कहा गया है - “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ,न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः|” अर्थात उद्यम करने से ही सारे कार्य सफल होते हैं, केवल मनोरथ करने से कार्य नहीं होते, जैसे सोते हुए सिंह के मुख में हिरन स्वयं नहीं प्रवेश करता।जब उद्यम होता है,किसी भी तरह के कार्य में जोखिम तो होता ही है। यह जोखिम आर्थिक हो सकता है, मानसिक हो सकता है, शारीरिक हो सकता है। यह जोखिम कार्य की प्रकृति पर आधारित होता है। सफलता तभी मिलेगी जब कार्य होगा और कार्य तब होगा जब जोखिम उठाया जाये। यह भी सत्य है कि ज्ञान अनुभव से अर्जित होता है और अनुभव बिना कर्म तो होगा नहीं। इसलिए कर्म के बिना ज्ञान नहीं होगा।अब यह अलग बात है कि कर्म की प्रकृति कैसी है? अब कर्म करने में जोखिम होगा ही होगा तो जोखिम,कर्म, अनुभव, ज्ञान और सफलता । यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
सफलता पाने के लिए , प्रयत्न करना पड़ता है , परिश्रम करना पड़ता है , व जोखिम भी उठाना पड़ता है ! किसी की भी जिंदगी , फूलों की सेज नहीं ! जिंदगी जीने के लिए , जोखिम उठाने ही पड़ते हैं , कांटों पर चलना ही पड़ता है ,!! जितना मर्जी कोई धनी हो , साधन संपन्न हो , कर्म करने ही पड़ते हैं , सफलता प्राप्त करने के लिए ! चाहे कितना भी ज्ञान क्यों न हो व्यक्ति के पास , कर्म तो करने ही पड़ते हैं , जीने के लिए !! ज्ञानी पुरुष को भी , दो रोटी कमाने के लिए कर्म करना पड़ता है ! सफलता प्राप्त करने के लिए जोखिम उठाना भी , कर्म करने का दूर रूप है , व कर्म ही सर्वोपरि है क्योंकि ज्ञानी को भी जीने के लिए मेहनत करनी पड़ती है , कर्म करने पड़ते हैं !
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
जीवन अनिश्चितताओं का खेल है। कब कहां क्या कोई खतरा है कोई नहीं बता सकता है इसलिये जीवन में बेखटके कदम कई बार उठाने पड़ते हैं। ऐसे कदमों के लिये जोखिम उठाना ही पड़ता है। जोखिम उठाने से "जो डर गया वो समझो मर गया"सफलता की चाहत है तो कदमों का हिसाब नहीं बल्कि कर्मो का हिसाब रखना होगा। अकर्मण्यता कदमों को रोकती है। काबिलियत पर भरोसा है तो जीवन में जोखिम अवश्य उठाएँ। ईश्वर भी उन्हीं को साथ देता है जो खुद के साथ होते हैं। अपने पर भरोसा नहीं है कर्म पर नहीं" "करम" अर्थात भाग्य पर भरोसा रखने वाले ईश्वर से प्रार्थना में ही अवसर गमा देते हैं। आज के दौर में अवसर बार बार नहीं मिलते हैं - - छीनने पड़ते हैं जोखिम उठाकर। जब ऐसे जोखिम उठाएंगे - -" कर्मप्रधान विश्व रचि राखा" के नारे के साथ आगे बढ़ेंगे तो सारी कायनात भी आपका साथ देती है। कर्म बिना ज्ञान नहीं है। एक जगह पर अकर्मण्य की तरह बैठे रहने से सफलताओं का स्वाद नहीं मिलता। ईश्वर किसी के मुंह में निवाला नहीं देता। हाथ को मुँह तक ले ही जाना पड़ता है।। इसलिये जोखिम उठायें--जिंदगी में सदा खेलने की तैयारी हो भले ही जीत इनकी उनकी या तुम्हारी हो - - देखिये सफलता आपके कदम चमेगी।।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
जीवन और सफलता का यथार्थ यह है कि जोखिम के बिना किसी भी प्रकार की उपलब्धि सम्भव नहीं होती, और कर्म के बिना वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। मनुष्य का विकास केवल विचारों से नहीं, बल्कि उन विचारों पर चलने के साहस से होता है। जोखिम वही अग्नि-परीक्षा है जिसमें सफलता का सोना तपकर निखरता है। जो बिना जोखिम सुरक्षित दीवारों में कैद रहता है, वह लक्ष्य तो दूर स्वयं को भी पहचान नहीं पाता। इसी प्रकार कर्म ज्ञान का प्राण है, केवल पढ़ लेने से ज्ञान नहीं आता, जो सीखा उसे जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञान है। संसार की हर खोज, हर सिद्धि और हर उत्कर्ष के पीछे वही लोग हैं जिन्होंने जोखिम लेकर कर्म किया, परिश्रम किया और असफलताओं को पायदान बनाकर आगे बढ़े। अतः सफलता का मूल रहस्य यही है कि मनुष्य साहस के साथ कर्म करे, कर्म से अनुभव अर्जित करे और अनुभव से प्राप्त वास्तविक ज्ञान के बल पर स्थायी सफलता प्राप्त करे। जो व्यक्ति जोखिम उठाकर सत्कर्म करता है, वही स्वयं को पहचानता है, वही आगे बढ़ता है और अन्ततः विजय का डंका बजाता है। साहस से कर्म, कर्म से अनुभव और अनुभव से ज्ञान करे, यही चिरस्थायी उत्कर्ष का पथ और राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) — जम्मू एवं कश्मीर
चर्चा के लिए जोखिम शब्द के अर्थ को समझना होगा साधारणतः हानि, अनिष्ट की आशंका या यूं कहिए धन ,मान, सम्मान और जान तक की परवाह किए बिना खतरा मोल लेना। यानि किसी कार्य को करने में अनिश्चित की स्थिति का बना रहना। जब हम कोई कर्म करेंगे उसके लिए हमारे कार्य की दिशा, दशा ,साहस और धैर्य पर निर्भर होना जरूरी है फिर जब हम किसी कार्य की सिद्धि में सफलता हासिल करें या असफलता इससे हमारे अनुभवों में वृद्धि होती है जोखिम को झेलने की शक्ति मिलती है। तब कहीं जाकर अंत में सफलता हाथ लगती है व्यवसाय में कभी-कभी व्यक्ति सब कुछ खो देता है इसके लिए उसकी कर्म प्रणाली व उस व्यवसाय से जुड़ी अप्रत्याशित घटनाओं और लाभ- हानि के संदर्भ में सही आकलन जरूरी है। ऐसे ही एवरेस्ट विजेता हो या कोई खिलाड़ी या युद्ध का मैदान । मानना पड़ेगा की जीवन जगत के हर क्षेत्र में जोखिम ही सफलता की कीमत है । जिसे कर्म क्षेत्र के ज्ञान के बिना नहीं जीता जा सकता क्योंकि- करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान । यहां अभ्यास से तात्पर्य जोखिम लेने से है।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
जीवन में सफल होने के लिए स्वयं की सामर्थ्य के अनुसार एक निर्धारित मानदंड के तहत उद्देश्य बनाकर, मंजिल तक पहुंचने के लिए एक रास्ता तो बनाना ही पड़ता है और यह उचित भी है, महत्वपूर्ण भी और आवश्यक भी। इसके लिए समुचित तैयारी भी करना पड़ती है और आने वाले संघर्ष का सामना भी डटकर करना होता है। यह तभी संभव है, जब धैर्य,लगन,हिम्मत और समर्पित भाव, दृढ़ संकल्प के साथ-साथ बुलंद हौसला भी हो। क्योंकि हर कार्य, नया होने के साथ-साथ कठिन और जोखिम भरा होता है। जिसके लिए सजग और उद्यत रहना नितांत आवश्यक होता है। सफलता भी तभी मिलती है। कहा भी गया है, " जो डर गया,समझो वो मर गया। " अत: संक्षिप्त में कहा जाये तो सामर्थ्य के अनुसार उद्देश्य बनाया जावे और सफलता के लिए जिन महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख किया जावे तो सफलता सुनिश्चित है। यहाँ यह बात भी विशेष है कि कर्म बिना कोई ज्ञान नहीं है। कर्म करने से ही अनुभव मिलता है और अनुभव से ही संबंधित विषय की विशेषताओं , कमियों, खामियों का ज्ञान मिलता है, जिनके अनुसार हम तत्संबंधित उद्देश्य की सफलता के सप्रयास कर सकते हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
जोखिम साहस की मांग करता है, और साहस ही वह निर्णायक तत्व है जो सामान्य व्यक्ति को असामान्य बनाता है।व्यवसाय, विज्ञान, कला, आध्यात्म—सभी क्षेत्रों में इतिहास गवाह है कि "Calculated Risk" के बिना कोई भी बड़ा मुकाम संभव नहीं हुआ। कर्म अनुभव देता है, अनुभव ज्ञान को जन्म देता है।
केवल पुस्तकीय ज्ञान अधूरा है। वास्तविक ज्ञान तब आता है जब हम उसे व्यवहार में उतारते हैं।गीता भी कहती है—
“न कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।”
अर्थात् बिना कर्म किये कोई ज्ञान या सिद्धि संभव नहीं।
पहला वाक्य सफलता का द्वार खोलता है,दूसरा वाक्य ज्ञान का द्वार। सफलता के लिए जोखिम आवश्यक,
ज्ञान के लिए कर्म आवश्यक।
इसीलिए भारतीय दृष्टि में
“कर्मयोग” और “धैर्य”
दोनों जीवन के आधार माने गए।
इससे तीन महत्वपूर्ण जीवन सूत्र निकलते हैं:
जोखिम लो, पर विवेकपूर्ण।
कर्म करो, बिना आलस्य और बिना भय।
ज्ञान प्राप्त करो, अनुभव के माध्यम से।
जब मनुष्य किसी कार्य को करता है, तभी वह परिस्थितियों, त्रुटियों, निर्णयों और परिणामों से सीखता है। इसी सीख का संचय ज्ञान कहलाता है। इसलिए जीवन में न जोखिम से भागने की आवश्यकता है और न कर्म से। जोखिम साहस को जन्म देता है और कर्म ज्ञान को। दोनों मिलकर ही सफलता, अनुभव और पूर्णता की राह बनाते हैं।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
जोखिम बिना सफलता नहीं है क्योंकि सफलता वही पाता है जो असफलता का डर छोड़कर आगे बढ़ता है। जोखिम हमें हमारी सीमाओं से बाहर निकालता है, सोचने और करने का साहस देता है। बिना जोखिम उठाए जीवन सिर्फ सुरक्षित दायरे में सिमट कर रह जाता है, जहाँ उपलब्धि की ऊँचाइयाँ नहीं मिलतीं। कर्म बिना कोई ज्ञान नहीं है क्योंकि ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, अनुभव में बसता है। कर्म करते हुए ही इंसान सीखता है, गलतियाँ करता है और उन्हीं गलतियों से सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है। निष्क्रिय ज्ञान बोझ बन जाता है, जबकि कर्म से जुड़ा ज्ञान जीवन को दिशा देता है।इसलिए कहा जा सकता है कि जोखिम साहस को जन्म देता है और कर्म ज्ञान को सार्थक बनाता है दोनों मिलकर ही सफलता की वास्तविक नींव रखते हैं।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
यह कथन एक गहरा अर्थ रखता है, जिसका मतलब है कि बड़ी सफलता पाने के लिए खतरा मोल लेना ज़रूरी है और ज्ञान सिर्फ़ सोचने से नहीं, बल्कि कर्म करने से ही मिलता है. कर्म ही अनुभव और असली समझ यानि ज्ञान देता है. सफलता पाने के लिए कर्म करना पड़ता है और सफलता के लिए कभी-कभी जोखिम भी उठाना पड़ता है. जोखिम बिना सफलता नहीं है और कर्म बिना कोई ज्ञान नहीं है. ये दोनों ही जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
अगर सफलता की बात करें तो सफलता पाने के लिए जोखिम लेना अनिवार्य है क्योंकि बिना जोखिम के अच्छी सफलता मिलना मुमकिन नहीं होता,जोखिम लेने से आत्मविश्वास बढता है तथा चरित्र में मजबूती आती है तथा प्रयास करने की क्षमता बढ़ती है,तो आईये आज का रूख इसी चर्चा की तरफ करते हैं कि जोखिम बिना सफलता नहीं और कर्म बिना ज्ञान नहीं, मेरे ख्याल में जीवन मेंआगे बढने,नये अवसर पाने और सफलता को पाने के लिए जोखिम उठाना जरूरी बन जाता है क्योंकि जो लोग जोखिम नहीं उठाते वो सीमित सफलता तक ही कायम रहते हैं,देखा जाए असफलता से भी सीख मिलती है जिससे व्यक्ति मजबूत होता है और उसके बाद ही बड़े लक्ष्य हासिल कर लेने में सफल होता है,स्वामी विवेकानंद ने सच कहा है कि जीवन में जोखिम लिजिए अगर सफल हो गए तो नेतृत्व करोगे और असफल हुए तो मार्गदर्शन करोगे, क्योंकि जोखिम उठाने से बड़े अवसरों को उठाने का फायदा मिल सकता है तथा अनुभव मिलता है जिससे व्यक्ति बेहतर निर्णय ले सकता है,इसके साथ, साथ कर्मों के बिना कोई भी कार्य अच्छी सफलता तक नहीं पहुँच पाता, देखा जाए कर्म के बिना ज्ञान केवल कल्पना है,उच्च प्राप्ति के लिए कर्मयोगी होना एकमात्र उपाय है,क्योंकि कर्म ही हर कार्य की पूर्ति का सबसे उत्तम उपाय है ,देखा जाए कर्म और ज्ञान एक दुसरे से जुड़े हैं और सही कर्म ही सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने का सत्य मार्ग है, ज्ञान के बिना कर्म दिशाहीन और कर्म के बिना ज्ञान अधूरा रह जाता है केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं होता उसके लिए कर्म भी अनिवार्य होता है जिससे व्यक्ति सही दिशा की और बढता है अन्त में यही कहुंगा कर्मयोगी वह है जो फल की चिंता न करते हुए भी कर्म को करता रहता है और उसी प्रक्रिया में उसे ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है जिससे उसका जीवन सफल हो जाता है, इसलिए जोखिम बिना सफलता असंभव है और कर्म बिना ज्ञान भी हासिल नहीं होता।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
कहते हैं कि जो लेता रहता है उसका भाग्य भी लेटा रहता है। सफलता उससे कोसों दूर रहती है। जो बैठा रहता है उसका भाग्य भी बैठा रहता है। जो जोखिम उठा कर चल पड़ता है उसका भाग्य भी चलने लगता है और जो अनवरत अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्म पथ पर बिना थके, बिना रुके दौड़ता रहता है उसका भाग्य भी दौड़ कर उसके लिए सफलता लिखता है। तो इसका अर्थ यही हुआ कि जोखिम उठा कर जो निरंतर कर्म करता है सफलता और ज्ञान उसके पास ही आते हैं।
संस्कृत का एक श्लोक भी यही कहता है-
सुखार्थिनः कुतो विद्या
नार्थकामो न चास्ति श्रुतम्।
विद्यार्थिनः कुतो वित्तं
न विद्याव्यसने कुतः सुखम्॥
इसका अर्थ भी यही निकलता है कि सुख चाहने वाले को विद्या, धन और सुख कुछ भी नहीं मिलता और जिसे ये सब चाहिए उसे सुख छोड़ कर जोखिम लेकर कर्म करना ही पड़ता है। अपना हाथ उठाये बिना तो भोजन भी मुँह में जाता। इतिहास बताता है जिन्होंने लक्ष्य लेकर, जोखिम उठा कर कर्म किया उन्होंने ही अपना और देश का कालजयी इतिहास लिखा।जीवन में कुछ भी पाना हो तो जोखिम लेकर निरंतर कर्म करना अनिवार्य है तभी सफलता और ज्ञान आपके जीवन में प्रवेश कर सकते हैं।
- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून - उत्तराखंड
लक्ष्य पाने जोखिम लेना ही पड़ता है !बिना संघर्षों के जीवन आगे बढ़ाना मुश्किल है ! खतरों के खिलाड़ी बन अपने सत्कर्मों से जीत हासिल कर दुनियाँ में अपना नाम हासिल कर सकते हैं ! दूसरों के लिए प्रेरणा बन सन्मार्ग की ओर मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं !जोखिम लेने से ही हमें नए अवसर मिलते हैं । और हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। जो हमें नए नए अनुभव से मिलते हैं !और हम उसे आत्म विश्वास से जोड़ कर अपने कर्म कला कौशल को विकसित कर सकते हैं।और हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार रहते हैं। जो बिना ज्ञान के संभव नहीं,हमें जोखिम लेने और कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। कर्म ज्ञान का स्रोत है, क्योंकि कर्म करने से सही ग़लत की पहचान हमें नए अनुभव से मिलते हैं !और हम अपने ज्ञान को बढ़ा सकते हैं। कर्म सफलता की नींव है।चुनौतियों का सामना कर हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने आगे बढ़ते है । जो मानसिक संतुष्टि के साथ विचारों में परिवर्तन ला सकारात्मकता की ओर बढ़ संतुष्टि प्रदान करता है ! अरस्तू , प्लूटों , गैलेलियो से , चरक चाणक्य तक कर्म के आधार पर ही सफलता प्राप्त हुई ! बुद्धिमान पुरषों का साथ मिलना देश दुनियाँ में लाभकारी गुणकारी औषधि है! जो बिना जोखिम ज्ञान के सफलता अर्जित करवा सके !
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
जब तक हम कोई जोखिम न उठाएं — सफलता नहीं प्राप्त हो सकती।”ज्ञान सिर्फ किताबों में नहीं होता…ज्ञान *कर्म से आता है*। अनुभव से आता है अगर हम योजना बनाकर किसी काम को करते हैं या कार्य करने का कदम बढ़ाते हैं तो हमें सफलता या असफलता के साथ ज्ञान (अनुभव)अवश्य प्राप्त होगा। अगर हम कोई काम जोखिम उठाएं बिना करे तो सफलता नहीं प्राप्त हो सकती। डर के आगे जीत है। और जोखिम के आगे सफलता है जोखिम उठाना चाहिए चाहे फेल हो जाओ, अथक प्रयास से कर्म करते रहना चाहिए ।ज्ञान अवश्य आएगा चाहे देर से सफलता आए ।
करत करत अभ्यास के
जड़मति होत सुजान,
रस्सी आवत जात ते
सिल पर पड़त निशान।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
हम सभी प्राणी अपनी- अपनी कर्मभूमि पर ही जी रहे हैं,और निरंतर अपने-अपने कर्म का निर्वहन कर रहे हैं।यह हमारे अपने कर्म ही हैं जिससे हमें अनुभव की प्राप्ति होती है और जीव की प्रकृति को समीप से देखने का अवसर भी प्राप्त होता है।यह फिर ज्ञान नहीं तो और क्या है, जिसमें एक साथ हम कितनी ही परिस्थितियों का , प्राणियों का अवलोकन व निरक्षण कर लेते हैं और निष्कर्ष भी निकाल लेते हैं। कोई भी सपना देखना आसान होता है किंतु उसे मूर्त रूप देने में श्रम करना ही पड़ता है, जोखिम उठाना ही पड़ता है। किसी भी कार्य को करने में दो बातें हो सकती हैं,या तो उससे फायदा होगा या तो नुकसान होगा। किंतु ये जरूरी नहीं कि उसे नुकसान ही हो,ये प्राणी की अपनी प्रतिभा पर निर्भर है।समय के साथ प्राणी सधता जाता है और कार्य भी उच्च स्तर पर करने लग जाता है। अंत में ,हम यह कह सकते हैं कि सफलता पाने के लिए जोखिम तो उठाना ही पड़ता है। वृक्ष पर लटके अंगूर को देखा और उसके मीठे होने की कल्पना से मुँह में पानी आ जाता है,मगर इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि अंगूर स्वयं आपके मुँह में आ जाएगा। अंगूर तोड़ने का जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
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