क्या लघुकथाकार को लघुकथा समीक्षक या आलोचक होना चाहिए ?

     लघुकथाकार तभी सफल लघुकथाकार बनता है। जब उस‌को लघुकथा की बारीकी की जानकारी हो जाती है। इसके लिए विभिन्न ‌लेखकों की लघुकथा  पढ़नी चाहिए।‌ ऐसे में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा भी करनी चाहिए। इस से लघुकथा का बहुत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यही कुछ " भारतीय लघुकथा विकास मंच " की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों को पेश करते हैं :-
         नहीं,कदापि नहीं।लघुकथाकार एक गंभीर व परिपक्व रचनाकार होना चाहिए। उसमें क्षमता होनी चाहिए कि वह लघुकथा के मूलतत्वों को भलीभाँति समझता हो, जिससे वह अपनी लघुकथा को प्रभावी ढंग से लिख सके। यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि लघुकथाकार अच्छा समीक्षक हो और अच्छा आयोजक भी हो।बहुत बार आयोजक अच्छा लेखक नहीं होता,न ही अच्छा समीक्षक होता।हां पर यह सही है कि कोई लेखक अच्छा लघुकथाकार जब तक नहीं बन सकता जब तक उसे लघुकथा सृजन की बारीकियों की जानकारी न हो।

  - प्रो शरद नारायण खरे

मंडला - मध्यप्रदेश 

         हर विद्या का अपना कौशल होता है। बात यदि लघुकथा,समीक्षक और आलोचक की है तो मैं कहूंगी, लघुकथाकार लघुकथा ही लिखे,उसका समीक्षक या आलोचक होना आवश्यक नहीं।आलोचना और समीक्षा का कार्य आलोचक और समीक्षक को करने दें। कारण यहां दोनों की भूमिकाएं अलग हैं।लघुकथाकार ,जहां भाव,विचार,अनुभव के आधार पर लघुकथा लिखता है। हाँ उसमें विद्या की हल्की समझ, विषय की गहनता हो, आत्ममूल्यांकन की क्षमता एवं साहित्य विवेक हो। तो वह लघुकथा लिख सकता है। वहीं समीक्षक और आलोचक सिद्धांत, शिल्प,कला के आधार पर उसे परखते हैं। समीक्षक या आलोचक सदैव लेखक से एक दर्जे ऊपर होता है।कारण लेखक जहां तक देख और रच पाता है समीक्षक  व आलोचक उसके पार जाता है,उसकी दृष्टि अपेक्षाकृत सूक्ष्म होती है ।इसके लिए उसे विद्या के सैद्धांतिक पहलुओं में निपुण होना आवश्यक है। जिस तरह हर अच्छा खिलाड़ी अच्छा कोच हो जरूरी नहीं,उसी प्रकार हर लघुकथाकार अच्छा समीक्षक या आलोचक हो जरूरी नहीं।यदि फिर भी वह यह कार्य करता है तो इससे विद्या को क्षति हो पहुंचती है ।

- डॉ लता अग्रवाल 'तुलजा'

भोपाल - मध्यप्रदेश 

        लघुकथाकार से अच्छा लघुकथा समीक्षक और कौन हो सकता है। एक लघुकथाकार ही अपने कथ्य को परिवेश, घटना, भावना से प्रेरित होकर लिखता है। वह जानता है कि उसके लिए समाज और राष्ट्र के लिए क्या और कितना सही है,उपयोगी है। अगर एक लघुकथाकार समीक्षक भी हो तो वह दोषरहित लघुकथा दे सकेगा। लिखते समय एक लघुकथाकार को केवल लेखक ही रहना चाहिए। लेखन के उपरांत अगर स्वयं समीक्षक और आलोचक बनकर मूल्यवान करेगा तो एक श्रेष्ठ कृतित्व पाठकों को परोस सकेगा।समीक्षक का कार्य वांछित को चुनकर साहित्य के गुणधर्म यानी सत्यम शिवम और सुंदरम तक पहुंचना है और पहुँचाना है।

- डॉक्टर चंद्रदत्त शर्मा 

रोहतक - हरियाणा 

      लघुकथा अपने कलेवर में भले ही छोटी हो, पर उसकी आत्मा अत्यंत व्यापक होती है। कुछ पंक्तियों में जीवन का सत्य, समाज की विडंबना और मानवीय संवेदना को साध लेना आसान नहीं। इसलिए लघुकथाकार का दायित्व केवल लिख देना भर नहीं है।‌मेरे विचार से एक श्रेष्ठ लघुकथाकार को अनिवार्य रूप से अपनी ही रचना का पहला समीक्षक होना चाहिए। जब तक लेखक स्वयं अपनी कथा पर आलोचनात्मक दृष्टि नहीं डालेगा, तब तक वह अनावश्यक शब्दों की छंटनी, कथ्य की तीक्ष्णता और अंत की मारकता को पूरी तरह साध नहीं पाएगा। हालाँकि, यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि लघुकथाकार का आलोचक होना और आलोचनात्मक दृष्टि रखना—दो अलग बातें हैं।लघुकथाकार का स्वयं की रचना के प्रति सजग, निष्पक्ष और ईमानदार होना आवश्यक है।क्षपरंतु हर लघुकथाकार का औपचारिक “समीक्षक” या “आलोचक” बनना अनिवार्य नहीं। यदि हर रचनाकार आलोचना में ही उलझ जाए, तो सृजन की सहजता और भाव प्रवाह बाधित हो सकता है। आलोचना का अतिरेक कई बार लेखनी को संकोचग्रस्त भी बना देता है। संतुलन ही श्रेष्ठ मार्ग है। लघुकथाकार में इतना विवेक अवश्य होना चाहिए कि वह पूछ सके—

क्या यह कथ्य आवश्यक है?

क्या अंत पाठक को झकझोरता है?

क्या मैं कम शब्दों में अधिक कह पा रहा हूँ?

जब यह आत्मसंवाद सृजन के साथ चलता है, तब लघुकथा प्रभावशाली बनती है।

निष्कर्षतः

लघुकथाकार को पहले संवेदनशील सृजनकर्ता और साथ ही स्वयं का सजग समीक्षक होना चाहिए। आलोचक बनना उसकी अनिवार्यता नहीं, पर आलोचनात्मक चेतना उसकी शक्ति अवश्य है।यही चेतना लघुकथा को साधारण कथन से उठाकर साहित्य की ऊँचाई तक ले जाती है। 

- डा अलका पांडेय 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

      एक लघुकथाकार को लघुकथा समीक्षक या आलोचक होना चाहिए क्योंकि आलोचना ही मनुष्य आगे बढ़ती है। निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, 
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
एक लघुकथाकार  अपनी छोटी कथा के माध्यम से पाठकों सोचने पर मजबूर करता है। कथा में समाज में घटित घटनाओं का वर्णन करता है। उसे किसी की परवाह नहीं करनी चाहिए और अपनी लेखनी को हमेशा सत्य लिखने में चलनी चाहिए।जो निंदा की परवाह नहीं करते वही जीवन में आगे बढ़ते हैं अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि लोगों का मुॅंह हम नहीं पकड़ सकते वे कुछ न कुछ बोलते ही रहेंगे। वही व्यक्ति जीवन में आगे अपने लक्ष्य की प्राप्ति करता है जो किसी की निंदा की परवाह नहीं करता है क्योंकि जब हम कोई अच्छा काम करते हैं सही दिशा में आगे बढ़ते हैं तो हमारे टांग खींचने वाले लोगों की कमी नहीं रहती है कोई किसी को आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकता। उदाहरण के लिए हमें चींटी को देखना चाहिए वह हजार बार गिर के भी ऊपर की ओर चलती जाती है ऐसे हमारे पर्यावरण में बहुत सारे उदाहरण हमें मिल जाएंगे।सफलता प्राप्ति के लिए सबसे पहले हमें अपने लक्ष्य को सोचना चाहिए और फिर उसी और आगे बढ़ते रहना चाहिए किसी की बुराइयों की परवाह नहीं करना चाहिए। स्वस्थ रहो मस्त रहो।

- उमा मिश्रा प्रीति 

जबलपुर - मध्य प्रदेश

        यूँ तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार होता है। इस दृष्टि से   कोई पाठक किसी रचना को पढ़कर के यदि वह उस रचना के संबंध में अपनी राय शालीनता एवं बिना किसी पूर्वाग्रह के यानी निष्पक्षता से रखता है तो यह स्वागत योग्य है। अत: समीक्षा हो या आलोचना दोनों को, दो श्रेणी में रखकर उनकी राय को समझा जा सकता है। एक है, पाठक की दृष्टि से, दूसरा है समीक्षक या आलोचक की दृष्टि से। लेखक के द्वारा रचना सार्वजनिक हुई है तो उनके लिए, उपरोक्त में से, सभी की राय का महत्व भी है और उपयोगिता भी। यह इसलिए कि संबंधित रचनाकार अपनी उस रचना के साथ-साथ, अपने लेखन में उनकी राय के अनुसार यथोचित बिंदुओं पर गौर कर  सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में लघुकथाकार यदि किसी अन्य  लेखक की लघुकथा की समीक्षा या आलोचना कर रहा है तो यह स्वागत योग्य है, इसमें असहमत होने का दृष्टव्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह संबंधित समीक्षक और आलोचक की नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है कि वह  संबंधित लघुकथा की समीक्षा या आलोचना किस आधार पर कर रहा है। संबंधित लघुकथाकार की मांग पर, पाठक की दृष्टि से या लघुकथा समीक्षक या आलोचक के रूप में। इसमें प्रथम दो के लिए तो कोई दुविधा नहीं है। लेकिन जब बात समीक्षक या आलोचक के रूप की हो तो वरिष्ठता और योग्यता का भी निर्वहन, नैतिकता का ध्यान रखते हुए, उचित होगा। वैसे तो समीक्षक या आलोचक जितने संबंधित विधा में पारंगत होंगे,उनकी समीक्षा और आलोचना उतनी ही सहर्षता से स्वीकार्य की जाती है। संक्षेप में मेरा ऐसा मानना है कि लघुकथाकार को लघुकथा समीक्षक या आलोचक होना आवश्यक नहीं है, न ही कोई बाध्यता। यह  व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर है। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      एक अच्छा लघु कथाकार,  लघुकथाओं के मर्म, उनके विन्यास को समझता है।लघुकथा में गागर में सागर भरने जैसी बात होती है।थोड़े में बड़ी बात कह देना आसान नहीं होता। लघु कथा के कटाक्ष, तंज, रोचकता, पाठक के ज़मीर को जड़ों तक हिला देने की कला, उसको सोचने पर मजबूर कर देना, उसे  बदलाव लाने के लिए प्रेरित करना, समाज की सच्चाई को उजागर करना, यही तो उद्देश्य है लघुकथा के। लघु कथा में आख़िरी पंक्ति  तक रोचकता व उत्सुकता बनाए रखना। यही एक अच्छी लघु कथा की चरम सीमा भी है।यदि कोई अच्छी लघु कथाएं लिख सकता है तो उसकी समीक्षा, उसका विवेचन भी भली भाँति कर सकता है। अतः एक अच्छा लघु कथाकार एक अच्छा लघुकथा समीक्षक व आलोचक भी हो सकता है। और क्यों नहीं? 

- रेनू चौहान 

नयी दिल्ली

       लघुकथा एक अत्यंत सूक्ष्म, सघन और संवेदनात्मक साहित्यिक विधा है, जिसमें शब्दों की मितव्ययिता के साथ-साथ विचारों की तीक्ष्णता भी अपेक्षित होती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या लघुकथाकार को लघुकथा का समीक्षक अथवा आलोचक भी होना चाहिए? वस्तुतः लघुकथाकार का मूल दायित्व रचना करना है, आलोचना करना नहीं। रचना की प्रक्रिया संवेदना, अनुभव और जीवन-बोध से जन्म लेती है, जबकि आलोचना का क्षेत्र तटस्थ विवेक, विश्लेषण और दूरी की मांग करता है। यदि रचनाकार आलोचक की भूमिका को ही प्रधान बना ले, तो उसकी लघुकथा भावनात्मक प्रवाह के स्थान पर बौद्धिक प्रदर्शन का रूप लेने लगती है, जो इस विधा की आत्मा के प्रतिकूल है। फिर भी यह कहना भी उचित नहीं होगा कि लघुकथाकार आलोचनात्मक चेतना से पूर्णतः मुक्त रह सकता है। लघुकथा में आत्मसंयम, संकेतात्मकता और प्रभावी अंत का निर्माण तभी संभव है, जब रचनाकार के भीतर आत्मालोचना की शक्ति विकसित हो। यह आत्मालोचना बाहरी आलोचना नहीं, बल्कि रचना के भीतर और रचना के उपरान्त होने वाला वह आंतरिक संवाद है, जिसमें लेखक स्वयं से प्रश्न करता है कि क्या प्रत्येक शब्द अनिवार्य है, क्या कथा का अंत पाठक को सोचने के लिए विवश करता है, और क्या कथ्य उपदेश में परिवर्तित तो नहीं हो गया? यही आलोचनात्मक विवेक लघुकथा को साधारण घटना से उठाकर सशक्त अनुभूति में बदलता है। यह भी स्मरणीय है कि प्रत्येक लघुकथाकार का आलोचक बनना आवश्यक नहीं है। आलोचना एक स्वतंत्र अनुशासन है, जिसके लिए व्यापक अध्ययन, वस्तुनिष्ठ दृष्टि और रचनात्मक आसक्ति से कुछ दूरी बनाए रखना आवश्यक होता है। रचनाकार जब स्वयं की विधा की आलोचना करता है, तो अनेक बार उसकी पक्षधरता और व्यक्तिगत आग्रह निष्पक्षता में बाधा बन जाते हैं। इसलिए यह अपेक्षा करना कि प्रत्येक लघुकथाकार आलोचक भी बने, व्यावहारिक और साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं है। लघुकथा की वास्तविक शक्ति उसके मौन, उसके संकेत और उसके अधूरेपन में निहित होती है, जहाँ पाठक स्वयं अर्थ की यात्रा पूरी करता है। यदि आलोचनात्मक चेतना रचना से पहले अत्यधिक हावी हो जाए, तो लघुकथा कथा न रहकर सूत्र, वक्तव्य या नारा बन सकती है। किन्तु यदि यही चेतना रचना के बाद आत्ममन्थन के रूप में उपस्थित हो, तो वही साधना का रूप लेकर लेखक को परिपक्व बनाती है और उसकी आगामी रचनाओं को अधिक सशक्त करती है। अतः निष्कर्ष में यही कहा जा सकता है कि लघुकथाकार का आलोचक होना अनिवार्य नहीं है, पर उसका आलोचनात्मक विवेक से सम्पन्न होना अनिवार्य है। आलोचना यदि रचना से पहले आए तो वह बाधा है, और यदि रचना के बाद आए तो वही साधना बन जाती है। इसी सन्तुलन में लघुकथा की गरिमा, उसकी तीव्रता और उसका साहित्यिक भविष्य सुरक्षित रहता है।

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियाँ (जम्मू) -जम्मू एवं कश्मीर

      एक लघु कथाकार को लघु कथा समीक्षक अथवा आलोचक भी होना चाहिए क्योंकि जब तक किसी लघु कथा की समीक्षा नहीं होगी, तब तक लघु कथाकार अपने आप में सुधार नहीं कर पाता। जब किसी रचना की समीक्षा होती है तब उसमें अगर अच्छाई पता लगती है तो और आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। यदि किसी त्रुटि का पता लगता है तो उसमें सुधार होता है क्योंकि कोई भी व्यक्ति स्वयं पूर्ण रूप में सिद्ध नहीं होता। भले ही दूसरे उसे उसकी गलती न बताएं फिर भी, जो स्वयं को पूर्ण समझता है, समझने पर उसको अपनी गलतियां समझ आती हैं। लघु कथाकार को आलोचक तो होना चाहिए परन्तु आलोचक का काम किसी की रचना को 'आलू की तरह उलीचना' ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए कि रचनाकार की रचना का मूल भाव ही बदल जाए। किसी की रचना में सिर्फ गलतियां ही निकालना आलोचक का काम नहीं है बल्कि किसी की गलती बता कर उसकी रचना में सुधार करना है, उसकी अच्छाइयां भी बतानी हैं।सही रूप में लघु कथाकार के लेखक, समीक्षक और आलोचक तीनों ही रूप होने चाहिए तभी लघु कथा की काया, कलेवर और सौंदर्य और निखरेगा और अंत में निःसंकोच मैं कहना चाहूंगी कि मेरी भी रचनाओं की समीक्षा हुई् तभी मैं आगे अपनी लेखनी में सुधार कर आगे बढ़ पाई।

- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष'

  पंचकूला - हरियाणा 

        हांँ, लघु कथाकार को समीक्षक अवश्य होना चाहिए। वह ही तो उसकी गहनता, उच्चता, भाव प्रवणता को समझ पाएगा। इतनी योग्यता रखने वाला ही लघु कथाकार बन सकता है। जिस व्यक्ति ने किसी कार्य को कभी किया ही न हो, वह उसकी समीक्षा के साथ उचित न्याय नहीं कर पाएगा। आलोचना वही प्राणी सटीक रूप से कर सकता है। जो लघु कथा के साहित्य को छह तत्वों के साथ विवेचन कर सकता है, जो साहित्य के छह तत्वों से ही परिचित नहीं होगा। वह कैसे लघु कथा की सुंदर, दोष रहित आलोचना कर सकता है? लघु कथाकार ही कथानक, कथोपकथन, भाषा- शैली, पात्र तथा चरित्र चित्रण, शीर्षक, चरम सीमा, को ठीक तरीके से, उसकी अभिव्यक्ति को समझ पाएगा। साहित्य के छह तत्वों के अभाव में, लघु कथा अपनी गरिमा को नहीं पा सकेगी। लघुकथा में कथानक ही नहीं होगा, तो लघु कथा कैसी? कथा के बिना वह मात्र शब्दों का ढेर हो जाएगा। लघु कथा में सजीवता नहीं लगेगी। भाषा शैली, समय, स्थान और पात्रों के अनुरूप होनी चाहिए। पात्रों के बिना कथा कैसी? इन सब बातों को गहराई से समझने वाला ही आलोचक है। लघु कथाकार ही  उसकी आलोचना करने का सही अधिकारी हो सकता है। और वही लघु कथाकार भी हो सकता है। 

- उषा कंसल

 बैंगलोर - कर्नाटक 

 " मेरी दृष्टि में " कुछ लघुकथाकार ऐसे भी हैं। जो समीक्षक या आलोचक बन कर अन्य लघुकथाकारों की लघुकथा की समीक्षा या आलोचना करते हैं। मैं एक बात सबसे पूछ्ना चाहता हूं कि अभिनेता कभी किसी अन्य अभिनेता की तारीफ कर सकता है ? या वकील कभी किसी अन्य वकील की तारीफ कर सकता है ? यह सभी क्षेत्रों में लागू होता है। अब बात आती है कि समीक्षक या आलोचक कौन होने चाहिए ? यह विषय शोध छात्रों व कालेज - विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों का है। यही वास्तविकता है। परन्तु लघुकथा साहित्य में लेखक ही समीक्षा व आलोचना का कार्य कर रहे हैं। यह तर्कसंगत नहीं है। 

           - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)

Comments

  1. क्या लघुकथाकार को लघुकथा समीक्षक या आलोचक होना चाहिए ? हाँ अवश्य होना चाहिए. जो व्यक्ति किसी चीज़ की समीक्षा करता है उसे उस विषय में पारंगत होना चाहिए तभी वह सही ढंग से समीक्षा कर सकेगा. यदि उसे उस विधा की जानकारी ही न होगी तो वह उस विधा की क्या समीक्षा करेगा. आलोचक को भी सब जानकारी होनी चाहिए. वैसे पाठक भी आलोचना तो कर ही सकते हैं. आलोचना थोड़े कड़े शब्दों में होती है इसलिए सब आलोचना करना नहीं चाहते हैं.
    - दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "
    कलकत्ता
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  2. लघुकथाकार अपनी लेखनीय में निष्पक्ष होता है, समीक्षात्मक या आलोचक तो पाठक ही होता है। सम्पूर्ण लघुकथा पाठक ही पढ़ता है, अपने आधार पर निर्णय लेता है। शब्द कोष ऐसा होता है, जो सब कुछ जीवन में घटित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घटना को संक्षिप्त में लेखनीय के माध्यम से पिरोकर रख देता, जिसमें वास्तविकता की झलकियाँ दिखाई देती है.....
    -आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
    बालाघाट-मध्यप्रदेश
    (WhatsApp से साभार )

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  3. एक लघुकथाकार को लघुकथा का जानकार होने के साथ-साथ, लघुकथा समीक्षक या होने में कोई बुराई नहीं है,उसका लघुकथा लेखन अनुभव व पाठकों पत्र पत्रिकाओं से मिली महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।जि का लाभ न केवल सम्बन्धित के लघुकथा लेखन को मिलेगा अपितु अन्य भी लाभान्वित हो सकेंगे
    - शशांक मिश्र भारती
    शाहजहांपुर - उत्तर प्रदेश
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  4. कोई भी आलोचक समीक्षक हो सकता है बशर्ते उसे विषय की समझ हो ,निष्पक्ष हो
    - डॉ. पुष्पलता
    मुजफ्फरनगर - उत्तर प्रदेश
    ( WhatsApp से साभार)

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  5. सामान्यतया तो किसी भी विषय पर समीक्षा वही कर सकता है, जिसे उस विषय या विधा की जानकारी हो।जैसे कविता की सही तरीके से समीक्षा वही कर पाएगा जिसे पद्य की जानकारी हो। क्योंकि जिसे पद्य की जानकारी नहीं होगी वह केवल प्रतिक्रिया दे सकता है, लेकिन समीक्षा नहीं कर सकता। ठीक उसी प्रकार जिसे कहानी या लघुकथा की सही जानकारी होगी, वही सही प्रकार से समीक्षा कर सकता है। अत: एक लघुकथाकार को समीक्षक होना चाहिए।आलोचक तो पाठक भी हो सकता है।
    - पूनम झा 'प्रथमा'
    जयपुर, राजस्थान 08-02-2026
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  6. सच्चा लघुकथा कार समाज की विसंगतियों को उजागर करने वाला , निष्पक्ष , निर्भीक जागरूक लेखक होता है , उसका किसी भी दलगत राजनीति से वास्ता नहीं होता , उसे न तो आलोचक होना चाहिए न समीक्षक। उसे जो यथार्थ दिखे ,उसको वह कम शब्दों में यानि गागर में सागर की उक्ति को मानकर , तथस्त होकर , विषय केन्द्रित होकर लिखना चाहिए । लघुकथा कार को तथस्त होना चाहिए।
    - डॉ.आलोक सोनी , दतिया
    (WhatsApp से साभार)

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