी 

देश में रोजमर्रा के जीवन में उपयोगी और खाने-पीने की जरूरी चीजों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के सम्बन्ध में एक लोकप्रिय टी.व्ही. चैनल का एंकर गली-गली घूम-घूम कर लोगों से उनकी प्रतिक्रियाएँ ले रहा था। इसी कड़ी में वह हमारे मोहल्ले के रामू काका से पूछा, "नमक, आलू, प्याज, लहसून, दाल जैसी जरूरी खाद्य पदार्थों की बढ़ती हुई कीमत के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं ?''
रामू काका ने तपाक से कहा, "देश की सरकार को। और किसे ? जमाखोरों पर कोई नियंत्रण नहीं है सरकार का।"
पत्रकार ने फिर से पूछा, "अच्छा, आप हमें ये बताइए कि इस बढ़ती हुई महंगाई से निपटने के लिए आप क्या करते हैं ?"
रामू काका ने कहा, "वही जो सब लोग करते हैं।"
पत्रकार ने पूछा, "क्या करते हैं सब लोग ? कृपया हमारे दर्शकों को बताइए।"
रामू काका ने ज़रा झिझकते हुए कहा, "जैसे ही किसी चीज की कीमत बढ़ने लगती है या मीडिया के माध्यम से बढ़ने की सूचना मिलती है, हम लोग उसकी तीन-चार महीने की स्टॉक खरीदकर रख लेते हैं।"
पत्रकार ने जुबानी पलटवार किया, "और आप लोगों की इस जमाखोरी की जिम्मेदार हमारे देश की सरकार है ?" 
रामू काका बगलें झाँकने लगे थे। ००
                          -  डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा 
                               रायपुर - छत्तीसगढ़ 
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क्रमांक - 029

                               संकल्प डे

      शिवन्या जब से अपने विद्यालय से लौटी थी तब से अपनी दादी की गोद में आँख बंद किए हुए लेटी हुई थी। दादी ने भी उसे कुछ नहीं कहा बस उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को देखती रही।
           शिवन्या के मन में कई बातें चल रही थीं। माता-पिता अपने कामों में ऊँचाइयाँ पाने के लिए सुबह के गए रात को लौटते। खाने की मेज पर अँग्रेजी में खिटपिट करके शिवन्या से दो-चार बातें पूछ कर अपने कर्तव्यों से मुक्त हो लेते। उसे घर और विद्यालय दोनों जगह हिन्दी बोलना मना था। बस दादी की गोद और उनसे बात करना ही उसे सुख देता था।
            जब बहुत देर हो गई और शिवन्या गोद से उठी ही नहीं तो दादी प्यार से उसका सिर सहलाते हुए कहने लगी….” शिवि बेटी! मेरी लाडो! आज किस बात से इतनी परेशान है? जरा मुझे भी तो बता। एक चुटकी में सब समाधान कर देगी तेरी जादूगर दादी!”
             सुनते ही शिवन्या उठ बैठी पर गंभीर ही बनी रही।
      दादी के प्यार से जमी बर्फ पिघली तो बोली…” विद्यालय में जब हिंदी बोलना मना है तो फिर हिंदी डे क्यों मना रहे हैं? और तो और लिख भी ले जाना है हिंदी डे पर आप क्या संकल्प लेंगे? मैं क्यों लिख कर ले जाऊँ?”
          “ मुझे तो इसमें कोई मुश्किल नहीं दिखाई दे रही है। संकल्प क्या लेंगे यही तो लिखने के लिए कहा है न। तो बस तुम वही लिखो जो करना चाहती हो।”
         “ और लिखने के बाद उस संकल्प को पूरा करने का मन किया तो?”
             “ वह तो तुम पर होगा मेरी लाडो! तुम अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति  से उसे कैसे पूरा करोगी बस यही तो सोचना होगा। समझी…पहले संकल्प फिर अमल।”
           शिवन्या को अपना समाधान मिल गया था। उसने कागज निकाला और लिखा…. हिंदी दिवस पर मैं संकल्प लेती हूँ  मैं नित्य हिंदी का एक समाचारपत्र पढ़ूँगी। उसमें पढ़ी महत्वपूर्ण बातों की चर्चा रात को खाने की मेज पर अपने माता-पिता से हिंदी में करूँगी और अपने अनुभवों को सोने से पहले हिंदी में ही डायरी में लिखा करूँगी।
             शिवन्या की मुस्कुराहट देख कर दादी समझ गई थी उसे प्रश्न का उत्तर मिल गया है।००
 ‌                          - डॉ भारती वर्मा बौड़ाई
                              देहरादून - उत्तराखंड
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क्रमांक - 030

                                  ठेकेदार 

मार्निंग वाॅक से घर की ओर वापस आते समय मैंने दूर से एक व्यक्ति को पास आते देखा।मुझे लगा कि वह कुछ बुदबुदाता हुआ आ रहा है। शायद ईयरफोन पर किसी से बातें कर रहा है।मगर जब पास आया, तो लगा कि वह हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए चल रहा था।
मैं लिफ्ट में घुसा, तब भी वह लगातार पाठ करता रहा।एक महिला भी लिफ्ट में चढ़ गयी।
" अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहां जन्म हरि भक्त कहाई। "
वह पंक्तियां बोलते हुए कभी उस महिला की ओर , तो कभी मेरी ओर देखे जा रहा था।हम चुपचाप उसे सुन रहे थे।
थर्ड फ्लोर पर लिफ्ट रूकी। दरवाजा खुला और मैं लिफ्ट से बाहर निकलने लगा, तो उसने जोर से मुझसे कहा - "' राम का नाम ले लिया करो। इससे नुकसान नहीं होगा। "
अनायास उसके बोलने पर मुझसे रहा नहीं गया और मैं बोल पड़ा - " तुम ले रहे हो न ? तुम्हारा तो नुकसान नहीं हो रहा ? दूसरों के मुंह में उंगली डालकर राम नाम निकलवाओगे क्या ? "
जाप बंद कर वह वह मेरा मुंह देखने लगा। फिर मैंने पूछा - " तुम करते क्या हो ? "
" मैं एक बिल्डर हूं। कंस्ट्रक्शन का बिजनेस है हमारा। " उसने अति आत्मविश्वास से इतराते हुए कहा।
" अच्छा ! तो तुम बिजनेस करते हो ? लगता है साथ ही धर्म का भी बिजनेस करते हो ? तुम जैसे लोग ही न, आजकल जबरदस्ती " जय श्रीराम " के नारे लगवाते हैं, और नहीं बोलने पर उसे जान से मार देते हैं ? " - बोलते हुए मैं लिफ्ट से निकल गया। वह विस्फारित नेत्रों से साथ वाली महिला को देखने लगा। 
लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हो चुका था। ००
                                   - विजयानंद विजय
                                        नालंदा - बिहार 
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क्रमांक - 031

                          वापसी

"इतनी सुबह फावड़ा ले कर कहाँ चल दिये बीरू भईया?"
"नदी किनारे नया घर बाँधना है."
"वहाँ कहाँ तुम्हारी ज़मीन है जो घर बाँधोगे? खेत तो सारे इधर हैं."
"अब हम दोनों बुढ़हा गये हैं न, खेत बिटवा संभालेगा. हम नदी के पास साग-सब्ज़ी बो कर वहाँ पास की गुफ़ा में रह लेंगे."
"अच्छा-ख़ासा घर छोड़ कर गुफ़ा में कौन रहता है?कौन से ज़माने की बात कर रहे हो भईया?"
"बिटवा शहर से पढ़ कर आया है न, मशीनी खेती करेगा. हम बूढ़ा-बूढ़ी सब्ज़ियाँ उगा लेंगे. अपने मोबाइल में उसने एक रील दिखाई  कि कैसे ईरान देश में कुछ लोग किसी पठारी झरने के आस-पास की गुफ़ाओं में, वहीं के पत्थरों को जोड़-जोड़ कर मिट्टी की भरावन से खिड़की-दरवाज़ा बना कर गुफ़ाओं में रहते हैं."
"ओहो, तो यह नया ख़्याल आया है बीरू भईया, तो चलो एक फावड़ा लिये मैं भी चलता हूँ.वैसे भी बहू-बेटे का परिवार बढ़ जाने से घर छोटा पड़ने लगा है."
"अब जब रहने के लिए धरती कम पड़ेगी तो हम सब गुफाओं की तरफ़ ही वापस दौड़ेंगे." ००
                           - शील निगम 
                         मुम्बई - महाराष्ट्र
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क्रमांक - 032
                               मानो तो

मेघा को समझ में नहीं आ रहा था कि इस नवरात्र अपने घर कन्या भोजन के लिए किसे आमंत्रित करे। अभी एक महीना ही तो हुआ था उन्हें स्थानांतरण के पश्चात दिल्ली आए हुए। अभी आसपड़ोस में सभी के साथ ठीक से जानपहचान भी नहीं हो पाई थी। उसके पुराने शहर में तो पूरी कॉलोनी में इतनी बच्चियाँ थीं कि नौ कन्या क्या, दर्जन भर से भी अधिक कन्याएँ हो जाती थीं। छोटी-छोटी वे कन्याएँ तैयार होकर जब पहुँचती थीं तब साक्षात देवी का स्वरूप ही लगती थीं। लेकिन यहाँ तो...
             तभी उसकी कामवाली ने सुझाव दिया -
"अगर आप कहें तो मैं हमारी बस्ती से नौ कन्याएँ ला सकती हूँ।"
         प्रस्ताव तो उत्तम था। गरीब के बच्चों को खिलाना तो और भी अधिक पुण्य का काम होगा। लेकिन शायद अपने अंतर्मन के मैल से ही डरती थी।
'पता नहीं बस्ती की उन बच्चियों के प्रति वैसा आदर भाव उत्पन्न होगा कि नहीं...'
मन में उठते इन विचारों से ही सहम गई मेघा। मन को पावन करने का प्रयास करते हुए अभी उन कन्याओं की प्रतीक्षा कर रही थी। 
        सही समय पर उसकी कामवाली नौ कन्याओं को लेकर पहुँच गई। उन्हें देखकर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वही लड़कियाँ हैं जो अपनी-अपनी माँ के साथ कभी कभार दिख जाती हैं। 
           उन कन्याओं के स्वागत और भोजन की पूरी प्रक्रिया बिलकुल वैसे ही श्रद्धाभाव से संपन्न हुई जैसे पहले हुआ करती थी। कन्या पूजन की विधियों के दरम्यान अपनी पावन भावनाओं को देखते हुए उसे बार-बार गाने की वही पंक्तियाँ याद आ यही थीं --
"मानो तो मैं गंगा माँ हूँ ..." ००
                                      - रूणा रश्मि 'दीप्त'
                                         रांची - झारखंड
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क्रमांक - 033
                                फल

       उन दिनों अपने गांव से दूर कस्बे के सरकारी कालेज में दाखिला लेने के कारण वह वहीं किराए का कमरा लेकर रह रहा था।बड़े से मकान में पांच परिवार और दो विद्यार्थी किराए पर रहते थे जिनमें एक वह भी था।
पड़ोस में कुछ दिनों से खाली चल रहे घर में एक दिन एक नवविवाहित जोड़ा किरायेदार के रुप में आया। बोलचाल में वे पति-पत्नी कहीं दूर मैदान के लग रहे थे।
"हम आपके पड़ोसी, वनारस से आए हैं। मैं एस के हांडा और ये मेरी पत्नी नीता" उसका नाम,कक्षा और कालेज का नाम पूछने के बाद पड़ोसी ने अपना परिचय दिया था।
"मैं पोलीटेक्निक में पढ़ाने आया हूं।"
"जी "
"हम यहां पर अकेले आए हैं। थोड़ा-बहुत सामान की जरूरत पड़ेगी तो हमारी मदद कर दोगे न ?"
" जी"
पहली बार वनारस से इतनी दूर पहाड़ में आने से वे कुछ असहज से लगते थे लेकिन धीरे-धीरे वे राजेन्द्र के साथ घुल-मिल गए।जब जरुरत पड़ती वे उसे पुकारते और वह उनकी जरुरत का सभी सामान लाकर दे देता।वे जब तक रहे यह सिलसिला चलता रहा।
         गर्मी की छुट्टियों में वह गांव गया था।उसी दौरान उनका अन्यत्र तबादला हो गया।उसके लौटने तक वे कस्बा छोड़कर जा चुके थे।
समय गुजरता रहा।इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने के बाद उसका पोलीटेक्निक में दाखिला हुआ।फार्मेसी अंतिम वर्ष की लिखित परीक्षा देने के बाद अब प्रयोगिक परीक्षा रह गई थी।उसी की तैयारी चल रही थी।
एक दिन पता चला कि दो दिन बाद ही उनकी प्रयोगिक परीक्षा होगी और परीक्षक कोई एस के हांडा आ रहे हैं।परीक्षक का नाम सुनते ही उसे अपने पड़ोस में रह रहे हांडा जी का स्मरण हो आया था।'इतने दिनों बाद क्या हांडा जी उसे पहचान लेंगे ?' बार-बार यही सोच रहा था।
परीक्षा के दिन मौखिकी के लिए एक-एक कर उन्हें भीतर बुलाया जा रहा था।अपनी बारी पर भीतर जाकर देखा- गोरे चिट्टे,मझले कद और घनी मूंछों वाले वही हांडा जी कुर्सी पर बैठे हुए थे। उसने नमस्ते किया तो बोले-"बैठो!" और वह बैठ गया।
"तुम कुछ जाने पहचाने से--" उसकी ओर गौर से देखने पर हांडा जी के मुंह से फूटा।
"जी, भंडारी भवन--मैं राजू!"
"अरे राजू--?"इसके बाद उन्होंने उससे सारे मुहल्ले व आसपास की पूछताछ की।औपचारिकता के लिए दो सवाल पूछे और फिर उसे जाने को कहा। 'नेकस्ट' कहते हुए उन्होंने दूसरे परीक्षार्थी को भीतर बुलाया।
परीक्षा परिणाम आया तो वह सम्मान सहित उत्तीर्ण हुआ था।हांडा जी उसे बहुत ही अच्छे अंक देकर गए थे।उसकी उम्मीद से कहीं बहुत ज्यादा।हांडा जी और उनकी पत्नी का चेहरा बहुत दिनों तक उसकी आंखों के सामने तैरता रहा।हांडा जी से इस तरह मिलने के बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं था।उसे लगा सचमुच यह उसकी निस्वार्थ सेवा का ही प्रतिफल रहा होगा। ००
                         -  महावीर रवांल्टा 
,                         पुरोला - उत्तराखंड
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क्रमांक :- 034
                        मीटू:एक दिशा

घर की सफाई के दौरान मिले पुराने एलबम को शुचि बड़े ध्यान और प्रसन्नता के साथ देख रही थी।इस एलबम में उसके बचपन की फोटो और परिवार के लोगों के अलग अलग मौकों की फोटो भी थी।
        अचानक एक जगह शुचि की आँखें ठिठक गयीं।होली के पर्व पर रंग से भीगी उसकी माँ बड़ी सुंदर दिख रही थी, पर ये पीछे से उसे किसने दबोच रखा था...जिसकी तकलीफ माँ के चेहरे पर साफ दिख रही थी।
         वह माँ के पास एलबम लेकर पहुंच गई और उस आदमी के बारे में पूछने लगी।माँ ने ध्यान से वह फोटो देखी तो अनचाहा दर्द उसके चेहरे पर आ ही गया। "वो कोई होगा ..पता नहीं",बस इतना ही बोल पाई।
         जब शुचि पीछे ही पड़ गयी तो उसने बताया कि वह उसके पापा का एक पुराना दोस्त था।"तो मम्मा आपने उसकी शिकायत नहीं की नहीं..",शुचि ने पूछा और जवाब न में मिलने पर बड़े जोर से बोली..."तो अब करो...मीटू में"।
         " नहीं बेटी, उस घटना को पंद्रह साल हो चुके हैं,तब से न तो हम मिले और न मिलने की कोशिश की।आज हम दोनों के परिवार अपने सम्मान के साथ रह रहे हैं।यह मीटू का तूफान  मेरे अपमान का दर्द तो न खत्म कर सकेगा .....हाँ हमारे परिवार की शांति जरूर बहा ले जायेगा"।
            उसे अपनी माँ की बात अच्छी नहीं लगी।वह मुँह बनाकर वहाँ से जाने लगी।तभी माँ ने एलबम उसके हाथ से लिया और वह फोटो निकालकर फाड़ दी और कहा, "शुचि यह चैप्टर तो आज क्लोज हो गया, लेकिन अगर कभी तुम्हारे साथ कोई ऐसी अप्रिय घटना हो तो तुम मीटू का सहारा जरुर लेना ...लेकिन, यह बताने के लिए नहीं कि कब किसने तुम्हारे साथ क्या गलत किया,बल्कि यह बताने के लिए कि उस गलत सोच को तुम तुरंत सुधार कर एक नयी दिशा दे सकती हो,उसका खुला विरोध करके।"
यह कहकर शुचि को उसकी माँ ने अपने सीने से लगा लिया और माँ की ठहरी हुयी साँसों के साथ शुचि को एक नयी दिशा दिखने लगी। ००
                                     - पी एस खरे "आकाश" 
                                     पीलीभीत - उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 035

                                चिथड़े

 18 साल के जवान बेटे की मृत्यु के बाद पुलिस उस ट्रक ड्राइवर को पकड़ कर लेकर आई जिसके ट्रक से टकरा कर मेरे बेटे और उसके दोस्त की गाड़ी उल्ट गई थी और ऑन द स्पॉट दोनों की मृत्यु हो गई थी। 
ट्रक ड्राइवर को देखकर मैंने और मेरे पति दोनों ने कह दिया कि इस को सजा देने से हमारा बेटा वापिस  लौट नहीं आएगा। हम इसे माफ करते हैं। आप इसे जाने दीजिए। 
बात करते-करते अचानक मेरा ध्यान पुलिस वाले के गले में लटकती सोने की चेन और उसमें पड़े डायमंड के पेंडेंट पर चला गया और दूसरे पुलिस ऑफिसर के हाथ में बंधी घड़ी पर, जो दोनों ही मेरे बेटे की थी और आखिरी समय में उसने पहनी हुई थी। 
हमने उसे भी अनदेखा कर दोनों पुलिसवालों को भी मन ही मन  माफ कर दिया और कुछ ना कहा। परंतु कहीं बार-बार मन और चेतना चीख चीख कर पूछ रही थी, पुकार रही थी, कहां है इंसानियत?कहां...आखिर कहां?
इंसानियत के चिथड़े तो इंसानरूपी हैवानों के गले में लटके और कलाई पर बंधे हुए थे। ००
                             -  रेनू चौहान 
                          जनकपुरी - दिल्ली
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क्रमांक - 036

                                    निर्णय                       

           एक दिन की बात है ।घृणा और प्रेम में बहस छिड़ गई । बड़ा कौन हैॽ तू या मैं ॽ  घृणा ने अपना घृणित रूप दिखाया। जमकर कोसा।गालियां बकीं।प्रत्युत्तर में प्रेम मात्र मुस्कराता रहा,  अनन्तता घृणा ने प्रेम का महत्व स्वीकार कर अपनी हार मान ली ।  निर्णय हो चुका था । ००                     

                    -  शशांक मिश्र भारती  

                   शाहजहांपुर - उत्तर प्रदेश    

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                              साज़िश

विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं को रखा जाना था। हालाँकि नवीन ने निजी तौर पर पढ़ाई की, अपितु उसकी योग्यता उत्कृष्ट थी। उसे इसके लिए चुने जाने की सौ फीसदी उम्मीद थी। इंटरव्यू का दिन आ गया। शार्टलिस्ट के बाद केवल चार उम्मीदवार बचे थे। चयन समिति की मुखिया एक घमंडी महिला थी, जिसका एक छात्र भी उम्मीदवार था। उसकी योग्यता तो ठीक-ठाक थी, लेकिन वह उस महिला के अधीन पीएचडी कर रहा था, जबकि नवीन का अभी तक पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) भी नहीं हुआ था। इंटरव्यू के बाद समिति की मुखिया ने नवीन को चुन लिया, लेकिन साथ में यह नोटिंग भी दे दी कि अगर आपका रजिस्ट्रेशन हो गया है तो आप रिसर्च स्कॉलर के तौर पर विभाग में हाजिर हो जाइए। साथ ही उन्होंने अपने छात्र को प्रतीक्षा सूची में रख लिया, ताकि यदि चयनित छात्र उपस्थित न हो तो उसे मौका दिया जा सके। यह तो स्पष्ट ही था कि इस नोटिंग के कारण नवीन उपस्थित नहीं हो सकता था। उसे एक साजिश के तहत मक्खन से बाल की तरह बाहर कर दिया गया था। ००
                            ~प्रो. नव संगीत सिंह 
                               पटियाला - पंजाब 
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क्रमांक - 038

                           निर्दयी रिवाज़  

  ख़ूबरूरत  पुलिस ऑफ़िसर सुनयना ने आज वर्षो बाद जैसे ही सुनील को उसकी पत्नी के हाथ मे हाथ डाले देखा तो  अपने निर्दयी अतीत को  याद कर अत्यंत  क्रोधित सी हो गयी ।
आठ वर्ष पूर्व  अपने  प्रियतम सुनील से शादी  के कार्ड को  देखकर सुनयना खुशी से नाच  रही थी ,कालेज के सहपाठी व सुनयना पर दिलोजान से फिदा  सुनील के साथ उसका विवाह जो हो रहा था... जनम जनम साथ निभाने   के वादे जो पूरे होने को थे ।
आज वह शुभ दिन आ ही गया फरवरी की चौबीस तारीख सुनयना व सुनील के जीवन के सबसे बेहतरीन नए बसन्त को लाने वाली थी ,,बारात आ गयी ,,मन ही मन खुशी से फूली न समा रही सुनयना को एक एक पल काटना मुश्किल पड़ रहा था ।
जयमाला की रस्म हर्ष पूर्वक  सम्पन्न हो गयी थी  ,अब जन्म जन्म निभाने को सात फेरों के बंधन की बारी आ गयी ,,तभी सुनील के पिता नारायण दत्त जी ने  सुनयना के पिता  रवि दत्त जी से कोने में ले जाकर  कहा देखिये जी वो दहेज के वादे के अनुसार आप अभी भी पांच लाख रुपये पूरे नही कर पाए अतः पैसे पूरे कर दीजिए तभी फेरे पड़ेगें । सुनयना के पिता हाथ जोड़ने लगे उनके पैर गिर गए ,समधी जी आगे एक एक पैसा चुका दूंगा अभी किसी तरह शुभ कार्य सम्पन्न हो जाने दीजिए मेरी इज्जत का सवाल है ।
लेकिन सुनील के पिता अत्यंतनिर्दयता से  कठोरतापूर्वक  फेरे  की रस्म को तब तक मना कर  दिया जब तक दहेज़  की रकम पूरी न मिल सके  ,वह सोच रहे थे कि  ये लोग इज्जत जाने के डर से कैसे भी पूरा  पैसा देंगे ही देंगे इनकी लड़की जो फँसी है मेरे बेटे की दीवानी ।
तभी अचानक सुनयना ने अपने भावी ससुर के समक्ष पिता को रोते गिड़गिड़ाते देख लिया  ,वह तुरन्त वहाँ आ गयी और दोस्तों में घिरे सुनील को बुलाने का इशारा किया ।सारी स्थिति जानने पर सुनयना ने सुनील से ये शिकायत की ,कि अपने पिता को समझाइए    परन्तु सुनील ने अपने पिता का विरोध करने से मना कर दिया और कहा कि मैं उनकी मर्जी के बगैर विवाह कैसे कर सकता हूँ ।
बस फिर क्या था सुनयना के अंदर की मासूम प्रेमिका मर गयी और बन गयी महाकाली ।तुरन्त ही स्वार्थी सुनील व उसके  लालची पिता को पूरी भीड़ के आगे फटकार लगाकर कहा कि मैं इस निर्दयी रिवाज़ का खंडन करती हूँ और तुम जैसे घटिया  प्रेमी का परित्याग ।उसने  पुलिस के हवाले करने की धमकी दी ,तब  पुलिस के डर से वे लोग माफी मांगने लगे व  विवाह को तैयार भी हो गए , परन्तु स्वाभिमानी सुनयना ने उन्हें पुलिस के जिम्मे तो नही  किया  लेकिन विवाह करने से स्वयम इनकार कर  बेज्जत करके भगा दिया । ००
                    -  सुषमा दीक्षित शुक्ला 
                        लखनऊ -उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 039

                            सबसे अमीर
-
नौ वर्षीय अन्नू अपनी माँ के साथ पाठशाला जा रहा था। पाठशाला जाने के लिए उसे रोज आधा घंटा चलना पड़ता था। वह जब भी किसी को स्कूटर ,कार या साइकिल में देखता तो उसे लगता यह सब मेरे पास क्यों नहीं है? हालांकि उसकी माँ ने उससे वादा किया था कि वह जब बारह साल का हो जाएगा तब उसे साइकिल अवश्य दिला दी जाएगी। पर अनु उनकी बात सुनकर बहुत अधिक खुश नहीं हुआ था।
आज  वह जब अपनी माँ के साथ पाठशाला जा रहा था तो उसने अपनी माँ से कहा, "कितना अच्छा होता हम लोग भी अमीर होते और हमारे पास भी गाड़ी होती। आपको मेरे स्कूल में साफ सफाई का काम भी नहीं करना पड़ता।"
अनु की माँ ने बड़े प्रेम से हँसकर कहा, "बेटा मैं तो तुम्हारे स्कूल में इसलिए काम कर रही हूँ ताकि हम लोग साथ आ जा सके। काम तो कहीं भी कर सकती थी। जहाँ तक अमीर होने की बात है हम लोग सचमुच अमीर ही हैं। रहने के लिए छोटा सा घर है, सभी स्वस्थ हैं और हम सभी मेहनत करके सुख की जिंदगी गुजार  रहे हैं। स्कूटर , कार जब तुम बड़े हो जाओगे तो खरीद ही लोगे ।" 
माँ के इस जवाब से अन्नू ज्यादा खुश नहीं हुआ ।  उसने कहा , पर हम लोग अमीर कैसे हुए?"  तब उसकी माँ ने कहा, "हम  लोग अच्छे से सुन सकते हैं, अच्छे से देख सकते हैं, अच्छे से बोल सकते हैं ,अच्छे से चल सकते हैं , दौड़ सकते हैं । दोनों हाथों से काम कर सकते हैं । कभी तुमने उन लोगों के बारे में सोचा है जो देख नहीं सकते ,सुन नहीं सकते ,बोल नहीं सकते ,अच्छे से चल नहीं सकते और हाथों से काम भी नहीं कर सकते । भगवान ने हम लोगों को सब कुछ दिया है तो हुए न सबसे अमीर।"
माँ की बात सुनकर अन्नू का बालमन खिल उठा । उसने गौर से अपने आप को निहारा। फिर हँसकर अपनी माँ से कहा,  " हाँ माँ , मैं हूँ सबसे अमीर। माँ ने प्यार से अन्नू का गाल चूम लिया। ००
                     - आभा दवे 
                    मुंबई महाराष्ट्र 
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क्रमांक - 040

                        जादू की झप्पी

कविता देखो रोहन मुझ से  कैसे उखड़ा सा है?उस की ग़लती पर कितनी बार समझाया था पर नहीसमझ रहा था, मैनें क्या थोड़ी सी  गुस्से में बात की तो तभी से मुंह फुलाकर बैठा है ।
लगता नहीं कि ये वही रोहन है जो बचपन में एक पल भी मुझ से दूर नहीं रह सकता था।"
पर आपको इतना कुछ कहनें की जरूरत ही क्या थी,अब वह बड़ा हो गया है।" कविता बोली।
"वह क्या इतना बड़ा हो  गया है?
मैं अब उसे कुछ कह भी  नहीं सकता.पहले तो वो ऐसा नहीं था।"
"हां आपकी बात बिल्कुल सही है पर पहले आप भी तो ऐसे नहीं थे,उस की ग़लती पर उसे डांटते भी थेऔर फिर कुछ समय बाद जाकर उसे गले भी लगा लेते थे।
  बड़ा है गया तो क्या? उसे अब हमारे प्यार की जरूरत नहीं...जाकर उसे एक प्यार भरी जादू की झप्पी  दे दिजिए। फिर देखिए कैसे नहीं मानता। । ००
                                        - बबिता कंसल
                                            दिल्ली
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क्रमांक - 041

                     पेट सब कुछ सीखाता है

दो बांसों के दो सिरों पर बांधी रस्सी पर एक युवक अपने हाथों में लंबा बांस लेकर ऐसे चल रहा था जैसे कोई मटकती हुई नार सड़क पर जा रही हो। रामू की नजर युवक पर पड़ी और एक टक उसको देखता रहा। उसके हुनर को देखकर रामू चकित था। युवक कभी थाली पर चलता कभी पैरों के बल चलता।
रामू से रहा नहीं गया। सीधा युवक के बाप के पास जाकर पूछा कि तुम्हारा बच्चा तो कमाल के हुनर दिखा रहा है। यह कला तुमने कैसे सीखी? गरीब के पिता ने कहा- बाबूजी, यह हुनर पेट ने सिखा दिया। पापी पेट का सवाल है। गरीब इंसान हैं। बच्चा पढ़ा लिखा नहीं, मैं भी नहीं पढ़ा, नौकरी मिली नहीं। पेट भरने के लिए कोई कला तो दिखानी पड़ेगी। हमारे पूर्वज इसी कला से पेट भरते आए। सो हमने सोचा कि क्यों नहीं इसी हुनर के जरिए पेट पाल ले। इस प्रकार यह हुनर काम आ रहा है। रामू ने गरीब व्यक्ति की बात सुनकर दांतो तले उंगली दबा ली कि भगवान हर इंसान में कोई न कोई हुनर देता है जिसके बल से वह नाम कमाता है। ००
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                                      कनीना- हरियाणा
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क्रमांक - 042
                          जीवन - साथी

 "अरे! पंकज...क्या हाल - चाल है भाई?"
  "बिलकुल बढ़िया पवन भाई"
  "तुम्हारे सभी बच्चे तो अपने - अपने काम में व्यस्त हैं, फिर भी तुम अच्छे खासे नज़र आ रहे हो?"
"सब मेरे जीवन - साथी का कमाल है।"
"ये तुम क्या कह रहे हो?, अभी तो भाभी को गुज़रे हुए साल भर भी नहीं हुए और तुमने दूसरी..."
"अरे! मेरी बात तो सुनो" पंकज कुछ सफाई देना चाहा
"रहने दो - रहने दो...लेकिन कब की?"
"भाई मेरी बात तो सुन"
"मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुनना है, तुम्हे यह सब और इस उम्र में करते हुए शर्म भी नहीं आयी?।"
"पवन भाई बात यह है कि..."
"मैं सब समझ गया, मुझसे सफाई देने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
"तुम क्या समझ गए?"
"यही कि दूसरी साँस भी लेते थे तो मुझे पता चल जाता था, लेकिन इतनी बड़ी बात छुपाया वह भी मुझसे?। तुम्हारे बच्चे, पड़ोसी, नाते - रिश्तेदार सब सुनेंगे तो क्या कहेंगे कि बुड्ढा सठिया गया है?।"
"मेरे बच्चों को और सभी को पता है इस बारे में, लेकिन मेरी बात तो सुनो।"
"अब क्या सुनूँ? तूने बचपन से लेकर अभी तक की दोस्ती का गला घोंट दिया है।"
पंकज ने पवन के मुँह पर हाँथ रखकर जोर से बोला..."अब अपना मुँह बंद रखना नहीं तो सचमुच में गला घोंट दूँगा वह भी अभी के अभी।"
"ले घोंट...अब बचा ही क्या रह गया"
"तू मेरे जीवन - साथी के बारे में जानना चाहता है ना?...तो सुन... मेरा जीवन - साथी है मेरा स्वास्थ्य, जिसका मै अब पहले से जियादा ध्यान रखता हूँ और वह भी मेरा बेहतर ध्यान रखता है।"
पवन अपना माथा पीटते हुए..."धत्त तेरे की" ००
                               - सुधाकर मिश्र "सरस"
                                      महू - मध्यप्रदेश
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क्रमांक - 043

                          अब और नहीं

समाचार-पत्र लेकर बैठा ही था कि डोर बैल घनघना उठी, सोचा छुट्टी का दिन है कोई मित्र होगा। दरवाजा खोला तो पाया,लाल हवेली वालों का बूढ़ा नौकर है। हवेली की तरह ही बेचारा जरजर अवस्था में। बोला-" कँवर साहेब ने बुलाया है।"कहते ही नौकर जा चुका था। पत्नी जो आँगन में ही बैठी थी माथे पर बल ड़ाले बोली--" जूए में मोटी रकम हार गया होगा कर्ज चाहिये, इसीलिये बुलाया होगा,हुंम्म् बडा़ आया कँवर साब।"  "अरे भागवान!गुस्सा क्यों करती हो बुलाया है तो जाना तो होगा ही।"
      " जाओ, पर कहे देती हूं उस जुआरी के बहकावे में मत आना। " पत्नी की हिदायत सुन मैं घर से चल पड़ा।कंवर सुमित अपनी जूए की लत के कारण पुरखों की सारी जमीन बेच बेच कर खा चुके थे। दादा परदादा के जमाने की रंगीनियाँ खत्म हुई,नौकर चाकर बिना पग़ार के कब तक साथ देते,दोनों बड़े भाई अपने परिवार को ले बाहर में बस गये। 'कँवर साहब' की पूँछ लगाये अब तक अपने बीवी बच्चों के साथ यहीं पड़े थे।
        हवेली के आगे काफी लोग जमा थे।तभी कँवर साब बूढ़े नौकर के साथ कलफ़ चढ़े सफेद कुर्ता-पायजामा पहने बगुला बने बाहर आये। सभी हैरान माज़रा क्या है?पर कुछ समझ नहीं आया।कंवर साब ने मुंह खोला --" आप सब जानते है हमारे दो बेटे हैं, कल ही एक कन्या ने भी  हमारे यहाँ जन्म लिया है।अपने शौंक के कारण हमने कभी परिवार पर ध्यान नहीं दिया,पत्नी ने बहुत कष्ट उठाये,अपनी आत्मा की आवाज को हमेशा नकारता रहा। किन्तु अब और नहीं।" फिर थोड़ा रुक कर बोले--" आज मैं अपने शौंक की हत्या कर रहा हूं, आप सब साक्षी रहेंगे। अब मेरी पत्नी अकेली नहीं मैं भी बच्चों के पालन पोषण में उसकी मदद करुंगा।" नौकर के हाथ से ताश की गड्डी लेकर आग के हवाले कर दी। ००
                           - राजश्री गौड़
                       सोनीपत - हरियाणा
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क्रमांक - 044

                            अनुशासन

दफ्तर या अन्य काम पर जाने वालों की इस समय मोहन की गुमटी पर बहुत भीड़ लगी है।तभी सबको धकियाते बैग बट्टा संभाले लेट लतीफ़ हेडमास्टर घनश्याम बाबू ने मोहन को आवाज लगाई , "फटाफट पान लगा दो भाई बहुत देर हो रही।"
  मोहन ने अचरज से पूछा, "क्या बात हे हेडमास्टर साहब आज इतनी जल्दी ,आप तो रोज आधे पौने घंटे बाद जाते थे,आज क्या हुआ ?"
     "अरे कुछ खास नहीं बस आज जरा चेकिंग करना है स्कूल में।सब मास्टर लोग लेट करके आता है,टाइट करना है सबको आज।"कहते हुए
पान का बीड़ा मुंह में  दबाए घनश्याम बाबू निकल लिए। ००
                         - -रश्मि सिंह 
                     :राँची - झारखंड 
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क्रमांक - 045

                              मैं जीत गई 

             एक बहुत बड़े साहित्यकार,  जिन्हें नवांकुरों से बात करना तो दूर, उनकी तरफ देखना भी गंवारा नहीं था । वह सोचते थे कि यह क्या खाक लिखते होंगे  । एक दिन उनके एक मित्र ने उन्हें एक पांडुलिपि,  भूमिका लिखने के लिए लाकर दी जिसके लिए उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया । लेकिन मित्र भी अपनी जिद पर अङा रहा । और उन्हें वह पांडुलिपि रखनी पड़ी । सोचा,  लिखूंगा तब देखा जाएगा । 
             उन्होने उसे टेबल पर रख दी, एक सरसरी सी नजर उस पर डाली तो वह कुछ सधी हुई सी नजर आई । वह वहां से जाने ही वाले थे कि हवा का एक झोंका आया और उसके पन्ने फड़फड़ा कर खुलने लगे । एकाएक उनकी दृष्टि उस पर ठहर गई । हाथों ने अनायास ही उसे उठा लिया, वे आंखें फाड़े उन मोतियों को देखने लगे ।
            किसी की लिखावट इतनी सधी हुई और सुंदर भी हो सकती है ? उन्हे यकीन नहीं हो रहा था । वह वहीं बैठ गए और उसे पढ़ने लगे ? ज्यों-ज्यों पढते जा रहे थे, उनकी जिज्ञासा भी बढ़ती जा रही थी । उसमें किसी दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गंवा चुकी लड़की की दर्द भरी दास्तान थी । जिसे लिखने-पढ़ने का बहुत शौक था पर लिखे कैसे ? 
           एक दिन उसके मन ने कहा-
 "मैं हूं ना ! तू मेरे साथ चल और अपने पांवों से लिख ।"
           आत्मा के प्रोत्साहन का ऐसा प्रभाव पङा कि दर्द धीरे-धीरे खुशियों में बदलने लगा । उसका अभ्यास रंग लाया और उसनें एक पुस्तक लिखी-
"मैं जीत गई ।"
           मन को झकझोर देने वाली उस पाण्डुलिपि ने उनके मन को भी झकझोर कर रख दिया ।  आज वह खुदको बोना महसूस कर रहे थे । ऐसा लग रहा था मानों रचनाकार नें स्वयं उस दर्द को जिया हो अथवा किसी के भीतर गहरे उतरकर उसे महसूस किया हो । उन्होंने कई भूमिकाएं लिखी थी मगर ये पहला अवसर था, जब वह विचलित हो गए । उसे पढने में वे इतने तल्लीन हो गए कि समय का भान ही नहीं रहा.....कठोर हृदय होते हुए भी अपने आंसू रोक नहीं पा रहे थे ।  
           उनका मन उस लेखिका से मिलने को उतावला होने लगा । उन्होंने जबरन अपने आप को संयत करते हुए अपने मित्र को फोन कर बुलाया और चल पड़े उसके साथ, उस अनजान लेखिका से मिलने । 
           जब वह उससे मिले तो.....तो.......यह क्या ? वह हतप्रभ रह गए । वही.....हाँ, वही....उस पांडुलिपि की नायिका थी । ००                 
                             - बसन्ती पंवार                     
                          जोधपुर - राजस्थान                     
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क्रमांक - 046

                            आख़िर करें क्या 

“ यह लीजिए मम्मी 6000/- रुपए।इस कबाड़ की क़ीमत !”
बहू ने पैसे सासू माँ के हाथ में रखते हुए कहा तब आरती की तंद्रा भंग हुई। 
“ हाँ ! ओह ! अच्छा ! मैं क्या करूँगी अब इनका । इन्हें तुम ही रख लो बेटा ।”
आरती की आँखों में आँसू आ गए लेकिन उसने उन मोतियों को गिरने नहीं दिया । कबाड़ी सामने बैठा सभी सम्मानों को बेदरकारी से उठा कर देख रहा था और पटक रहा था मानो परख रहा हो कि इसकी मज़बूती कितनी है। 
उसे तो वजन की ज़्यादा दरकार थी। वजन अभी तो हल्का होना चाहिए, ताकि उसे कम पैसे देने पड़ें। हाँ जब वह आगे बेचने जाए तो वजन दुगुना हो जाए ताकि उसे ज़्यादा पैसे मिलें। उसका मन इन विचारों में उलझ रहा था , विचर रहा था , उस समय उसे आरती की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की चिंता कहाँ थी। यह तो आरती का मन जानता था कि वह कितना जी रही थी और जीते-जीते कितना मर रही थी। कभी उसके हाथ किसी सम्मान को खींच कर सीने से लगाने के लिए बढ़ जाते,कभी किसी अन्य की ओर,
और वह बमुश्किल ख़ुद को रोक लेती ।
वह जानती थी कि अब वो किसी क़ीमत पर इन्हें अपने पास नहीं रख पाएगी। उसका ही ठिकाना डाँवाडोल है वह इन्हें कहाँ रखेगी। 
सामने बच्चे बैठे मोल  भाव कर रहे थे। वह मन ही मन सोचती जा रही थी कि इनका मूल्य भला कोई कैसे लगा सकता है।ये तो अनमोल हैं। बच्चे इसे मेरी धरोहर समझ रख क्यों नहीं लेते। मेरे जीते जी तक तो रख ही सकते हैं, कम से कम । फिर चाहे जो करें। 
       आरती विचारों के ज्वार-भाटे में हिचकोले खा ही रही थी कि बहू ने सास की मुट्ठी में रुपए ठूँसते हुए फिर कहा 
“ सम्भालिए अपना सम्मान। 
 इसे सँभालना तो है आसान । लीजिए।”     
“नहीं बिकेगा मेरा सम्मान , नहीं चाहिए पैसे मुझे। वापस कर दे कबाड़ी को । “
सुनते ही बिफर पड़ी आरती ।
आरती ने  कठोर दृष्टि से बहू को और फिर कबाड़ी को देखा। वह डर कर अपनी बोरी उठा कर खड़ा हो गया और चलता बना।सब चकित आरती को देखते रह गए । आरती ने कुछ सम्मानों को  समेट कर कलेजे से लगा लिया । किसी की हिम्मत न पड़ी कुछ भी बोलने की।सम्मान यथावत् शो केस में वापस सजा दिए गए। ००
                     - डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार ‘
                       फ़रीदाबाद- हरियाणा
              ( अभी अमेरिका में हूँ बच्चों के पास )
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क्रमांक - 047

                        जिसकी लाठी


गर्मियों के दिन थे जून की गर्मी ऊपर से पानी की भारी किल्लत । सारे गांव के लोग पानी के लिये त्राहि त्राहि कर रहे थे । गांव के बुद्धि जिवियों का एक प्रतिनिधि मंडल जल विभाग के जे ई से मिला और अपनी पेयजल किल्लत बारे लिखित शिकायत उन्हें सौंपी । चार दिन बाद फिटर जे ई सहित मौका मुआइना किया तो पाया की होटल वाले अंकल ने मेन लाईन से अवैध एक इंची पाइप का कनेक्शन लिया है जिस वजह से बाकियों की पेय जल आपूर्ति बाधित हुई है । जे ई  ने होटल वालों का वी कनेक्शन कटवा दिया और उन्हें चेतावनी दे कर छोड दिया ।
अभी दस दिन के बाद पूनह पाईपें जोड़ दी । गांव वाले फिर जल विभागके पास गये पर अब उन्हें आश्वासनके अलावा कुच्छ नहीं मिला । 
उसी गांव का रंचू अक्सर वहां से गुजरता तो वो पाईपें उसका मुंह चिढ़ाती और कहती प्रतीत होती-क्या मिला जे ई को बता कर ।
रंचू समझ गया की जिसकी लाठी होती है भैंस बिना डन्डे खाए उसके आगे चल पडती है । ००
                                  - सुरेन्द्र मिन्हास 
                               बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
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क्रमांक - 048

                           परिंदा उड़ गया

मैं बचपन से चिकन खाने की शौक़ीन थी और सोचती थी कि मैं कभी शाकाहारी नहीं हो सकती। पचास की उम्र तक मैंने खूब चिकन खाया, एक दिन अचानक अजब घटना घटी  
मैंने चिकन बनाया और  जब डाईविंग टेबल तक गई और अपनी प्लेट में परोसने के लिए   सपून से  चिकन का एक पीस उठाया तो अजीब दृष्य आँखों के सामने आया जैसे उस पीस से परिंदा उड़ कर जा रहा है, मैनें उस पीस को वापिस रख दिया, कुछ क्षणों के बाद फिर से एक पीस उठाया तो फिर वही दृश्य सामने आया, तीसरी बार भी यही दृश्य सामने आया कि एक परिंदा उड़ कर जा रहा है,मैंने उस दिन से चिकन खाना छोड़ दिया और मैं शाकाहारी हो गई, तब यह अहसास हुआ कि मैं तो एक जीव को मार कर खा रही थी । आज पच्चीस साल हो गये है मुझे शाकाहारी हुए। ००
                        - सुदेश मोदगिल नूर 
                         पंचकूला - हरियाणा
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क्रमांक - 049
                              पति-पत्नी 
         
कार से उतरकर  बहत्तर 
 वर्षीय वृद्ध छोकरों की भांति तर्जनी  में चाबी घुमाते, कमर मटकाते मिठाई की दुकान में प्रवेश कर गया। जिसके घर जा रहे थे उनकी पोती के लिए  टॉफी लेनी थी।
मिठाई वाले सेक्शन की ओर यहां से वहां तेजी से  आते-जाते बोला-
'अरे यहां तो टॉफी दिख  नहीं रही है, कहां है चॉकलेट, कैडबरी, डेयरी मिल्क वगैरह ?
 यहां से वहां तक उसने तीन-चार चक्कर काट लिया। काउंटर पर खड़े ग्राहक, स्टाफ और काउंटर पर बैठी महिला का ध्यान उसने अपनी ओर पूरी तरह  आकृष्ट कर चुका था  । पत्नी चुपचाप शीशे के अंदर सजी मिठाइयों का अवलोकन करती हुई जब दूसरे कॉर्नर में गई तो  कन्फेक्शनरी सेक्शन देखा।  वहां उसने देखना शुरू किया कि क्या लेना है । चाबी हिलाते हुए पति से उसने कहा-
'कन्फेक्शनरी सेक्शन यहां पर है !'
तपाक से  पति बोल पड़ा-
अरे, मैं चश्मा नहीं पहना हूं सो
मुझे दिखा नहीं ।
पत्नी बुदबुदाई-
 'इतना हंगामा क्यों कर रहे हो ?'
 देखना तो चाहिए न।'
बुलंद स्वर में बोल पड़ा-
 'अरे, मैं चश्मा नहीं पहना हूं  ।'
फिर डेयरी मिल्क  का पैकेट उठाकर पत्नी की ओर बढ़ाते हुए  जोर की आवाज  से कहा-
 देखो, यह कितने का है?
 पैंसठ वर्षीया पत्नी आंख गड़ाकर उसकी कीमत खोजती हुई झल्ला पड़ी-
  'अजी, तुम्हें दिखता नहीं है तो गाड़ी कैसे चलाते हो ?'
 'इतनी बड़ी दुकान में तुम्हें टॉफी नजर नहीं आ रही है ?'
 पति पत्नी को आंखों से तरेरता काउंटर पर बिल देने चला गया। ००
                           - 'मीनू' मीना सिन्हा 
                              रांची -  झारखंड
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क्रमांक - 50

                             सोने की किर्च 

“हर कैंडीडेट से उनके सर्टिफिकेट और आधार कार्ड मँगवा लेना और पिछली नौकरी का रिकॉर्ड ढंग से देख लेना,”
पापा अपने सहायक से बार बार फोन पर कह रहे थे।
“ज्वैलरी शाॅप में ठोक बजा कर आदमी रखना पड़ता है। सोने की एक किर्च भी बहुत कीमती होती है”,फोन रख इस बार वह माधवी से बोले जो गौर से उन की बातें सुन रही थी।
“पापा,तो क्या मैं सोने की एक किर्च से भी सस्ती हूँ जो आपने मुझे एक अजनबी के साथ केवल अख़बारी वैवाहिक विज्ञापन और दो मुलाकातों के आधार पर,विवाह के बंधन में बाँध, सात समंदर पार भेज दिया"?
"बेटा,दुकान पर.."
 "पापा,काश! आपने अपने होने वाले दामाद को भी इस सेल्समैन की तरह ठोक-बजा कर देखने का प्रयास किया होता तो हम चार साल से कचहरी की दौड़ नहीं लगा रहे होते”। ००
                               -  मंजू सक्सेना
                            लखनऊ - उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 051
                      हस्ती मिटती नहीं 

"  सुनो माँ , आज हमारे शहर में आतंकवादियों और  पुलिस के बीच मुठभेड़ हुईं। आतंकी मारे गए लेकिन कई निर्दोष मारे गए, घायल हुए  हैं और दो पुलिसवाले शहीद हो गए।"

 " बिटिया, यह तो बहुत दुखद खबर है।"
  "माँ, मेरी सहेली की नानी, बाजार से अपनी धेवती के साथ घर आ रही थी। आतंकियों की गोली  लगते ही  नानी वहीं ढेर हो गयी। पिंकी  बच गयी। "

 आर्द्र होकर माँ ने कहा ,"ओह...  इन आतंकियों का तो कोई धर्म , ईमान नहीं है...कई निर्दोष मारे जाते हैं। "
" देखो माँ, इस वीडियो को, यह वायरल हुआ है। अबोध पिंकी को तो यह भी नहीं मालूम कि जमीन पर पड़ी, खून से लथपथ  नानी मर गई। खून से सने हाथों से वह अपनी नानी का कुर्ता पकड़ के नानी ओ नानी,  उठ -उठ  कह रही है।"
" कितना दुःखद है यह सब देखना... ये आतंकी  भारत की  एकता को तोड़ना चाहते हैं। अलगाव  पैदा कर रहे हैं और जयचंदों की कमी नहीं है जो इन्हें पनाह देते हैं। "
 "हाँ माँ , लेकिन हमें  भारत माँ के शूरवीरों पर नाज है
मानवता के रक्षक पुलिसवालों ने अपना फर्ज निभाकर  पिंकी को, माँ के हाथ  सुपर्द किया ।"
"हाँ, यही तो हमारे देश की खूबसूरती है।  इसलिए तो भारत की  हस्ती मिटती नहीं है ।" ००
                            -  डॉ मंजु गुप्ता
                             मुंबई - महाराष्ट्र
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क्रमांक - 052

                          किस धर्म का

इंटों की पुरानी झड़ती दीवार पर कुछ पगड़ी टंगी थी।
कुछ लोग किसी को ढूँढते हुए उस घर में जा पहुँचे। 
 उनलोगों ने कमरे की सरसरी निगाह से तलाशी ली। परंतु घर में किसी को न देख आवाज दी.."कोई है!..अरे कोई है कि नहीं इस घर में..?"
भीतर कमरे से एक बुढ़िया झक सफेद बाल और माँस छोड़ती ,लटकती काया लिए बाहर आई।
अपनी लाठी को ठकठकाते आगे बढ़कर बोली.."किसे ढू़ँढ रहे हो तुमलोग..?"
"इधर एक आदमी भागकर आया है..वो हल्का लँगड़ाता है।"
लंगड़ाता है..!!,जैसे कि इस देश का ...ऽऽऽऽ."
"अम्मा!.तुमने देखा है क्या उसे.?"
"बेटा !.मैं देख पाती तो बताती ना।"
"देखो मेरे आँख पर तो पट्टी बँधी है।"
"तुम अकेली रहती हो इस घर में..?"
"नहीं,नहीं!..अकेली क्यूँ रहूंंगी,मेरा बेटा है न।"
"कहाँ है वह!.काम क्या करता है..?"
बेटा!..आजकल वो धर्म की फेरी करता है। कहता है इसमें बहुत फायदा है।
दीवारों पर मुँह चिढ़ाती पगड़ी उन लोगों पर हँस रही थी। ००
                         - सपना चन्द्रा
                        भागलपुर - बिहार

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क्रमांक -  053

                             ज्वलंत प्रश्न

वह दिन भर खिन्न रही। सुबह उठते ही टी . वी लगाया तो पहला समाचार ही यही था। उसका कुछ करने को मन ही नहीं कर रहा था। जैसे-तैसे करके काम निपटाकर बच्चों को तैयार करके स्कूल बस तक छोड़कर आईं लेकिन मन था कि सम्भल ही नहीं रहा था। बार-बार मन रिया की ओर जाता रहा। अभी तो वह छोटी है पर आजकल छोटी-बड़ी का तो प्रश्न ही नहीं रहा । किसी दिन उसे अच्छा-बुरा  समझाएगी।
    दोपहर को बच्चे वापिस आ गए। उसके मन को तसल्ली मिली। खबरें सारा दिन चलती रहीं और उसका मन उदासी से भरता रहा।रात को बच्चे खा पीकर कमरे में सोने चले गए। वह भी काम निपटा कर कमरे में गई तो नौ वर्षीय रिया ने आते ही पूछा, “मम्मा बलात्कार  क्या होता है?”
“बुद्धु कहीं की ,तुम्हें पता नहीं , यह लड़कियों की बात होती है।” वह  कुछ उत्तर देती इससे पहले ही किआन ने उससे कहा।
रिया बोली,“नहीं, मैंने टी. वी में देखा था, समाचार वाले अंकल कह रहे थे , यह  गंदे लड़कों का काम है। मम्मा क्या भैया भी गंदा लड़का बन जाएगा?”
कई प्रश्नों से घिरी वह विस्फारित नेत्रों से उन्हें देखने लगी।।००
                             - सुदर्शन रत्नाकर
                           फ़रीदाबाद - हरियाणा
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क्रमांक - 054

                       जा की रही भावना जैसी

मॉर्निंग वॉक करने के बाद उस पार्क की बेंच पर बैठनेवाले हम दो लोग ही हैं।एक वे वृद्ध हैं जिनके पैरों में साइटिका का दर्द रहता है और एक मैं हूं जो कराओके गीत की रिकॉर्डिंग के लिए बैठता हूं।वैसे तो और भी बेंचेस हैं लेकिन वो मेरे पास ही आकर बैठते हैं।मेरे रोमांटिक फिल्मी गीतों को सुनकर वे भी एक–आध भजन सुना देते हैं और सलाह देते हैं कि “क्या ये फिल्मी गीत गाते रहते हो!भगवान में मन लगाओ।भजन गाओ।“मैं हँसकर टाल देता हूं।
आज भी आ गए।दूर से एक पक्षी की आवाज़ जंगल से आ रही थी।लग रहा था कोई तीन शब्द बोल रहा है।उन्होंने इसी को लेकर मेरे सामने प्रश्न रख दिया कि “बताओ ये क्या बोल रहा है?“मैं अनभिज्ञ बनकर फिर हंसकर रह गया तो थोड़ा जोर देकर बोले “बताओ,बताओ।“ मैंने भी कल्पना के घोड़े दौड़ाए और उन्हें चिढ़ाते हुए कहा कि "ये शायद अपनी प्रेमिका को सुना रहा है कि काटे नहीं कटते ये दिन ये रात, कहनी थी जो तुमसे ये दिल की बात वो आज मैं कहता हूं आई लव यू।”अंतिम तीन शब्दों पर मैंने खास जोर दिया।मेरे जवाब पर उन्होंने सड़ा मुंह बनाकर राम राम कहते हुए अनमनी सी प्रतिक्रिया व्यक्त की तो मैंने एक और उत्तर पेश कर दिया “तुम्हीं तो लाई हो जीवन में मेरे प्यार,प्यार,प्यार।"अब तो उखड़ते हुए उन्होंने कहा “अरे ये बोल रहा है जय सिया राम।“फिर उन्होंने एक कथा सुनाई जिसमें यही स्थिति एक सब्जीवाले,एक पहलवान और साधु के बीच थी।
सब्जीवाला बोलता है कि “ये पंछी बोल रहा है धनिया,मिर्ची,अदरक।”पहलवान उसकी बात को नकारते हुए कहता है कि “नहीं,ये बोल रहा है दंड,बैठक,कसरत।“अब साधु उन दोनों के कथन को झुठलाते हुए कहता है कि “राम,सीता,दशरथ।“
यह कथा सुनाकर वो उठ खड़े हुए और जाते–जाते बोले “समझे नहीं समझे,जा की रही भावना जैसी,प्रभु मूरत तिहूं देखी तैसी।”पंछी अभी भी तीन शब्दों की पुकार लगाए जा रहा था और मैं अगले गीत की तैयारी में लग गया–‘भूल गया सबकुछ,याद नहीं अबकुछ,बस यही बात,न भूली जूली,आई लव यू।’ ००
                          - कपिल शास्त्री
                       भोपाल - मध्यप्रदेश
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क्रमांक - 055

                             थकान

"मोहिता के आने से घर मे खूब रौनक हो गई है.. सूना हो जायेगा घर .. उसके जाने पर"
नीलम से ये कहते बहुत उत्साहित और उदास भी थी सुनयना...बहुत दिनों बाद स्कूल आई थी..
बिटिया के आने पर छुट्टियां ले रखीं थीं सुनयना ने..
 " दो साल रह गए हैं रिटायरमेंट को..स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर मोहिता के साथ बैंगलोर क्यों नही शिफ्ट हो जातीं "नीलम ने उसकी उदासी देखकर कहा।
"अरे नहीं! अश्विनी तो मझधार में छोड़ चल बसे.. अभी मुझे मकान और मोहिता का एजुकेशन लोन चुकाना है.. साथ ही उसकी शादी की जिम्मेदारी भी शेष है" ..दीर्घ श्वास लेकर सुनयना बोली
"हां.. सही कह रही हो.. लेकिन नौकरी लगने के बाद एजुकेशन लोन तो मोहिता को ही चुकाना चाहिए ना.. " नीलम की प्रश्नवाचक निगाहें सुनयना के चेहरे को टटोल रही थी
"बंगलोर बहुत महंगा शहर है... मुश्किल से गुजारा करती है वो वहां.. फिर एम.एन.सी की नौकरी के हिसाब से उसे अपने को भी मेंटेन करना पड़ता है"
"ह्म्म्म" नीलिमा से बातों के दौरान घर आ गया।
लाडो के आने के बाद कितनी ऊर्जावान हो गईं हैं वो इन दिनों... खुद में बहुत बदलाव देख रही है.. दौड़ दौड़कर मोहिता के पसन्द के व्यंजन बनाना.. घर को आधुनिक तरीके से सजाना..
स्कूल जाते समय टेबल पर मोहिता के लिए खाना रखा.. गैस पर आधी पकी खीर और उसे सोता छोड़कर ड्यूटी चली गईं थी।वापिस लौटने तक सांझ का धुंधलका फैलने लगा था.. आहिस्ता से हाथ डालकर सांकल खोली।
       मोहिता छत पर किसी मित्र से बातों में मशगूल थी.. हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर गैस पर अधपकी खीर रखकर छत पर जाकर मोहिता को चौंकाना चाहती थी सो दबे पांव सीढियां चढ़ते अंतिम दो सीढ़ी पर ठिठक गईं.. 
"अरे यार! तुम्हें समझ नही आता है.. अभी कैसे आऊं? यूरोप ट्रिप के कारण पूरा बजट बिगड़ा हुआ है...तभी तो इस गांव में पड़ी हूँ.. दिन भर मातोश्री की पकाऊ बातें झेलती हूँ..जरा एक आई पैड का प्रबंध हो जाए.. फिर आती हूँ जल्दी"
उल्टे पांव लौट आई सुनयना..
बहुत थकान महसूस हुई..
ओह! ये क्या ... उफ़न गई सारी खीर  ००
                        -  ज्योत्सना सक्सेना
                           जयपुर - राजस्थान
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क्रमांक - 056
                               वसीयत


मैं एमएससी गणित ,इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर था। देखने में आकर्षक व्यक्तित्व था सबकी दृष्टि में।
 मैं पारिवारिक सामाजिक होने के कारण शादी के मैटर पर व्यक्तिगत नहीं था ।समय बीतता गया। मेरे साथ-साथ सबकी पसंद से मेरा विवाह संपन्न हुआ। दोनों ही काफी घुल मिल गए थे ।इस बीच हम दोनों को एक पुत्र रत्न की भी प्राप्ति हुई।
   दोनों बेहद खुश तो थे पर मेरी पत्नी शादी के समय से ही अपने मायके से आवागमन अधिक रखती ,मैंने सोचा कोई बात नहीं। समय बीतता गया उसका लगाव मेरे से कम हो गया। अब यदाकदा वह मेरी विग को लेकर अक्सर छींटाकशी करती और कहती --'अरे, हम तो अंधे थे जो हमने तुम्हें ठीक से नहीं देखा'।
   अब प्यार की अंतरंग स्थिति में उसकी थाह पाना मुश्किल होने लगा । अक्सर अब वह मायके जाती और काफी समय बाद लौटती। आकर अपने जीजा जी की सुंदरता को लेकर  तारीफों के पुल बांधती। " उनका हेयर स्टाइल तो शाहरुख खान जैसा है जिस पर हर लड़की फिदा हो जाए...। 'उसके यह शब्द दोनों में दूरियां बनाने लगे। अब उसकी अजीबोगरीब पसंद कोर्ट तक पहुंच गई । ००
                            - डॉ. रेखा सक्सेना,
                         मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
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क्रमांक - 057

                          अनसुनी चीख़ 
       
           कितने सालों से वह यहाँ खड़ा है, उसे पता नहीं ।  उसके यहाँ काफी  मित्र भी है। बचपन और जवानी तो उसकी अच्छी बीती। अब बुढ़ापे की चिंता हमेशा सताते रहती है। ना जाने किस दिन उसकी जिंदगी का अंत हो जाये।
     कुछ दिन पहले की ही तो बात है। जीप में भरकर पाँच -छह आदमी आए थे। आपस में बात कर रहे थे।
       “ करोड़ों का माल है।"
 इन सब को रात में ले चलना होगा। उस दिन से उसे रात में  नींद नहीं आ रही थी। 
  उस रात जरा सी झपकी लगी ही थी,  कि अचानक लगा उसका कोई पैर काट रहा है।
   कराहते  हुए उसकी झपकी टूटी। 
   “ अरे तुम लोग क्या कर रहे  हो?  मुझे मत मारो। मेरी जान बख्श दो। "
        " बड़ी जान प्यारी है तुझे अपनी? "
             "  क्या नाम है तुम्हारा?”       
         " लोग मुझे चंदन कहते हैं।”
        बहुत कीमती नाम है तुम्हारा। लेकिन चंदन का 
    यहाँ क्या काम। 
    इतना कहते हुए सब मिलकर उसपर वार करने लगे। 
  छटपटाता चंदन चीख पड़ा, “ तुम सबको हमें मिटाने का परिणाम भुगतना पड़ेगा।"
       पता है तुमको सरकार हमारी संख्या बढ़ाने के
     लिए क्या - क्या कर रही है।
    आदमी ने गर्वित भाव से कहा,  " हे मूर्ख ! तुझे नहीं
     मालूम कि  हम सब उसी सरकार के नुमाइंदे हैं।  
  तुम्हारा वंश बढ़ाने की योजना बनाना और साथ-साथ तुम सब की जान लेना ,दोनों उसी सरकार का काम है।” 
      इतना बोल  विद्रूप हँसी-हँसते हुए उसने अंतिम वार कर दिया। 
   चंदन धड़ाम से गिर पड़ा। उसकी चीख गुम हो गई।००
                           - अर्चना मिश्र 
                       भोपाल - मध्यप्रदेश
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क्रमांक - 058

                                   शव 

रिक्शा चलाने वाले रघु का एक्सीडेंट हो गया। वह लहू लुहान  हो सड़क पर गिर पड़ा था किसी ने उठाकर उसे साथ वाले अस्पताल में दाखिल करवा दिया ।  जैसे तैसे रघु की पत्नी सीमा को  पति के एक्सीडेंट की खबर मिल गई। वह भी लोगों के घरों में बर्तन साफ करके पति के साथ मिलकर गृहस्थी की गाडी़ खिंच रही थी। उसे जब पता चला तो वह भागते हुए अस्पताल पहुंची। डॉक्टर ने रघु को दाखिल कर लिया था और उसे आईसीयू में लेकर गए हुए थे ।  डाक्टर ने उसके बारे में कोई सही जानकारी नहींं दी। जब भी सीमा कुछ पूछती डाक्टर रुपये जमा करवाने की बात करता। दो दिन आई सी  यू में  पड़े रघु के शव का डॉक्टर बिल बनाता रहा । दो दिन बाद डॉक्टर ने कहा की  ₹100000 जमा करवाओ जो दवाइयों  का खर्चा  आया है  और  शव को ले जाओ वो अब नहीं रहे। सीमा को समझ नहीं आ रहा था कि किस से लाख रुपए उधार लेकर वह पति की पति के शव को उठाएं  फिर उसका दाह संस्कार करें या फिर बच्चों को पाले। बहुत सारी औरतें इकट्ठी होकर अस्पताल गई और फरियाद की  कि शव दे दिया जाए उनके पास बिल भरने के पैसे नहीं है लेकिन डॉक्टर मान नहीं रहा था ।  सबने सीमा को कहा कि पैसा उधार लेकर पति के शव को अस्पताल से ले आओ ।  न जाने सीमा को क्या सूझी  वह अस्पताल में गई और डॉक्टर को बोली   ना तो मेरे पास पैसे हैं शव लेकर जाने के लिए और ना ही मैं शव को लेकर जाऊंगी आप अपने पास रख लीजिए जितने दिन रख सकते हैं। मैं बच्चों  का निवाला  तुम्हें नही दे सकती। डाॅक्टर को लगा कोई उसके मुँह पर चपेड़ मार कर चला गया हो। ००
                          - एडवोकेट नीलम नारंग
                                  खरड़ - पंजाब
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क्रमांक - 059

                                  तह

पुरस्कार वितरण का  समारोह था....स्टेज में अनिशा को द्वितीय स्थान में बुलाया गया.. अनीशा अचकचा गई.... 
उसकी सहेलियों ने उससे कहा, "जाओ स्टेज में.. तुम्हारा नाम पुकारा गया है....!"
वह पुरस्कार लेने स्टेज पर गई, पुरस्कार लिया और उसके बाद अपनी टीचर से पूछा, "जब कक्षा में सर्वाधिक अंक मुझे प्राप्त हुए हैं तो क्यों मुझे द्वितीय स्थान पर पुकारा गया..?"  
उसकी टीचर चुप रही.. अनीशा जैसे ही अपनी सीट पर आई, उसकी सहेली ने पूछा, "क्या हुआ....? टीचर से क्या बात कर रही थी....?"
अनीशा के आंसू बहने लगे.. 
अनीशा आँसू बहाते- बहाते धीरे से बताने लगी...."जब मैंने टीचर से पूछा कि मुझे द्वितीय स्थान पर क्यों बुलाया गया, तो टीचर चुप थी.." 
उसकी सहेली ने अनीशा से कहा, "जिसे पहले  बुलाया गया; उसके पिताजी तेरे पिताजी से बड़े ऑफिसर है ००
                               - अर्चना अनुपम 
                             रायपुर - छत्तीसगढ़
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क्रमांक - 60

                                इंतजाम

दो महिने हो गये बेटे को गये। यदा-कदा फोन पर बात कर लेते है।  बहु को गांव आने में परेशानी होती है। आना नहीं चाहती गांव। शहर में भले ही हाथ तंग है पर सास-ससुर की टोका-टोकी बर्दास्त नहीं। बहु स्वच्छंद रहना चाहती है। बेटा बेबस है, एक तरफ अपनी गृहस्थी, तो दूूसरी तरफ माँ-बाप ,पर करे तो क्या? पत्नी के तर्को के आगे हार कर, शहर आ गया। अगले रविवार को बच्चे का जन्मदिन है, बच्चा जिद कर रहा है। जन्मदिन में खर्चा होगा, हाथ तंग है। कैसे करें इंतजाम? दोनो पति-पत्नी विचार करते रहे। अचानक बात करते-करते पत्नी ने कहा-"देखो, मैं कुछ करती हूं", पति ने कहा - "कैसे?" पत्नी ने उत्तर दिए बिना मोबाईल उठाकर अपने ससुर को फोन लगाया - "प्रणाम बाऊजी, कैसे हो? मुन्ना आपको बहुत याद करता है। आपसे मिलने की जिद करता है।"  ससुर ने भी बडे दुःखी स्वर से कहा - "मुझे भी मुन्ने की बहुत याद आती है।"  "तो आप मिलने आ जाओ, बाऊजी, अगले हफ्ते मुन्ने का जन्मदिन है, छोटी सी पार्टी रख लेते है। आपका मिलना भी हो जायेगा और पार्टी भी हो जाएगी।"- बहु ने एक श्वांस में बात  कह दी।बहू थोड़ा रुक कर फिर बोली -
" और हाँ, बाऊजी आप थोड़ा जल्दी आना, पूरे इंतजाम आपको ही करने है, इनका तो हाथ तंग है।"  "ठीक है बेटी, आ जाऊंगा" - ससुर ने कहा। विजयी मुस्कान के साथ बहुत ने फोन काट दिया। ००
                              - अनिल  कुमार जैन
                         सवाई माधोपुर - राजस्थान
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क्रमांक - 061

                           कब्र की वासना

"चूड़ियाँ ले लो चूड़ियाँ ! मुरादाबादी चूड़ियाँ ! दस रूपय की छह और बीस रू में भर-भर हाथ !"
    गोल चेहरा गदराया बदन ,तीखा नाक- नक्शा, रंग गेहुँआ ,पीली सलवार और पीला दुपट्टा , सर पर करीने से रखा हुआ। मुरादाबाद स्टेशन से चूड़ियों का बड़ा सा डिब्बा सर पर रखे मीना ट्रेन में चढ़ी तो ट्रेन में बैठे लोग उसे आँखें भर- भर कर देख रहे थे। 
तभी मीना ... "क्या हुआ साहिब ! मेम साहिब के लिये मुरादाबादी चूड़ियाँ ले लो, रास्ते की सौगात ,अपनो का प्यार... केवल दस रू की छह!!" मीना उस अधेड़ उम्र के व्यक्ती से कहती है जो एकटक उसे देख रहा था । जब मीना ने सर से चूड़ियों का डिब्बा उतारा तो गरीबी अनायास ही फटे दुपट्टे से बाहर झाँकने लगी। किसी ने चूड़ियाँ निगाह भर देखी तो किसी ने मीना को !!  मीना आगे बढ़ गई ,तभी ट्रेन में दो -तीन हिजड़े ताली बजाते हुए पैसा माँगने लगे , "निकाल मेरे शहरुख  खान! दे... भगवान जोडी बनाएगा !! तभी मीना को ललचाई आँखों से देखते  उस आदमी से हिजड़ा कहता है --"क्या हुआ चचा ! उधर ही देखते रहोगे ? आँखों की सेक पूरी हो गई हो तो ,पॉकेट ढीली करो! "
 वह आदमी गुस्से से - " क्या बेशर्मी है! पता नहीं रिजर्व  बौगी में इन लोगों को क्यों चढ़ने देते हैं!"
   हिजड़े ताली मारकर कहते हैं - " हम हिजड़े हैं भगवान ने हमें बेशर्म बनाया है ,पर साहिब !तुम्हें तो पूरा बनाया है । किसी का बाप , भाई , बेटा ,पति!  ..फिर ऐसी निगाह क्यों ? ००
                              - मनीषा सहाय "सुमन'
                                   पटना - बिहार
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क्रमांक - 062

                           आशीर्वाद

हरिया बहुत ही गरीबी में अपना दिन काट रहा था। उसकी झोपड़ी बहुत पुरानी और टूट-फूट चुकी थी, लेकिन उसका मन हमेशा प्रशन्नता से भरा रहता था। एक दिन गाँव में एक साधू बाबा आए । और घुमते - घुमते हरिया के झोपड़ी तक जा पहुंचे हरिया ने साधु बाबा का सच्चे भाव से आदर के साथ साष्टांग प्रणाम करते हुए अपनी टूटी झोपडी के अंदर ले गया, फटी - पुरानी आसन सकुचाते हुए बिछाकर बड़े आग्रह के साथ बाबा को बिठाकर उन्हें जलपान और भोजन कराया और उन्हीं के पास बैठकर हाथ मे पंखी लेकर चलाता रहा ।  साधू बाबा उसके हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन  समाप्त करने के बाद हरिया से कहे, तुम्हारी साधुओं के प्रति निष्ठा - भाव देखकर मैं निहाल हो गया धन्य हो "तुम्हारे पास जो कुछ भी है, उसी में तुम्हारी सन्तुष्टि देखकर मैं बहुत ही प्रशन्न हूँ, तुम्हारी प्रशन्नता ही सबसे बड़ी संपत्ति है, आज के समय में जिसके पास सम्पत्ति है वो प्रशन्न नहीं है आपके जैसा । मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारे जीवन में कभी कोई दुःख न आए।" सदैव ऐसे ही आदर्शवादी व प्रशन्नचित्त रहो । दरवाजे पर आए हुए व्यक्तियों का इसी तरह आदर - सम्मान करते रहो ।
हरिया ने सिर झुकाकर कहा, "बाबा, आप बहुत अच्छे हैं। लेकिन मैं तो गरीब हूँ, मुझे और कोई आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं है, बस मैं यही चाहता हूँ कि जो भी मेरे पास है, उसी में मैं खुश रहूँ। कभी भी मेरे मन गलत धारणा अपना जगह न बना पाये" ........उसके मुँख से यह सुनकर साधू बाबा मुस्कराए और बोले, "तुम्हारी संतुष्टि ही तुम्हारा सबसे बड़ा आशीर्वाद है। तुम्हारे पास तो ऐसा अमूल्य रत्न हैं जो हर धन और वस्तु से बड़ी है।" 
साधू बाबा अपने मार्ग पर चल दिए,..........पर हरिया के मन में उनके शब्द गूंजते रहे। उसने महसूस किया कि आशीर्वाद केवल शब्दों से नहीं बल्कि संतोष और सच्चे प्रेम से मिलता है । तब से वह अपनी गरीबी में  खुश रहने लगा।
सच्चे आशीर्वाद का रूप यही है, जीवन में जो कुछ भी है, उसे स्वीकार करके उसमें संतुष्ट रहते हुए प्रशन्न रहो । ००
                         -  डॉ.अर्चना दुबे 'रीत' 
                             मुंबई - महाराष्ट्र
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क्रमांक - 063

                           दंश

और आज शाम की ट्रेन से वह लौट गया। मैं उसे स्टेशन तक छोड़ने भी जाना चाहता था लेकिन उसने परेशान न होने का कहकर मना कर दिया। जाते-जाते उसके शब्द “चलता हुँ, बहुत-बहुत मेहरबानी भाई। अच्छा लगा तुम्हारे साथ रह कर।" काफ़ी देर तक मेरे मन को मथते रहे।
".  . . क्या समय सब कुछ बदल देता है? आचार-विचार, मन के संस्कार। एक ही गांव में बचपन गुजरा था हमारा, एक साथ पढ़े थे। मुझे अपमानित करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था। खाने से लेकर साथ खेलने तक, हर जगह छुआछूत का दंश बार-बार मुझे डसता था। मेरे साथ भूलवश कुछ खा लेने पर उस के 'प्रयाश्चित' करने की बातें मुझे अंदर तक भेद जाती थी। वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले पायदान की स्थिति के चलते बहुत सी कड़वी यादें मेरे साथ थी; फिर भी जब उसने, किसी काम के चलते दो दिन के लिए मेरे पास आने  के लिए कहा तो मैं मना नहीं कर सका। जितना संभव हुआ, मैंने सहयोग किया। पत्नी को भी विशेष ध्यान रखने के लिए कहा।  मैं नहीं चाहता था, उसे यह लगे कि मैंने आज भी ‘उन बातों' को मन में रखा हुआ है।"
 “क्या सोच रहे हैं?” पत्नी की आवाज़ मुझे मेरे विचारों के भंवर से बाहर ले आई।
“कुछ नहीं? चलो अच्छा है जल्दी निकला है; जल्दी गाँव पहुंच जाएगा।"
“लेकिन. . . ! वो शायद अभी गाँव गए कहाँ?" 
"मैं समझा नहीं. . .!”
"दरअसल वो सुबह फोन पर किसी से बात कर कह रहे थे, कि गांव लौटने से पहले एक बार गंगा मैया में स्नान करके आता हूँ।"
तो क्या. . . ? मेरे शब्द अधूरे रह गए, पुराना दंश फिर डसने लगा था। ००
                           - विरेंदर ‘वीर’ मेहता
                           लक्ष्मी नगर - दिल्ली 
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क्रमांक - 064

                       प्याली का कर्ज

सुंदर साहित्य के क्षेत्र में निरंतर अपने लेखन से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। हर तरफ उसकी रचनाओं की चर्चा होती रहती थी। खासकर जिस कस्बे से वह सम्बन्ध रखता था वहां पर लोग उसके लेखन की चर्चा करते रहते क्योंकि ज्यादातर उन पत्र - पत्रिकाओं के लिए जो उस कस्बे को आसानी से मिल जाती थी। सुंदर का लेखन कस्बे के लोगों को आसानी से पढ़ने को मिल जाता था।सुंदर के लेखन में चर्चा होना स्वाभाविक था । उस कस्बे में बहुत से नामी-गिरामी लेखक भी थे जो बड़ी-बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में छपते थे। आम जन मानस को उनके नामी-गिरामी लेखकों की पत्र - पत्रिकाएं उपलब्ध नहीं हो पाती थी। आम जन मानस उनके लेखन पढ़ने से महरूम रह जाता है न उनके साहित्य की आम जनमानस में चर्चा थी। इस कारण नामी-गिरामी लेखक सुंदर से अंदरूनी खुन्नस थी। सुंदर की एक गोष्ठी में नामी-गिरामी पत्र के संपादक से मुलाकात हुई और वहां पर संपादक महोदय ने रचनायें भेजने के लिए कहा।सुंदर ने हामी भरी जरूर भेजूंगा। वह बातचीत सुंदर के कस्बे के नामी-गिरामी लेखकों ने सुन ली थी और सोने पर सुहागा वह नामी-गिरामी संपादक उन लेखकों का लंगोटिया यार थे । सुंदर ने संपादक महोदय से विदा ली और वहां से चला गया। 
सुंदर ने उस नामी-गिरामी पत्र के संपादक को अनेकों रचनायें एक साल तक भेजता रहा पंरतु एक भी रचना प्रकाशन नहीं हुआ। सुंदर ने कारण जानना चाहा पंरतु पता न चल सका। एक दिन अपने दोस्त पीयूष के साथ होटल में डिनर के लिए गया हुआ था। जैसे होटल पर में प्रवेश किया तो सुंदर की नजर नामी-गिरामी संपादक व नामी-गिरामी लेखकों पर पड़ी तो सुंदर व उसका दोस्त पीयूष ने नजर बचाते हुए उनके बगल वाले टेबल खाना खाने बैठ गए। 
सुंदर के कानों में नामी-गिरामी संपादक के जो शब्द सुनायी दिये उसे यकीन नहीं हो रहा था। वह नामी-गिरामी लेखकों से कह रहा था कि यार "सुंदर लिखता बढ़िया है" पंरतु आप लोग उस दिन जो पार्टी दी व बढ़िया दारु पिलायी और जो कसम आपने दी कि उसकी किसी भी रचना प्रकाशन नहीं करना उस प्याली के कर्ज के बोझ तले दबकर सुंदर के साथ बड़ी बेइन्साफी की है। इस प्रकार की बातें सुंदर की आंखों से स्वतः पानी निकल गया। ००
                          -  हीरा सिंह कौशल 
                      सुंदरनगर - हिमाचल प्रदेश 
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क्रमांक - 065

                                 वहम 

 शाम गहरा गई है मगर मैं अब भी लेटी हुई हूँ। ना आँखों में नींद है और न ही मैंने उठकर बत्ती जलाई है। लेटे -लेटे अतीत के गलियारों में मैं घूमने लगी हूँ। मम्मी के बाद पापा भी अपनी यात्रा पूरी कर चुके हैं। भाई पापा की तेरहवीं करवाते ही वापिस विदेश चला गया है। मेरे रिश्ते की बात चलती है मगर कोई न कोई अड़चन आड़े आ ही जाती है। अब मैं उम्र के उस पड़ाव पर हूँ कि घर बसाने के नाम से ही घबराने लगती हूँ। भाई के लिए अच्छा रिश्ता मिल गया है।
 शादी के बाद भाई फिर वापिस लौट गया है। पर अब भाई हर साल आने लगा है। बीस- पच्चीस दिन रहकर वापिस लौट जाता है। समय बीतने के साथ मैं और भाभी अंतरंग सहेलियाँ बन गई हैं। उसने भी मेरी शादी के लिए कोशिशें की मगर उसकी मेहनत भी रंग नहीं लाई है।भाई के बच्चों की परवरिश मेँ मैं ख़ुद को भी भूल चुकी हूँ। 
भाई ने वीजा की कार्रवाई शुरू कर दी है क्योंकि अब अकेले उसका वहाँ मन नहीं लग रहा है। एक दोपहर पोस्टमैन कुछ काग़ज़ पकड़ा गया है। मुझे छोड़ बाक़ी सबका वीज़ा लग गया है। उनके जाते ही मेरे सब्र का बांध टूट गया है। रोते-रोते ना जाने कब मेरी ऑंख लग जाती है। कहीं दूर दरवाज़ा पीटने की आवाज़ें मेरे कानों में पड़ रही हैं। 
अचानक तेज़ शोर से मेरी आँख खुलती है। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठती हूँ। मेरे चारों ओर घुप अँधेरा है। घबराहट के मारे मैं पसीने से मैं तर-बतर हो गई हूँ। दरवाज़ा पीटने की आवाज़ें बदस्तूर जारी हैं ।
 मैं हाथों से टटोलते हुए कमरे का दरवाज़ा खोल, वहीं से दबी घुटी आवाज़ में पूछती हूँ, "कौन है?” 
“भुआ हम …दरवाज़ा खोलो।” बच्चों की आवाज़ सुनकर मैं भागकर मेनगेट खोल देती हूँ और चौंक कर इधर- उधर देखती हूँ । बाहर तो कोई भी नहीं है। क्या यह मेरा वहम था? यही सोचती मैं अब भी वहीं खड़ी हूँ। ००
                           -  सीमा वर्मा 
                        लुधियाना - पंजाब
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क्रमांक - 066
                                   माँ 

" कई लोग तुममें कूड़ा, कचरा डालते हैं, कोई पोलीथिन फेंकता है तो  कोई प्लास्टिक के डब्बे ! फैक्ट्री से निकला गंदा, प्रदुषित पानी भी तुम्ही में बहाया जाता है। जानवर मर जाते हैं उन्हें भी फेंक दिया जाता है। कोई आत्महत्या करने के लिए छलांग लगाता है तो कोई लाश को तुममें बहा देता है। मतलब लोग अपने किये सारे पाप को तुममें उड़ेल देते हैं, फिर भी तुम गुस्साती नहीं हो और न ही अधीर होती हो? तुम कैसे सब सहन कर लेती हो ?" किनारे लगे नाव ने दुखी होकर गंगा से पूछा। गंगा ने करुण स्वर में जवाब दिया,"क्योंकि मैं माँ हूँ।" ००
                       - मिन्नी मिश्रा 
                       पटना - बिहार
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क्रमांक - 067

                                  कमाई

जग्गी बचपन से बहुत शर्मीला था। एक दिन पैदल स्कूल जाते समय कुत्ते को सामने देखकर कुत्ते डर गया और आगे बढ़ने से उसके पैर कांपने लगा। तब तक कुता जग्गी के नजदीक आते जाता और भौंकने लगा। इस अवस्था को देखकर पास के तीन चार कुत्ते भी भौंकते पास आते गए। जग्गी को अपने बचाव करने के लिए कोई साधन या वस्तु भी आसपास नजर नहीं आ रहा था। सामने के घर के आंगन में एक व्यक्ति टहलते चाय की चुस्की ले रहा था। उसकी नजर जैसे ही जग्गी पर पड़ी चाय को छोड़कर झट से जग्गी की ओर एक डंडा लेकर लपका और कुत्तों को भगाया। जग्गी बच्चा और छोटा था। वह इतना घबरा गया था कि उसके मुंह से आवाज भी नहीं निकल रहा था। जग्गी मन ही मन उस व्यक्ति को भगवान के रूप में इंसान मानकर ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दिया और मन में ठान लिया आज के बाद किसी को मुसीबत में देखेगा तो उसकी मदद अवश्य करेगा और वास्तव में अपने जीवन में मुसीबत में लोगों की मदद कर आत्मिक सुख का अनुभव करने लगा। ००
                            - डा दीनदयाल साहू 
                                दुर्ग - छत्तीसगढ़
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क्रमांक - 068

                              नासूर  

प्रत्येक वर्ष की तरह, आज भी वे तीनों संविधान के जनक की जंयती पर आयोजित सभा में  श्रद्धांजलि अर्पित कर वहीं बैठ गए।
 उनके चेहरे  हताशा और निराशा से भरे थे।
उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था इसलिए तीनों चुपचाप बैठे शून्य में ताक रहे थे।
काफी देर यूँ ही बैठे रहने के बाद... 
"काश!  इंसान  ये एक दिन का दिखावा करने के बजाय...बाबा के  लिखे नियमों पर अमल करता तो कितना अच्छा होता।" श्रृद्धांजलि देने लोगों के उमडे़ हुजूम को देखकर इतिहास ने कहा।
"हाँ! फिर तो ये धरती स्वर्ग न बन जाती... " वर्तमान ने कहा
"पर.. झूठा दिखावा कर अपने आप को महान दिखाना तो इन इंसानों की तो पुरानी आदत है।" इतिहास ने  कहा।
"काश! ये धर्म, जाति- पाति,... ऊॅंच- नीच की दीवारें न होती तो कितना अच्छा होता? " - वर्तमान ने कहा।
"फिर तो अमन  की चिड़िया, जो सदियों के घायल पड़ी है.... कितनी प्रसन्नता से प्रेम गीत गाती होती।"- इतिहास ने ठंडी आह भरकर कहा।
"भविष्य! तुम भी तो कुछ कहो... ऐसे चुपचाप क्यों बैठे हो?"
"क्या कहूँ? वर्तमान भाई!.. अगर धर्म,जाति- पाति की दीवारें नहीं भी होतीं तब भी ये इंसान कोई-न- कोई दूसरा बहाना लड़ने- मरने ढ़ूंढ़ ही लेता।" 
"ये आप क्या कह रहे हैं भविष्य भाई?"
" हाॅं,...मैं सच कह रहा हूँ।"  जख्मों से भरे सीने को दिखाकर भविष्य ने कहा।
अब नाउम्मीदी से भरे, तीनों थके कदमों से चलकर अपनी- अपनी दिशाओं में विलीन हो गए। ००
                             - अर्चना राय
                        जबलपुर - मध्यप्रदेश                               
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क्रमांक - 069

                                 गैजेट्स 

16 साल की मासूम, जिसने अभी हाल ही में जवानी में कदम रखा। इस उम्र में ज्यादातर बच्चे ख्वाब देखते हैं। कुछ उन पर अमल करते हैं और कुछ उम्र के इस पड़ाव में बह जाते हैं। मासूम दिखने में शांत, परन्तु काम करने में उतनी ही गंभीर। 
एक दिन उसने अपने पापा को खराब मोबाइल कूड़े में डालते हुए देख लिया।
"पापा यह क्या कर रहे हैं आप? मोबाइल कूड़े में!"
"खराब हो गया है तो कूड़े में ही फेंकूंगा।"
"नहीं पापा! ये सब गैजेट्स हमें कूड़े में नहीं फेंकने चाहिए! क्योंकि कूड़े वाला ले जाकर इन सबको या तो कहीं फेंक देता है या जला देता है। जिसमें से जहरीला पदार्थ निकलकर हवा में घुल जाता है और हमारे वातावरण को प्रदूषित करता है। जिस कारण हम गंभीर बीमारी के शिकार हो जाते हैं।"
बात तो सही है तुम्हारी परंतु यदि कूड़े में नहीं फेंकूंगा तो कहाॅं ले जाऊं इन सब खराब गैजेट्स को? एक तरफ वास्तुशास्त्री कहते हैं खराब गैजेट्स घर में रखने से नकारात्मकता फैलती है और दूसरी तरफ तुम कह रही हो कि इन्हें कूड़े में न फेंकूं। फिर क्या करूं इन सबका!" 
"पापा एक काम किया जा सकता है, ज़हाॅं से हम ये सब खरीदते हैं, वहीं वापस करके आएं, ताकि इन सबकी रीसाइक्लिंग की जा सके और वातावरण को भी प्रदूषित करने से बचाया जा सके।'"
"क्या यह सब इतना आसान होगा?"
"नहीं पापा! समय लगेगा, क्योंकि हर व्यक्ति को समझाना इतना आसान नहीं! लेकिन किसी काम की पहल तो कोई न कोई करता ही है, तभी आज़ हम इतनी तरक्की कर पाए हैं। फिर हम ही पहल क्यों न करें!" 
दोनों बाप-बेटी सारे घर के गैजेट्स इकट्ठा करने में जुट जाते हैं .. ।
                             - नूतन गर्ग 
                                देहली
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क्रमांक - 70
                                संकुचित सोच

"बेटी, आज चाचा जी की बहू की गोदभराई है। सबको बुलाया है पर तुम्हारे लिए स्पष्ट शब्दों में मना किया है।"
अनुराधा जी बहुत दुखी होकर अपनी बहू सुजाता से बोलीं।
अभी चार माह पहले ही तो सुदीप की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनके परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था। अपनी मासूम सुजाता को उन्होंने अपने आंचल में समेट सा लिया था। सुजाता सजल नेत्रों से कुछ कहने ही जा रही थी,
तभी पापा जी दनदनाते हुए आए और बोले,
"अनुराधा, छोटे के घर गोदभराई में हमलोग भी नहीं जाऍंगे। 
 जहां हमारी बहू की इज्ज़त नहीं हो, वहां हम भी कैसे आदर पा सकते हैं?"
सुजाता तड़प कर बोली,
" ये आप कैसी बात कह रहे हैं? चाचा जी के घर में बहुत दिनों बाद इतनी खुशी का मौका आया है। आप लोग बड़े होकर सम्मिलित नहीं होंगे तो कितना रंग में भंग हो जाएगा और बाहरी लोग तरह तरह की बातें बनाएंगे।"
वे दोनों अपनी बहू की समझदारी पर चकित थे। उसी समय चाची जी का फोन आ गया और वो रोते हुए कहने लगीं,
" भाभी, विशाल को समझाइए। वह अपना सामान पैक करके वापिस दिल्ली जाने की जिद कर  रहा है।"
अनुराधा जी हैरानी से पूछ बैठीं,
"क्यों भला? आज तो छोटे भाई की पत्नी की गोदभराई है और इसी फंक्शन के लिए अपनी बेटी को लेकर कितने चाव से आया है।"
उधर से चाची जी सिसकते हुए कह रही थीं,
" उसका कहना है...अगर सुदीप की आकस्मिक मौत के कारण सुजाता अपशकुनी हो सकती है, तो रेणु की मौत के कारण वह भी तो अपशकुनी हो गया है। अब उसे कौन समझाए...यह नियम मर्दों पर लागू नहीं होता है। यह बात आप ही उसे समझा सकती हैं।"
अब पापाजी से नहीं रहा गया, वे चिल्ला पड़े,
"आजकल  स्त्री पुरुष सब बराबर  हैं। न तो हमारी सुजाता अपशकुनी है और न ही विशाल। विधि का यही विधान था। अपशकुनी तो हमारी संकुचित सोच है।" ००
                         - नीरजा कृष्णा 
                            पटना - बिहार
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क्रमांक - 071

                                  बस यूं 

 दादी के हाथ से रिमोट हटता ही नहीं। दिन भर इस चैनल से उस चैनल पर नजर दौड़ाती रहती। कोई भी कार्यक्रम दस मिनट से ज्यादा नहीं देखती,कभी कभी तो दस मिनट में सात आठ चैनल भी बदल डालती है।कल पूछ ही लिया मैंने,यह चैनल ही बदलती रहती हो कुछ देखती भी हो या बस यूं ही। दादी मुस्कुराते हुए बोली - बेटा,देखना क्या,बस मन को बहलाती और सबको बहकाती रहती हूं। साफ दिखाई नहीं देता और सुनाई भी कम ही देता है।सच्चाई तो ये ही है। बस यूं  बैठी चैनल इसलिए बदलती रहती हूं कि किसी को मेरे कम दिखाई और सुनाई देने का आभास न हो।

                         - डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल' 

                            धामपुर - उत्तर प्रदेश

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क्रमांक - 072

                              जूता

“भाई कलयुग ! बड़े हताश एवं निराश दिखाई दे रहे हैं। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग सभा में बैठे अपने-अपने युग की प्रशंसा के किस्से सुना रहे थे. वहीँ कलयुग मौन धारण किये हुए थे. 

“तुम कुछ क्यों नहीं कहते अपने युग के संदर्भ में कलयुग ?” तीनों ने कलयुग से पूछा.

“मेरा पास ऐसा कुछ है नहीं कहने को ...जहाँ जाता हूँ एक ही शब्द सुनने को मिलता है, घो...र कलयुग है भाई, लोग नफरत करते हैं. अब बताओ ये बदनामी मेरे हिस्से ...! बस इसी से मनन खिन्न है .” कलयुग ने जवाब दिया. 

अरे क्या हुआ...किसने क्या कर दिया?” सतयुग बोला.

“देखिये न भ्राता, अहिंसा,बलात्कार करे मानव, नेता ,अभिनेता..., और दोषी मैं...सत्ता भी गणिका होकर रह गई है, सिंहासन का कहीं कोई भय ही नहीं रहा लोगों में ....” कलयुग ने कुढ़ते हुए बोला.

“मन खिन्न मत करो कलयुग, सबको अपने हाल पर छोड़ दो .” त्रेता युग ने कहा.

"अच्छा, भ्राता त्रेता, एक बात बताओ, अजुध्या में जब भगवान को 14 बरस बनवास हुआ तो सिंहासन खाली रहा...भरत बैठे नहीं वहां, फिर भला कैसे सब कुछ नीका रहा ?”

"सिंहासन खाली कहाँ था छोटे ।"

"मतलब!"

"मतलब उस पर बैठा था न प्रभु राम का जूता...ये मानव, दानव, सत्ता ...सब इसी की बोली समझते हैं, इसलिए भैया भरत ने होशियारी से काम लिया .” त्रेतायुग ने कहा .‌००

                        - डॉ लता अग्रवाल "तुलजा"

                              भोपाल - मध्यप्रदेश

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क्रमांक - 073


                             चरणधूलि


       सुधीर शादी के पंडाल में दूर बैठे बुजुर्ग के चेहरे को निहार रहा था।चेहरा जाना पहचाना लग रहा था लेकिन उसे याद नहीं आ रहा था।सभी यार-दोस्तों को हाय-हैलो करते समय भी उसका ध्यान उस चेहरे पर ही था।सबसे मिलकर वह बुजुर्ग से थोड़ी दूर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर दिमाग पर जोर डालने लगा।

            अचानक कुर्सी से उठा और मुँह से निकला--ओ---यह तो त्रिपाठी सर हैं,हमारे स्कूल के गणित अध्यापक। लेकिन वो दहकते चेहरा,बोलती आँखें--'जो मुझे सपने में भी उत्साहित करती थीं और अब झुरियों भरा चेहरा,और शून्य में ताकती नि:स्तेज़ आँखें। अरे यार! सुधीर कहाँ खो गए? सभी खाने के लिए तेरा इंतजार कर रहे हैं।सुरेश ने सुधीर को कहा।सुरेश! वो त्रिपाठी सर है न?हां,बिल्कुल वही हैं।मैंने अपनी शादी का कार्ड खुद जाकर दिया था और आने का आग्रह भी किया था।सुधीर तुम सोच रहे होंगे, सर एक दम ऐसे कैसे हो गए। मेरे यार! इस जीवन का अगले पल का कुछ पता नहीं।सर के इकलौते होनहार बेटे की मृत्य एक कार दुर्घटना में हो गई। पत्नी बेटे के गम में ही छ:महीने बाद चल बसी।लेकिन सर ने हिम्मत नहीं हारी।घर को बेटे के नाम पर विद्या का मंदिर बना दिया। सभी जरूरतमंद विद्यार्थियों को फ्री में गणित की कोचिंग देते हैं।अपनी पैंशन से बचे पैसों को अनाथालय दे आते हैं।सर ने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया है।सुरेश ने एक सांस में त्रिपाठी सर की व्यथा सुना दी।सुधीर ने कहा,सुरेश खाना बाद में खाते हैं,पहले मंदिर के देवता की चरणधूलि माथे को लगा लूँ,कहकर सुधीर त्रिपाठी सर की कुर्सी की ओर चल पड़ा। ००

                             -  कैलाश ठाकुर 

                          नंगल टाउनशिप - पंजाब

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 क्रमांक - 074

                              धारसार बारिश

आकाश में दोनों तरह के बादलों के हाथी आमने-सामने जम गए। एक काला, एक श्वेत। दोनों आपस में ही भिड़ने को उद्यत। काले ने गरजकर कहा,
"मेरा रस्ता क्यों काट रहा है तू?"
"मैं काट रहा हूँ कि तू मेरा रस्ता रोके खड़ा है?...अपनी जिद पर क्यों अड़ा है?"
श्वेत ने अपने सिपाही पवन को देखकर एक आँख दबाई और काले को उड़ा ले जाने का इशारा किया। 
काला हाथी और आग बबूला। उसके गुस्से पर पानी छिड़कने की नाकाम कोशिश करता श्वेत हाथी बोला,
"इन चोटियों पर रहम कर। ये पूरी ढह जाएँगी। बर्बाद हो जाएगा पहाड़ का सब कुछ।" 
"ढह ही जाएँ। हो जाएँ बर्बाद, मेरी बला से। अब तो एकदम समय आ गया है।"
दूर से इंद्रधनुष ने झाँकते हुए पूछा,
"समय? किस बात का समय काले?" 
"लापरवाह, लालची मनुष्यों को सबक सिखाने का।" 
श्वेत नरम पड़ा, 
"छोड़ दे यार! माफ कर दे। नादान हैं वे।"
"नादान...?"
गरजा काला हाथी फिर। चीखा,
"नहीं! एकदम नहीं!! सुना नहीं क्या -
क्षमा शोभती उस भुजंग को 
जिसके पास गरल हो।
वह पवन को पूरे जोर लगाकर ठेलने लगा। उसने चिंघाड़ा बारंबार। उसके कई साथी दौड़ते हुए आ पहुँचे। कुछेक तत्काल बाघ में बदल गए। 
काले ने हुंकार भरी। एक नजर मुँह चुराते इंद्रधनुष के सतरंगे आँचल पर डाली। पवन को भगाया। 
"साथियो! रेडी हो जाओ। पहाड़ों पर टूट पड़ो।"
 श्वेत हाथी को हिकारत से देखकर, खदेड़ते हुए पवन को भी उकसाया और ललकार उठा। ००
                          - अनिता रश्मि 
                        राँची - झारखण्ड 
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क्रमांक - 075

               खोज

        सुदूर देश रुस से बेटे की वीडियो कॉल आई। मुझे देखते ही उसने अपने बड़े बड़े बालों पर हाथ फेरा और मुझे अभिवादन किया।

   मैंने पूछा," कैसे हो बेटा?"

  हस्बेमामूल उसने जवाब दिया," पापा मैं ठीक हूंँ ,आप की तबीयत कैसी है?"

   मैंने भी पुराना वाक्य दोहराया," फिलहाल तबीयत ठीक चल रही है।"

फिर उसने चहकते हुए कहा," पापा !कल फाइनल पेपर खत्म हो गए हैं ।अब कुछ दिनों में छुट्टियां हो जाएंगी, फिर घर आऊंगा ।"

बेटा वहां मेडिकल के चौथे साल में अध्यनरत है।

मैंने फिर पूछा ,"कैसे रहे पेपर ?"

"पापा ,आप तो जानते ही हैं कि यहां पेपर देने के अगले दिन ही नंबर बता दिए जाते हैं ।आज मैंने नंबर देखे। मैं सब में पास हूंँ।अब फोर्थ ईयर पूरा हो गया पापा।

   इतना सुनने के बाद मैं पुराने दिनों में लौट गया ।उन दिनों मैं सरकारी कार्यवश बाहर था ।बेटा एक स्थानीय इंटरमीडिएट कॉलेज में 10th में था और उसका रिजल्ट आने वाला था।

   एक दिन उसका फोन आया ,"पापा, मेरा रिजल्ट आ गया ।

   "अच्छा ,मैंने पूछा ,"क्या रहा?"

   " पापा, मैं फेल हो गया ।"यह कहकर बेटा खामोश हो गया और मैं.... मेरे दिल के भीतर एक  हूक सी पैदा हुई और आंखें आंँसू से भर आईं।मुझे लगा ,मेरा बेटा नहीं ,मैं फेल हो गया हूंँ।मुश्किल तमाम चुपचाप मैंने आंसुओं को पोछा ।बहुत सहज होने का प्रयत्न किया और कहां ,"बेटा ,तुम 10th में फेल हुए हो, जिंदगी से नहीं ।कोई बात नहीं। इस बार मेहनत से पढ़ना ।"

    बेटे ने वीडियो कॉल पर खामोशी पाकर पूछा," पापा! कहां खो गए आप?"

मेरी आंँखें फिर से डबडबा आईं।  मैंने चेहरा  दूसरी तरफ घुमाते हुए कहा'" बेटा ,मैं तुम्हारी सफलता में खुद को खोज रहा था।"

                      - शराफ़त अली ख़ान

                         बरेली - उत्तर प्रदेश

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   क्रमांक - 076

             जागरूकता 

थोड़ी देर पहले ही बारात विदा हुई थी। एकाएक वातावरण में सिसकियों की आवाज से समय चौंक गया। नज़रें दौड़ाई तो आवाज कूड़ेदान से आ रही थी।

समय ने‌ तांका झाँकी की तो देखा कि कूड़ेदान में फेंके अनाज सिसक रहे थे।

"  तुम सब क्यों रो रहे हो?"

" हम सभी आप में आए बदलाव से दुखी हैं।"

" मेरे में बदलाव! कैसा बदलाव?"

" एक समय था समारोह में आए अतिथी फर्श पर बैठ कर पत्तल पर परोसे गए देशी भोजन को  हाथ जोड़कर खाते और खिलाते थे। तब भोजन का सम्मान होता था।"

" भाई! सम्मान तो अब और बढ़ गया है।  तुम सबको रखने के‌‌ लिए मंहगे से मंहगे बर्तनों का इस्तेमाल ‌होता है।"

" सर! हमें बर्तनों की परवाह नहीं है। हम भले ही मिट्टी के बर्तनों में रखे जायें।"

" तो क्या चाहते हो? "

"आज कल समारोहों में निरामिष की जगह तरह- तरह के व्यंजन आ गए हैं। हम  इनके खिलाफ नहीं हैं। समस्या यह है कि सबका स्वाद चखने की दौड़ में आगंतुक अन्न को  जूठन में छोड़ते हैं।हमें हमारा यह अपमान सहन नहीं होता।"

"अच्छा ये बात है...।"

समय ने  समारोह कार्ड पर अंकित किया -

' आप उपहार में हमें केवल एक वादा दें-   

' मैं जूठन नहीं छोडूँगा '

            - कमला अग्रवाल 

     गाजियाबाद - उत्तर प्रदेश

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Comments

  1. लघुकथा- 2024

    लघुकथा - प्याली का कर्ज

    सुंदर साहित्य के क्षेत्र में निरंतर अपने लेखन से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। हर तरफ उसकी रचनाओं की चर्चा होती रहती थी। खासकर जिस कस्बे से वह सम्बन्ध रखता था वहां पर लोग उसके लेखन की चर्चा करते रहते क्योंकि ज्यादातर उन पत्र - पत्रिकाओं के लिए जो उस कस्बे को आसानी से मिल जाती थी। सुंदर का लेखन कस्बे के लोगों को आसानी से पढ़ने को मिल जाता था।सुंदर के लेखन में चर्चा होना स्वाभाविक था । उस कस्बे में बहुत से नामी-गिरामी लेखक भी थे जो बड़ी-बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में छपते थे। आम जन मानस को उनके नामी-गिरामी लेखकों की पत्र - पत्रिकाएं उपलब्ध नहीं हो पाती थी। आम जन मानस उनके लेखन पढ़ने से महरूम रह जाता है न उनके साहित्य की आम जनमानस में चर्चा थी। इस कारण नामी-गिरामी लेखक सुंदर से अंदरूनी खुन्नस थी। सुंदर की एक गोष्ठी में नामी-गिरामी पत्र के संपादक से मुलाकात हुई और वहां पर संपादक महोदय ने रचनायें भेजने के लिए कहा।सुंदर ने हामी भरी जरूर भेजूंगा। वह बातचीत सुंदर के कस्बे के नामी-गिरामी लेखकों ने सुन ली थी और सोने पर सुहागा वह नामी-गिरामी संपादक उन लेखकों का लंगोटिया यार थे । सुंदर ने संपादक महोदय से विदा ली और वहां से चला गया।
    सुंदर ने उस नामी-गिरामी पत्र के संपादक को अनेकों रचनायें एक साल तक भेजता रहा पंरतु एक भी रचना प्रकाशन नहीं हुआ। सुंदर ने कारण जानना चाहा पंरतु पता न चल सका। एक दिन अपने दोस्त पीयूष के साथ होटल में डिनर के लिए गया हुआ था। जैसे होटल पर में प्रवेश किया तो सुंदर की नजर नामी-गिरामी संपादक व नामी-गिरामी लेखकों पर पड़ी तो सुंदर व उसका दोस्त पीयूष ने नजर बचाते हुए उनके बगल वाले टेबल खाना खाने बैठ गए।
    सुंदर के कानों में नामी-गिरामी संपादक के जो शब्द सुनायी दिये उसे यकीन नहीं हो रहा था। वह नामी-गिरामी लेखकों से कह रहा था कि यार "सुंदर लिखता बढ़िया है" पंरतु आप लोग उस दिन जो पार्टी दी व बढ़िया दारु पिलायी और जो कसम आपने दी कि उसकी किसी भी रचना प्रकाशन नहीं करना उस प्याली के कर्ज के बोझ तले दबकर सुंदर के साथ बड़ी बेइन्साफी की है। इस प्रकार की बातें सुंदर की आंखों से स्वतः पानी निकल गया।

    हीरा सिंह कौशल
    गांव व डा0 महादेव
    तहसील सुंदरनगर
    जिला मंडी
    हिमाचल प्रदेश
    मोबाइल 9418144751
    स्वरचित व मौलिक

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  2. आ.जैमिनी जी आपने २०२४ लघुकथा संकलन मेरी लघुकथा नीति नियम को स्थान दिया बहुत बहुत आभार अभिनंदन धन्यवाद साथ सभी कथाएँ एक से बढ़कर वर्तमान समाज परिपेक्ष परिवेश मार्ग दर्शक रहेंगी! आपकी लघुकथा लाजवाब " मास्टर जी " की चाय समय के अनुकूल तर्कशील कथा हार्दिक हार्दिक बधाई नेक शुभकामनायें 💐🙏
    - अनिता शरद झा
    रायपुर - छत्तीसगढ़
    ( WhatsApp से साभार)

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